जनवादी लेखक संघ ने ज्ञानरंजन के निधन पर जताया शोक, श्रद्धांजलि दी
सातवें दशक के चर्चित कथाकार और ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन का बुधवार रात जबलपुर के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे। जनवादी लेखक संघ ने उनके निधन पर शोक जताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।
जलेस केंद्रीय इकाई की तरफ से संगठन के नलिन रंजन सिंह (महासचिव), बजरंग बिहारी तिवारी, संदीप मील, और प्रेम तिवारी सभी संयुक्त महासचिव की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि अपने दौर के कहानीकारों में ज्ञानरंजन सबसे अलग और विशिष्ट थे। ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’ और ‘पिता’ जैसी उनकी कहानियों ने उन्हें अमर बनाया। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से उस दौर के गद्य को भी विशिष्टता दी। मध्यवर्ग की नई पीढ़ी को उन्होंने अपनी कहानियों में सशक्त ढंग से अभिव्यक्त किया है। युवाओं का अकेलापन उस दौर का एक बड़ा संदर्भ था। ज्ञानरंजन की कहानियों के नायक भी अकेले और अपने को अलग-थलग महसूस करने वाले हैं। दरअसल ज्ञानरंजन अपनी कहानियों में उनकी पहचान के संकट को भी उठाते हैं। उनकी कहानियाँ तत्कालीन समाज की अनेक विद्रूपताओं का खुलासा करती हैं।
आलोचक विजय मोहन सिंह ने उन्हें ‘संबंधों का कहानीकार’ कहा था। ज्ञानरंजन जिस क़स्बाई मध्य वर्ग का चित्रण अपनी कहानियों में करते हैं वह पूरी व्यवस्था के केंद्र में है। उन्होंने उस दौर के बौद्धिक अवसरवाद को भी अपनी कहानियों में उद्घाटित किया है। ज्ञानरंजन सामाजिक व्यवस्था के विभेदीकरण को पहचानने वाले कथाकार थे। वे उस विभेदीकरण के खिलाफ खड़ा होकर लड़ने वाली ताकतों का मजबूत होना जरूरी मानते थे।
ज्ञानरंजन जबलपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध जीएस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर रहे और 34 वर्ष की सेवा के बाद 1996 में सेवानिवृत हुए थे। वे हरिशंकर परसाई के साथ राष्ट्रीय नाट्य संस्था ‘विवेचना’ के संस्थापक सदस्य भी रहे। उनकी कहानियों के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुए और उन्हें कई सम्मान मिले। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में उनकी कहानियाँ शामिल हैं। कहानियों के अतिरिक्त साहित्य की अन्य विधाओं में भी ज्ञानरंजन ने लेखन किया था।
साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ ज्ञानरंजन के संपादन में साहित्यिक जगत में समादृत हुई थी। लगातार 90 अंकों का प्रकाशन उनके अनथक परिश्रम और लगन को दर्शाता है। एक अंतराल के बाद आगे भी उन्होंने 35 अंकों का संपादन किया था।
ज्ञानरंजन हिंदी साहित्य के विशिष्ट कथाकार और सफल संपादक के रूप में हमेशा याद किए जाएँगे। जनवादी लेखक संघ ज्ञानरंजन की स्मृति को नमन करता है और हृदय से आदरांजलि देता है।
