प्रगति के दौर में लुप्त होती संवेदनाएं: क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं?

समय – समाज

प्रगति के दौर में लुप्त होती संवेदनाएं: क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं?

डॉ रीटा अरोड़ा

सड़क पर अचानक ब्रेक की तीखी आवाज़ गूंजती है। एक बाइक फिसलती है, युवक सड़क पर गिरकर तड़पने लगता है। आसपास भीड़ जमा हो जाती है-लेकिन मदद के लिए नहीं।

“अरे वीडियो बनाओ, वायरल होगा!”

“कोई एम्बुलेंस बुलाओ!” एक बुजुर्ग की आवाज़ भीड़ में खो जाती है।

मोबाइल उठे रहते हैं, इंसानियत झुकी रहती है।

घायल युवक पानी के लिए तड़पता है, और कुछ ही पलों में सन्नाटा छा जाता है।

बुजुर्ग धीमे स्वर में कहते हैं-“आज इंसान नहीं, सिर्फ तमाशबीन बचे हैं।”

यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि हमारे समय का सटीक चित्र है। यह वह दौर है, जहां तकनीक ने हमें जोड़ने का वादा किया था, लेकिन संवेदनाओं को धीरे-धीरे खत्म कर दिया। सवाल यह है-क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं, या भीतर से खोखले होते जा रहे हैं?

प्रगति ने हमें सुविधा दी है, गति दी है, जानकारी दी है। लेकिन इसी के साथ उसने हमारी प्राथमिकताओं को भी बदल दिया है। अब हम हर घटना को “कंटेंट” की नजर से देखने लगे हैं। किसी की पीड़ा हमारे लिए एक दृश्य बनकर रह जाती है, न कि एक जिम्मेदारी।

और यह असंवेदनशीलता केवल सड़कों तक सीमित नहीं है-यह हमारे घरों तक पहुंच चुकी है। आज का युवा, जो अपने सपनों के लिए घर से दूर जाता है, अक्सर अनजाने में अपने पीछे छूटे माता-पिता की भावनाओं को भी पीछे छोड़ देता है। फोन कॉल औपचारिकता बन जाते हैं, और माता-पिता की प्रतीक्षा एक अनसुनी खामोशी में बदल जाती है।

हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां भीड़ बढ़ रही है, लेकिन रिश्ते सिकुड़ रहे हैं। जहां संवाद कम हो रहा है और स्क्रीन टाइम बढ़ रहा है। जहां साथ रहते हुए भी दूरी महसूस होती है।

तकनीक समस्या नहीं है-समस्या उसका उपयोग है। जब तकनीक संवेदनाओं की जगह ले लेती है, तब प्रगति अधूरी हो जाती है। असली विकास वह है, जिसमें इंसान तकनीकी रूप से आगे बढ़े, लेकिन भावनात्मक रूप से पीछे न छूटे।

यह समय केवल सोचने का नहीं, बदलने का है।

हमें अपने भीतर झांकना होगा-क्या हम किसी गिरते हुए इंसान को उठाने के लिए तैयार हैं, या सिर्फ उसे रिकॉर्ड करने के लिए? क्योंकि अगर संवेदनाएं खो गईं, तो प्रगति का कोई अर्थ नहीं बचेगा।

 

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