साम्राज्यवाद दुनिया की सबसे विनाशकारी और अमानवीय व्यवस्था और सोच

साम्राज्यवाद दुनिया की सबसे विनाशकारी और अमानवीय व्यवस्था और सोच

जलेस पूरे देश में मना रहा रेड बुक डे को साम्राज्यवाद विरोधी दिवस के तौर पर

        मुनेश त्यागी

 

बेहद खुशी की बात है कि दुनिया भर के प्रगतिशील, जनवादी और वामपंथी लेखक और कवि 21 फरवरी 1848 को 178 साल से “रेड बुक डे” यानी “इंकलाबी किताब दिवस” के रूप में मनाते आ रहे हैं। 21 फरवरी 1848 के दिन, कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने “कम्युनिस्ट घोषणापत्र” नाम की सबसे पहले क्रांतिकारी किताब लिखी थी। यह बेहद हौसला बढ़ाने वाली बात है कि आज 21 फरवरी 2026 को, जनवादी लेखक संघ द्वारा “साम्राज्यवाद विरोधी दिवस” के रूप में, पूरे देश में मनाया जा रहा है। लुटेरे पूंजीपतियों के अलावा पूरी दुनिया की जनता देख रही है कि आज पूंजीवाद, अपनी सबसे लुटेरे साम्राज्यवादी व्यवस्था और सच में, बदल गया है और वह पूरी दुनिया को बर्बादी और विनाश के कगार पर ले गया है। आज साम्राज्यवादी व्यवस्था पूरी दुनिया पर, उसके प्राकृतिक संसाधनों पर, अपना कब्जा करना चाहती है और वह दुनिया की सबसे युद्धोन्मादी, शोषक, आक्रमणकारी और प्रभुत्ववादी व्यवस्था और सोच बन गई है।

आज से 110 साल पहले 1916 के बसंत में जूरिच में, महान क्रांतिकारी कोमरेड लेनिन ने “साम्राज्यवाद पूंजीवाद की चरम व्यवस्था” नाम की एक बेहतरीन पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक में उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था, सोच और तौर तरीकों के बारे में विस्तार से लिखा था। उस पुस्तक में उन्होंने लिखा था कि पूंजीवादी साम्राज्यवाद अपने मुनाफे और दुनिया को कब्जाने के लिए पूरी दुनिया पर हमले करके, उसे कब्जाने की कोशिश करता है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद पूरी दुनिया को लूटता है। साम्राज्यवाद सर्वहारा वर्ग की सामाजिक क्रांति की पूर्व वेला है।

उन्होंने लिखा था कि पूंजीवादी दुनिया में मार्क्स के विचारों की और पुस्तकों की हत्या करने की कोशिश की गई है। इजारेदार पूंजीवाद धीरे-धीरे साम्राज्यवाद में बदल जाता है। इजारेदारी मुनाफों को बढ़ाती है। साम्राज्यवाद, राष्ट्र विशेष की एक बुरी आदत है। साम्राज्यवादी ताकतें जनता को धोखा देती हैं और उनके साथ बेखटके से, तरह-तरह की तिकडमें करती हैं। साम्राज्यवादियों का मुख्य काम है मुनाफों को बढ़ाना। पूंजीवादी साम्राज्यवाद में जनतंत्र, वित्तीय राजतंत्र में बदल जाता है। साम्राज्यवादियों में नैतिकता सिर्फ नाम मात्र की होती है। साम्राज्यवादी ताकतें राजनीतिक रूप से भ्रष्ट हो जाती हैं। साम्राज्यवाद में आर्थिक आजादी की बात सिर्फ निरर्थक होकर रह जाती है। साम्राज्यवाद में राजनीतिक स्वतंत्रता, लोगों की स्वतंत्रताहीनता में बदल जाती है।

