क्या हिंदी में पढ़ाईदारी का संकट सोचने की क्षमता मिटा रहा है?

क्या हिंदी में पढ़ाईदारी का संकट सोचने की क्षमता मिटा रहा है

शंभुनाथ

जहां देखना और मोबाइल से तस्वीरें लेना ही सबकुछ हो और सोचना कुछ नहीं हो और लोग सोचना भूल गए हों, ऐसे एक (कोलकाता) लिटरेरी फेस्ट में मैं थोड़ी देर था। यह मीट अलीपुर सेंट्रल जेल में चल रहा है जो अब म्यूजियम है। यहां कभी श्री अरविंद, सुभाषचंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरू, चित्तरंजन दास जैसे स्वाधीनता आंदोलनकारी लंबे–लंबे समय तक कैद थे।
सोचा जा सकता है कि एक समय स्वाधीनता के लिए जेल में कष्ट सह रहे आंदोलनकारियों की भूमि पर सजे–धजे अंग्रेजी भक्त एलीट बंगाली भद्रवर्ग को इस लिटरेरी फेस्ट में देखकर क्या अनुभव हो सकता है। इन लोगों की एक बड़ी जमात है जो कला और साहित्य से प्रेम रखती है और निःसंदेह इसमें कई जागरूक नागरिक हैं। यह भी लक्षित किया जा सकता है कि साहित्यिक गतिविधियां अब पहले सी सादगीपूर्ण नहीं रह गई हैं, वे अब एक बड़े मैनेजमेंट के हाथों में हैं। हर ठौर आभिजात्य की धमक है, जैसे साहित्य केवल मनोविलासिता हो! म्यूजियम के एक सुरक्षाकर्मी ने कहा, ’मैंने इतनी गाड़ियां तो यहां पहले कभी नहीं देखीं’! हर लिटरेरी फेस्ट एक खास उद्देश्य से दिए गएअवार्डों की संतान है! यह चमक से चमक बनाना है!


करीब हजार लोग होंगे ! कोई झुंपा लाहिड़ी, कोई जावेद अख्तर, कोई अमिताभ घोष, कोई बानू मुश्ताक, कोई बारबरा किंगसॉल्वर और ऐसे ही अवार्डधारी किसी अन्य लिटरेरी सेलिब्रेटी के लिए आए थे और आगामी तीन दिन आएंगे। हर तरफ अंग्रेजी की छटा है, बांग्ला तक में एक भी पोस्टर नहीं है। गनीमत है कि पॉप कल्चर का कोई चिह्न नहीं था और न किसी धर्माचार्य का प्रवचन कार्यक्रम का अंग है। विषय गंभीर थे, ’शोले@ 50’, ’ओटीपी प्लीज़’ जैसे विषय भी थे। इस लिटरेरी मीट के मुख्य स्पॉन्सर एक्साइड बैटरी वाले हैं और कई सहयोगी स्पॉन्सर हैं।
जयपुर लिट फेस्टिवल के विलियम डेलरिंपल, कोलकाता की मालविका बनर्जी, बनारस के दीपक मधोक जैसे कई व्यक्ति हैं जो ऐसे लिट फेस्ट आयोजित कर रहे हैं। इनमें पहला व्यक्ति दक्षिणपंथी झुकाव वाला एक बड़ा लेखक है।
बाकी दो अच्छे अमीर प्रबंधक हैं। ये अपने साहित्य प्रेम के कारण लिट फेस्ट के आयोजन में प्रवृत्त हुए हैं। ये लेखक नहीं हैं। हालांकि इतनी ही बातें नहीं हैं। ’लिट फेस्ट कल्चर’ के विस्तृत तथ्यों की रोशनी में अध्ययन की जरूरत है।
जाहिर है ऐसे लिट फेस्ट में जयपुर, कोलकाता, बनारस, कलिंग भावना जैसे ’स्थानीय आवेग’ का खास उपयोग होता है, पर लक्ष्य बड़ी पूंजी से एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय कला–साहित्यिक आयोजन होता है जिसमें खूब चमक–धमक हो। बड़ी व्यापारिक कंपनियां ऐसे आयोजन में बड़ा अर्थ सहयोग देकर अपनी कला– साहित्य प्रेमी, मानवता–प्रेमी छवि बनाती हैं। ऐसे आयोजन स्थानीय राजनीति से अप्रभावित रहते हैं यह मानना कठिन है, पर साहित्य को ये मनोविलास में सीमित कर चुके हैं इसमें संदेह नहीं है।
कोलकाता लिटरेरी मीट में आकर मेरे मन में कुछ प्रश्न पैदा हुए :
1) हर तरह के पतन के बावजूद क्या हमारे देश में गंभीर और नियमित पाठक अब केवल अंग्रेजी में हैं? भारत इस समय दुनिया में अंग्रेजी साहित्य का सबसे बड़ा बाजार है। क्या सारी की सारी बड़ी प्रतिभाएं अपनी हिंदी या अपनी हिंदीतर मातृभाषाएं छोड़कर अब अंग्रेजी में जा चुकी हैं? क्या अंग्रेजी ने भारतीय भाषाओं के अच्छे पाठक छीन लिए हैं?
या यह माना जाय कि ’पश्चिम’ की तरह अंग्रेजी साहित्य का भी इधर बड़ा पतन हुआ है और सूर्य अब पूरब की प्रतीक्षा में है?
2) एक्साइड बैटरी का हर जगह विज्ञापन था, ’इंडिया मूव्स ऑन एक्साइड बीकॉज आइडियाज कैन मूव योर थॉट्स!’ क्या अब हमारे विचार हमारे विचार रह गए हैं? इतने मिथ्या प्रचारों के बीच क्या हममें विचार की स्वतंत्रता बची है? एक मुख्य प्रश्न यह है कि क्या अब विचारों में लोगों को बदलने की ताकत बची है? क्या आज के किसी लेखक की सोच कभी सुधर या बदल सकती है? क्या आज का लेखक नई स्थितियों में अपने भीतर बने सैद्धातिक जेल के कपाट तोड़ सकता है?
3) पढ़ना अपने भीतर और बाहर की जड़ता से लड़ना है। कम पढ़ना या केवल पेशागत उपयोगिता के अनुसार पढ़ना या सोशल मीडिया का बाशिंदा बन जाना एक क्रमिक बौद्धिक आत्महत्या है!
पढ़ना कम होते ही व्यक्ति के विचार सतही और तात्कालिक होने लगते हैं। उसकी सोचने की शक्ति कम होने लगती है। इतना ही नहीं, स्मृति तथा कल्पनाशीलता का भारी क्षय होता है। कम पढ़ने वाले व्यक्ति का दिमाग झूठी खबरों का घोंसला बन जाता है! क्या लिटरेरी फेस्ट जितने बढ़ते जा रहे हैं हिंदी सहित भारतीय भाषाओं का साहित्य पढ़ना उतना पीछे जा रहा है?
क्या पढ़नदारी को बढ़ाए बिना अपनी सोच को बचाना संभव है? हिंदी क्षेत्र में विचार शक्ति के व्यापक ह्रास का एक बड़ा कारण पढ़ाईदारी का संकट है!

शंभुनाथ के फेसबुक वॉल से साभार

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