समकालीन चुनौतियां और आगे का रास्ता
रोजगार को निगल रहा है बाजार
रोजगार का स्वरूप बदला :
सत्यपाल सिवाच
उद्योगों के साथ-साथ सरकारी, अर्धसरकारी, स्वायत्तशासी, सहकारी आदि सभी सार्वजनिक संस्थाओं में नियमित एवं पूरा वेतन पाने वाले कर्मचारियों की जगह अलग-अलग पदनाम से कच्चे, असुरक्षित और कम वेतन पाने वाले कर्मचारी लगाए जा रहे हैं। एचकेआरएन, ठेका, आउटसोर्स, जॉब कांट्रैक्ट, कैजुअल लेबर, अप्रेंटिस, ट्रेनी, होम-बेस्ट काम, अतिथि, अनुबंध, शिक्षा मित्र, वन मित्र, पशुधन मित्र, रहबर-ए-तालीम, मल्टी टास्किंग, एक्सटेंशन लेक्चरर, रिटायर्ड कर्मचारियों की रि-इंपलाइमेंट, स्कीम, प्रोजेक्ट आदि तरीकों से कच्चे और कम वेतन वाले कर्मचारियों की संख्या पक्कों के बराबर ही पहुंचने वाली है। खर्च घटाने और कर्मचारियों की सांगठनिक ताकत को कम करने – दोनों ही उद्देश्यों से यह नुस्खा इस्तेमाल किया जा रहा है।
पहले से स्वीकृत पदों और परम्परागत कार्यों के लिए भी नियमित भर्ती को नजरअंदाज किया जाता रहा है। अस्थायी नियुक्तियों के लिए स्थायी ‘कौशल रोजगार निगम’ का गठन किया गया है। सफाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए नगर निकाय समेत सभी क्षेत्रों में नियमित भर्ती बन्द कर दी है। इसका सामाजिक संदर्भ भी है, क्योंकि सफाई कर्मचारी का काम लगभग एक ही समुदाय के लोग करते रहे हैं। एक दौर में नियमित भर्ती होती थी तो उनके परिवारों की हालत बेहतर हो जाती थी। उनमें से बहुतों के बच्चे पढ़-लिखकर दूसरे कामों में लग गए। ठेकेदार की नौकरी का मतलब होगा पूरे समुदाय को नारकीय जीवन से बाहर न निकलने देना।
*आई टी और कम्प्यूटर* का काम लगभग पूरी तरह *आउटसोर्स* किया गया है। सरकारी कार्यालयों में अलग-अलग सेवाएं देने वाले इन कर्मचारियों का वेतन और इन्हें नियुक्त करने वाली एजेंसी की कमाई सेवाओं के उपभोक्ताओं से यूजर चार्जिज के रूप में वसूल की जाती है।
*स्कूलों में कम्प्यूटर टीचर्स और वोकेशनल शिक्षक* भी ठेका प्रणाली के अन्तर्गत ही हैं। स्वीकृत पदों पर सेवानिवृत्ति के बाद रि-इम्प्लायमेंट कम वेतन पर काम लेने का ही तरीका है। अतिथि/अनुबंध शिक्षक भी स्वीकृत पदों पर ही लगाए गए हैं। इन्हें न पूरा वेतनमान देना, न डीए, न वार्षिक वेतन वृद्धि, न मेडिकल भत्ता, न मकान किराया, न एलटीसी या चाइल्ड केयर अलाऊंस और न मृत्यु हो जाने पर आश्रित को अनुग्रहपूर्वक नौकरी। ऐसा ही तबका सर्व शिक्षा अभियान व राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान में काम करने वालों का है।
स्वास्थ्य विभाग में आशा, एन एच एम और आउटसोर्स कई शोषण मॉडल चल रहे हैं। जो किसी भी प्रकार की अस्थायी नौकरी में हैं उन्हें बताया जा रहा है कि सेवाएं नियमित करना संभव नहीं है, क्योंकि नियमों में नहीं है। नियम कहाँ से आए हैं? वे भी सरकार ने ही बनाए हैं। सरकार चाहे तो बदल सकती है। ये शाश्वत या सनातन नहीं हैं। जहाँ कहीं मजबूत लड़ाई हो जाती है तो 58 वर्ष की आयु तक बनाए रखने का आश्वासन दे देते हैं।
अब तो उससे भी आगे बढ़कर *फिक्स्ट टर्म नियुक्ति* की अवधारणा पेश की जा रही है। बहुत जगह मध्य वर्गीय कर्मचारियों के पदनाम बदलकर उन्हें अहसास कराया जा रहा है वे प्रशासन का हिस्सा हैं। पदों के आगे साहब, आफिसर, एक्जीक्यूटिव आदि जोड़ दिया गया है। चौकीदार या गेटकीपर को सिक्युरिटी पर्सनल या आफिसर कहने लगे। नर्सिंग स्टाफ को भी कुछ ऐसे ही नाम दिए गए हैं।
कम्प्यूटर आपरेटर अब संसाधन या *रिसोर्स* हो गए। उन्हें आदमी से औजार ही बना दिया। *मल्टी टास्किंग* तो एकदम नया आइडिया है, एक आदमी से कई सीटों का काम लो। विशेषकर चतुर्थ श्रेणी और क्लेरिकल स्टाफ के लिए यह नया रूप गढ़ा गया लगता है।
वर्तमान समय के अनुरूप कोई भी नया काम आ गया तो उसके लिए नियमित पद स्वीकृत ही नहीं किये जाते। ऐसे कर्मचारी अस्थायी रूप में लगाए जाते हैं। बहुत से मामलों में काम ही आउटसोर्स कर दिया जाता है। कई स्थायी प्रकृति के पुराने कामों के लिए भी स्कीम या प्रोजेक्ट बनाकर वालंटियर, स्वयं सेवक, आशा, मिड डे मील वर्कर, आंगनबाड़ी, एक्टिविस्ट, यशोदा, ममता आदि नाम देकर नियुक्ति की जाती हैं। मकसद वही है, इन्हें कर्मचारी न माना जाए; पूरा वेतन न दिया जाए, कोई सुविधा न दी जाए और भविष्य की सुरक्षा न दी जाए।
इस आकलन के आधार पर आगे बढ़ने के लिए हमें कई स्तरों पर साथ-साथ पहल करनी होंगी। सबसे पहले तो नेतृत्व के स्तर पर संघ के ढांचे व माँग पत्र को देखना होगा। माँग पत्र में अधिकतम हिस्सों को छूने वाली साँझा माँगें ही लिखी जाएं। प्रत्येक माँग के पीछे के तर्क, आधार और साक्ष्य अलग से लिखे जाएं। इससे प्रशासन के समक्ष उनका औचित्य सिद्ध करने में सफलता मिलेगी। यूनियनों या विभागों की विशिष्ट माँगें इनमें समाहित रहेंगी। यूनियन अपने अलग माँग पत्र में अपनी विशिष्ट माँगों के उदाहरण देंगी।