लेनिन ने अपनी किताब में आगे लिखा कि साम्राज्यवाद अर्थात वित्तीय पूंजी का प्रभुत्व, पूंजीवाद की चरम अवस्था है। इसमें सूदखोरों और वित्तीय अल्पतंत्र की प्रधानता होती है। इसमें वित्तीय दृष्टि से शक्तिशाली गिने चुने राज्य, अन्य सभी से अलग हो जाते हैं। पूंजीवादी इजारेदार देश दुनिया में अपने उपनिवेश कायम कर लेते हैं जैसे इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी और जापान। साम्राज्यवादी देश दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक और शोषक होते हैं। वे दुनिया के सबसे बड़े सूदखोर बन जाते हैं। वित्तीय पूंजी इजारेदारी में बदलकर सिर्फ मुनाफा कमाती है।

लेनिन ने अपनी किताब में आगे लिखा कि साम्राजवादी देश, दूसरे देशों को युद्ध सामग्री देने पर ज्यादा जोर देते हैं। पूंजी का निर्यात करने वाले साम्राज्यवादी मुल्क, दुनिया का आपस में बंटवारा कर लेते हैं। पूंजीपत्तियों के इजरेदार संघ, कार्टेल, सिंडिकेट और ट्रस्ट, सबसे पहले अपने देश के बाजार को आपस में बांट लेते हैं, अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए पूंजीपति दुनिया का बंटवारा कर लेते हैं। दुनिया का नवीनतम पूंजीवाद, आर्थिक बंटवारे पर आधारित होता है। पूंजीपति दुनिया को क्षेत्रीय उपनिवेशों में बांट लेते हैं जिनमें राजनीतिक और आर्थिक संघर्ष चलते रहते हैं। पूंजीपत्तियों में दुनिया का बंटवारा जारी है और उसका पुनर्विभाजन भी जारी है। 19वीं सदी से दुनिया इंग्लैंड, जर्मनी और फ्रांस के उपनिवेशों में बंटी हुई थी।

उन्होंने ग्रेट ब्रिटेन को “लुटेरा शोषक ब्रिटेन” कहा था। वित्तीय पूंजी जमीनों और आर्थिक क्षेत्र पर कब्जा कर लेती है। वित्तीय पूंजी, आजादी नहीं बल्कि प्रभुत्व चाहती है। छोटे और बड़े राज्य, पूंजीवादी साम्राज्यवाद के बंटवारे के अंग बन जाते हैं। पूंजीवाद अपने विकास की एक ऊंची मंजिल में पहुंचकर साम्राज्यवाद का रूप धारण कर लेता है। पूंजीवाद की इजारेदाराना अवस्था ही साम्राज्यवाद है। साम्राज्यवाद की विशेषता, औद्योगिक नही बल्कि वित्तीय पूंजी है। साम्राज्यवाद, दुनिया का बंटवारा, दुनिया में अपना नेतृत्व स्थापित करने के लिए, दूसरी ताकतों से प्रतिद्वंदिता करता है और अपने विरोधियों की जड़े खोदता है।

उन्होंने आगे लिखा कि साम्राज्यवादी राजनीति और अर्थनीति में कोई भेद नहीं है। साम्राज्यवाद असमानता और आपसी विरोधों को बढ़ाता है। साम्राजवादी राज्यों में भीषण संघर्ष जारी रहता है। साम्राज्यवाद की सबसे बड़ी नीव इजारेदारी है। यही पूंजीवादी इजारेदारी है। पूंजी का निर्यात, साम्राज्यवाद का सबसे बुनियादी आर्थिक आधार है। साम्राज्यवाद रिश्वतखोरी को बढ़ाता है। साम्राजवादी ताकतें अपने परिवेश के लोगों को ही अपना पिट्ठू बना लेती हैं। साम्राजवादी व्यवस्था में दो वर्ग होते हैं यानी पूंजीवादी अभिजात वर्ग और पूंजीवादी सर्वहारा वर्ग यानी पूंजीपतियों के खरीदे हुए वेतन भोगी। साम्राज्यवाद कई देशों में सामाजिक अंधराष्ट्रवादियों के साथ घुल मिलकर एक हो जाता है । साम्राज्यवाद में क्या होता है देखिए जरा… 1. कुछ लोगों के हाथ में संकेन्द्रित पूंजी, 2. दुनिया का बंटवारा और प्रभुत्व, 3. सभी संपत्तिधारी साम्राज्यवाद के पक्ष में, 4. मजदूरों में भी घुस जाता है, 5. सामाजिक जनवादी और 6. सामाजिक साम्राज्यवादी।

