‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’
संपादक का वक्तव्य
- इस समय दुनियाभर में लड़ाई छिड़ी हुई है। ईरान के खिलाफ इजराइल और अमेरिका का साझा आक्रमण चल रहा है। मध्य पूर्व में यह सबसे बड़ा और ताजा संघर्ष है, जो फरवरी-मार्च 2026 में गंभीर हो गया है। दुनिया भर में कच्चे तेल और ईंधन को लेकर संकट पैदा हो गया है। रूस और यूक्रेन:के बीच फरवरी 2022 से लगातार युद्ध जारी है। गाज़ा (इज़राइल-हमास संघर्ष): अक्टूबर 2023 में शुरू हुआ यह संघर्ष अभी भी जारी है, जिससे व्यापक मानवीय संकट पैदा हुआ है और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। अभी पिछले महीने फरवरी के अंत में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पर भीषण जंग की खबरें आ रही थीं। ये लड़ाइयां विश्व को बुरी तरह से प्रभावित की हुई हैं। आकाशीय युद्ध के साथ-साथ जुबानी जंग में छिड़ी हुई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सनक के कारण अमेरिका ही नहीं दुनिया पिस रही है। खुद को शांति के नोबेल पुरस्कार की मांग करने वाले ने पूरी दुनिया को युद्ध की विभीषिका में झोंक दिया है। फिलहाल इससे बचने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा। जब भी इस तरह का संकट सामने आया है, साहित्य में इसके खिलाफ लिखा गया है। प्रतिबिम्ब मीडिया की कोशिश होगी कि युद्ध के खिलाफ जो कविताएं लिखी गई हों उन्हें प्रकाशित करें। इस कॉलम का नाम है- युद्ध के विरुद्ध युद्ध। इसकी शुरुआत वरिष्ठ जनवादी कवि और साहित्यकार ओमसिंह अशफ़ाक की कविता से कर रहे हैं। यहां उनके वक्तव्य के साथ उनकी एक कविता प्रकाशित कर रहे हैं———
ओमसिंह अशफ़ाक का वक्तव्य
मैंने 2003 के बाद युद्ध पर कविता नहीं लिखी। मेरा मानना है कि युद्ध की विनाशलीला पर लिखते हुए कवि को भी बार-बार वैसी ही यंत्रणा से गुजरना पड़ता है। जबकि जंगखोरों का “मकसद और युद्ध का “परिणाम” हमेशा यकसा ही रहता है? बस, युद्ध में पीड़ित देशों के नाम बदलते रहते हैं और जंगखोर आक्रांता का उद्देश्य हमेशा धन-संपदा की “लूटपाट, नरसंहार और साम्राज्य का विस्तार” होता है।
कभी जंगखोर जर्मनी के हिटलर, इटली के मुसोलिनी और जापान के टोजो़ हुआ करते थे,आज अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के बेंजामिन नेतन्याहू हैं? बस नाम बदले हैं मकसद नहीं बदला है!
यहां प्रस्तुत कविता में अगर युद्ध पीड़ित देश का नाम “इराक” की जगह “ईरान” लिख दिया जाए तो अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान पर थोपे गए 2025-2026 के आक्रमण पर नई कविता लिखने की जरूरत ही कहां रह जाती है?
कविता
इराक पर हमला, 2003
ओमसिंह अशफ़ाक
ए दुनिया के भले इंसानों
जरा देखो तो!
एक नई रीति चली है
हमलावर फिरंगी तेल के व्यापारी, मौत के सौदागर
‘तेलिया आचार-संहिता’ गढ़ लाए हैं!
इराक को करने बेदखल उसके वतन से
बारूद और बम लेकर
वे बसरा-बगदाद पर चढ़ आए हैं!
दुनिया के भले लोगों जरा सोचो तो सन’91 के
विनाश की आग वहां अभी तक धधक रही है।
पांच-लाख जले जिस्मों की गंध
हमारे नथुनों में घुस रही है।
ये कैसी बेबसी का आलम है लोगों!
कि प्यारे-प्यारे मासूम बच्चे
आग की लपटों में घिरे हैं
जो आक्रांता के सिवा
सभी को दिख रहे हैं!
कौन-सी मजबूरी है ये
कि सब-के-सब
मौखिक-विरोध के अलावा
कुछ भी तो नहीं कर रहे हैं!
और बेगुनाह इंसान हर घड़ी, हर पल
बेमौत मर रहे हैं।
ये हम कौन सी दुनिया में आ गए हैं भाई?
पूछो तो जरा!
किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है कि
जो वक्त पर नहीं चेता,
वह आज मरा या कल मरा-
मरण तो निश्चित है उसका।
फिर हमें किस मसीहा का इंतजार है?
उठो, आगे बढ़ो
काफ़िले को करो और बड़ा
हौसले मजबूत
निश्चय जानो फतेह तुम्हारे
बढ़ते कदमों के आसपास है!
जुल्म का डटकर करो मुकाबिला
तब तक
जब तक जिस्म में तुम्हारे
बची हुई अंतिम सांस है!
ऐ दुनिया के भले लोगों
जरा बात को विचारो
और दिखा दो एक बार फिर-
कि जुल्म का विरोध करने वाले
हर युग में मौजूद रहे हैं
वे हैं आज भी
और रहेंगे कल भी!
(7 अप्रैल 2003)
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