बात बेबात
विकास इतना हो गया है कि बचत भी डाइट पर…
विजय शंकर पांडेय
सरकार ने जब से “सबका साथ, सबका विकास” का नारा दिया है, तब से प्राइवेट नौकरी वालों का साथ सिर्फ़ पीएफ ही दे रहा था। अब खबर है कि उसी पीएफ के ब्याज पर भी कैंची चलाने की तैयारी है। यानी अब विकास इतना हो गया है कि बचत भी डाइट पर डालनी पड़ रही है।
प्राइवेट सेक्टर का कर्मचारी हर महीने खुशी-खुशी अपनी सैलरी का 12% पीएफ में जमा करता है। कंपनी भी दिल खोलकर योगदान देती है—हालाँकि दिल खोलना HR की मजबूरी होती है। कर्मचारी सोचता है, “चलो बुढ़ापे में काम आएगा।” लेकिन सरकार सोचती है, “चलो अभी काम आ जाए।”
ईपीएफओ हर साल ब्याज देता है, ताकि कर्मचारी को लगे कि उसका पैसा बैंक में नहीं, भरोसे में है। अब अगर ब्याज घटा तो कर्मचारी को समझ आएगा कि भरोसा भी शेयर मार्केट जैसा होता है—कभी ऊपर, कभी नीचे।
महंगाई रॉकेट की तरह ऊपर जा रही है, और पीएफ का ब्याज सीढ़ियों से नीचे उतरने को तैयार है। कर्मचारी अब एक्सेल शीट में दो कॉलम बनाएगा—एक में “उम्मीदें” और दूसरे में “सरकारी फैसले”। दूसरे कॉलम में हमेशा माइनस दिखेगा।
कुल मिलाकर, सरकार का संदेश साफ़ है, “आज मेहनत करो, कल बचत करो, पर ब्याज के सपने मत देखो।”
क्योंकि सपनों पर टैक्स भले न लगे, ब्याज पर कैंची ज़रूर चल सकती है।

लेखक -विजय शंकर पांडेय