उन्होंने आगे लिखा कि जितनी तेजी से व्यापार तथा पूंजीवाद का विकास होता है, उतना ही पूंजी का संकेंद्रीयकरण यानी संकेंद्रण बढ़ता है जो इजारेदारी यानी साम्राज्यवाद को जन्म देता है। साम्राज्यवादी ताकतें आपस में लड़ती भी हैं जैसे प्रथम विश्व युद्ध। साम्राज्यवादी मुल्क अपनी सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए विदेशों में अपने प्रतिद्वंदियों का पत्ता काटने के लिए, बहुत ही कम कीमतों पर, अपना माल बेचते हैं। पूंजीपत्तियों को नैतिकता से नहीं बल्कि अपनी कमाई को बढ़ाने से ही मतलब होता है।

लेनिन ने अपनी किताब में कहा था कि भारत, हिंद चीन तथा चीन, कई साम्राज्यवादी देशों जैसे इंग्लैंड, फ्रांस, जापान और अमेरिका की वित्तीय पूंजी का भयंकर शिकार रहे हैं। साम्राज्यवादी शांति तथा साम्राज्यवादी युद्ध के बीच, सजीव संबंध होते हैं।उनका सिर्फ एक ही मकसद होता है,,,,अपने मुनाफों को बढ़ाना। साम्राज्यवाद वित्तीय पूंजी तथा इजारेदारी का युग है जो हर तरफ आजादी/स्वतंत्रता की नहीं, बल्कि अपना प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश में लगे रहते हैं।

वे आगे लिखते हैं कि साम्राज्यवादी प्रभुत्व, कब्जागिरी और मनमाना शोषण, राष्ट्रीय चेतना को जन्म देता है। आजादी तथा राष्ट्रीय चेतना के आंदोलन, पूंजी के शोषण के खिलाफ, एक खतरा बन जाते हैं। पूंजी अपने प्रभुत्व को केवल अपने सैन्यबल में लगातार बढ़ोतरी करके ही कायम रह सकती है। साम्राज्यवादी उत्पीड़न की वजह से, उसके खिलाफ धीरे-धीरे प्रतिरोध/बगावतें भी बढ़ने लगती हैं।

वे आगे लिखते हैं कि साम्राज्यवाद इजरेदार पूंजीवाद है जो इजरेदार संघों, कार्टेलो, सिंडीकेटों और ट्रस्टों के रूप में देखा जा सकता है। साम्राज्यवादी ताकतों ने पूरी दुनिया को आपस में बांट लिया है तथा पुनर्विभाजन के लिए आपस में भयंकर संघर्ष शुरू हो गया है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद दुनिया का शोषण करता है, दुनिया पर अपना प्रभुत्व कायम करता है। उसका विकास हुआ है मगर उसमें असमानता बढ़ती जा रही है। यह परजीवी होता है। साम्राज्यवाद पूंजीवाद की चरम अवस्था है।

साम्राज्यवाद और साहित्य

अपनी इस पुस्तक में लेनिन ने कहा था कि पूंजीपति और उनके अखबार, मजदूर और किसानों को धोखा देते हैं। साम्राज्यवाद साहित्य को भी बेईमान और पक्षपाती बना देता है। पूंजीवादी लेखक आर्थिक संकट को छिपाते हैं। दुनिया के अधिकांश लेखक और राजनेता, साम्राज्यवाद के समर्थक रहे हैं।पूंजीवादी विद्वान और पत्रकार, साम्राज्यवाद की हिमायत करते हैं, उसकी जन विरोधी नीतियों और चालाकियों पर पर्दा डालते हैं, उनसे ध्यान भटकते हैं और साम्राज्यवाद की सुधारवादी नीतियों को बेतुका बताते हैं। साम्राज्यवाद के समर्थक कई लेखक, जनता को हमेशा धोखा देने के लिए, तरह-तरह की साम्राज्यवाद समर्थक बातें करते हैं, लेख लिखते हैं और लिखवाते हैं।

