जलेस का स्थापना दिवस मनाया करनाल में विचार गोष्ठी व कविता पाठ का आयोजन
करनाल। जनवादी लेखक संघ के 45वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में जनवादी लेखक संघ करनाल इकाई द्वारा एक विचार गोष्ठी एवं कविता पाठ करवाया गया। मुख्य अतिथि प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एवं काउंसलर डॉ विक्रम चौहान थे।

प्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अशोक भाटिया ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। मंच संचालन जनरल सेक्रेटरी दीपक वोहरा ने किया।
इस कार्यक्रम में दो सत्र थे। पहला सत्र विचार गोष्ठी था जिसमें दीपक वोहरा ने जनवादी लेखक संघ की स्थापना के इतिहास पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि यह दिन केवल एक संगठन की स्थापना का स्मरण नहीं, बल्कि उस विचारधारा, उस प्रतिबद्धता और उस संघर्ष की याद है, जिसने साहित्य को जन–जन की आवाज़ बनाया। जनवादी लेखक संघ की स्थापना 13 फरवरी 1982 को इस उद्देश्य से हुई थी कि साहित्य को समाज के शोषित, वंचित और पीड़ित वर्गों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जाए। यह संगठन मानता है कि साहित्य केवल सौंदर्यबोध नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सशक्त औज़ार है।
दूसरे सत्र में कविता पाठ का शुभारंभ में सबसे पहले एडवोकेट विक्रम कुमार ने जनवादी कवि मनजीत भोला की ग़ज़ल की कुछ शेर सुनाए। जरा बानगी देखिए–
कौन जाकर अब कहे दरबारियों के सामने
भूक मुँह बाये खड़ी है बस्तियों के सामने
जोनी पांचाल ने विवाह के पश्चात् रिश्तों में जो बदलाव आता है, आपसी रिश्ते और प्यार दरकने लगता है , इस विषय पर अपनी कविता सुनाई। इसके साथ ही महेंद्र कौल जो कि रिटायर्ड बैंक मैनेजर हैं, उन्होंने अपने जीवन में जातीय उत्पीड़न के अनुभव पर कविता पाठ किया। अध्यापक और कवि दयाल जास्ट ने अपनी कविता में कहा–
ये सही वक्त है हमको संभलना चाहिए।
इस पत्थर दिल को कुछ पिघलना चाहिए।
दीपक वोहरा ने अपनी कविता सुनाई—
फ़ूल/ झर चुका है/ डाल से
पर/ हवा में /तैर रही है
अब भी/ उसकी सुगंध
और/ हमारी स्मृति में
वो/ फिर-फिर खिलता है
खुश्बू बन कर
समकालीन हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर राजेश भारती ने अपनी ग़ज़ल सुनाई। जरा गौर फरमाए–
गूंगा होकर बोल रहा है
तुमसे बेहतर बोल रहा है
ख़ून बहा है मज़लूमों का
सारा मंज़र बोल रहा है
वरिष्ठ साहित्यकार और लघु कथाकार डॉ अशोक भाटिया ने तीन लघुकथाएं सुनाई।
उनकी एक लघु कथा (बस ऐसे ही) देखिए–
– -आप मंदिर क्यों जाते हैं?
– – ताकि ईश्वर की कृपा बनी रहे।
– -पर आप तो कहते हैं कि सब कुछ पहले से लिखा है। फिर मंदिर जाने की क्या जरूरत है ?
– बस ऐसे ही।
इस मौके पर पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें यूनिक पब्लिशर्स की पुस्तकें जयपाल जी के कविता संग्रह: बंद दरवाजे, कविता भी तुम्हें देखती है; महिला सफाईकर्मियों की आपबीती जहर जो हमने पीया और कर्मचंद केसर का हरियाणवी ग़ज़ल संग्रह: गुल्लर के फूल, राजेश भारती का कविता संग्रह: रेत पर रेखाएं शामिल थी।
दयाल जास्ट, देवाशीष चौहान, समर्थ वोहरा, अंजलि व अन्य अनेक साहित्य-प्रेमी उपस्थित रहे। गोष्ठी का समापन साहित्यिक संवाद और आपसी विचार-विमर्श के साथ हुआ। अंत में सचिव दीपक वोहरा ने सभी का धन्यवाद किया।