साम्राज्यवाद और कुछ मजदूर नेता

लेनिन ने अपनी किताब में पूंजीपति और मजदूर नेताओं के बारे में कहा था कि पूंजीपति वर्ग, मजदूर नेताओं को घूस देकर अपनी ओर खींच लेता है। कुछ मजदूर नेता बेईमानी से पूंजीपति वर्ग के दलाल और गुर्गे बन जाते हैं। साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया को बांटती हैं, शोषण करती है, मुनाफे बढ़ाती हैं, अपने सहयोगियों सर्वहारा वर्ग के अंदर, उच्चतर स्तरों, नेताओं को रिश्वत खिलाती हैं और अवसरवाद को बढ़ावा देती हैं। साम्राज्यवाद में मजदूरों को बांटा जाता है जैसे विशेषाधिकार प्राप्त मजदूर और सर्वहारा।

साम्राज्यवाद और खेती…

साम्राज्यवाद और खेती किसानी के बारे में लेनिन ने अपनी किताब में लिखा था कि पूंजीवादी साम्राज्य ने कभी भी खेती का विकास नहीं किया। जब तक पूंजीवाद रहेगा तब तक बेशी पूंजी, किसी देश विदेश के जनसाधारण के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए इस्तेमाल नहीं की जाएगी। जब तक खेती की दशा पिछड़ी बनी रहेगी, तब तक जनता गरीबी की अवस्था/हालत में बनी रहेगी।

समाजवाद और मजदूर वर्ग

समाजवाद और मजदूर वर्ग के काम के बारे में लेनिन ने कहा था कि पूंजीवादी सुधार नहीं, बल्कि मार्क्सवाद यानी वैज्ञानिक समाजवाद यानी किसानों, मजदूरों/मेहनतकशों की सरकार, राजसत्ता और सरकार कायम करना। मजदूर वर्ग के काम के बारे में लेनिन ने कहा था कि स्वतंत्र व्यापार नहीं, समाजवाद की स्थापना और पूंजीवाद का जड़ से खात्मा। साम्राज्यवाद पूंजीवाद की चरम अवस्था है। लेनिन ने जोर देकर कहा था कि… क्रांतिकारी बदलाव के लिए जरूरी है कि साम्राज्यवाद के आर्थिक सार को समझा जाए।

साम्राज्यवाद को लेकर लेनिन के क्या कमाल के विचार थे। 110 साल पहले लिखी गई उनकी सभी बातें, आज पूरी तरह से सही साबित हो रही है। आज दुनिया के तमाम साम्राज्यवादी मुल्कों ने जिनका नेतृत्व आज अमेरिका कर रहा है, पूरी दुनिया में लोकतंत्र, स्वतंत्रता, ईमानदारी, मानवाधिकार और नैतिकता को पतन के गड्ढे में डाल दिया है। आज का पूंजीवादी साम्राज्यवाद, पूरी दुनिया पर अपना कब्जा करना चाहता है, उसके प्राकृतिक संसाधनों पर अपना एक तरफ कब्जा करना चाहता है। उसने पूरी दुनिया को युद्ध की विभीषिका में डाल दिया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका 70 देशों पर हमले और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर चुका है। उसने देशों की संप्रभुता एकदम खतरे में डाल दी है। पूरी मीडिया को अपना गुलाम बना लिया है। आज तो जैसे पूरी दुनिया सच्ची खबरें जानने से तरस गई है।

साम्राज्यवादी नीतियों, सोच और हमलों के कारण आज पूरी दुनिया महाविनाश, बर्बादी, युध्दोन्माद, जंगली बर्बरता, मूल्यहीनता और अनैतिकता के कगार पर खड़ी है। अब तो पूरी दुनिया की के मजदूर, किसान और मेहनतकश, बुद्धिजीवी, लेखक, कवियों, साहित्यकारों और समाजवादी ताकतों और देशों की एकजुटता ही, इस दुनिया को पूंजीवादी साम्राज्यवादी शोषण, विनाश, बर्बरता, जंगलीपन, अनैतिकता एवं अमानवीयता से बचा सकती है।

 

वैज्ञानिक समाजवाद जिंदाबाद,

किसानों मजदूरों की सरकार जिंदाबाद,

विश्व विनाशकारी साम्राज्यवाद हो बर्बाद।

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