वैश्विक जगत पर सिनेमा और कला–संस्कृति : 2025 के निर्णायक रुझान
राम आह्लाद चौधरी
कला का विकास किसी निर्वात में नहीं होता। चाहे यह प्रक्रिया कितनी ही विरोधाभासी, असमान और जटिल क्यों न हो, कला की दिशा अंततः विश्व की सामाजिक–आर्थिक गति से निर्धारित होती है। 2025 में, जब वैश्विक स्तर पर साम्राज्यवादी आक्रामकता और हिंसा नए शिखरों तक पहुँची, और लगभग हर पूँजीवादी सरकार की नीतियों के विरुद्ध जन-विरोध उभरता दिखाई दिया, तब यह स्वाभाविक था कि इन तनावों की प्रतिध्वनि कला, फिल्म और टेलीविजन के क्षेत्र में भी स्पष्ट रूप से सुनाई दे।
गाज़ा में चल रहे नरसंहार के विरोध में हुए व्यापक प्रदर्शनों और उसके परिणामस्वरूप कलाकारों, फिल्म निर्माताओं, अभिनेताओं तथा सांस्कृतिक संस्थानों के बीच उत्पन्न टकरावों ने 2025 की सांस्कृतिक राजनीति को निर्णायक रूप से चिह्नित किया। अमेरिका और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा समर्थित इज़रायली अपराधों के विरुद्ध उभरा आक्रोश केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने कला जगत, फिल्म उद्योग और टेलीविजन को भी गहराई से प्रभावित किया। इसके विपरीत, सांस्कृतिक क्षेत्र की अनेक प्रभावशाली हस्तियाँ खुलकर अपनी सरकारों के साथ खड़ी रहीं—अर्थात् सामूहिक हत्या के सहयोगियों के साथ।
सिनेमा और टेलीविजन : संकटग्रस्त यथार्थ की अभिव्यक्ति
2025 में ऐसी फिल्मों और टेलीविजन शृंखलाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिन्होंने समकालीन सामाजिक–राजनीतिक उथल-पुथल को विषय बनाया। फासीवाद और तानाशाही के बढ़ते ख़तरे, प्रवासियों पर हमले, तथा अरबपति कुलीन वर्ग के निरंकुश प्रभुत्व जैसे प्रश्न अनेक रचनाओं के केंद्र में रहे। यद्यपि इन कृतियों की शैली और कलात्मक गुणवत्ता में भारी अंतर था, फिर भी एंडोर, वन बैटल आफ्टर अनदर, माउंटेनहेड, द फोनीशियन स्कीम, सौलेमेन की कहानी, बुगोनिया और एनिवर्सरी जैसी फिल्मों ने इन साझा चिंताओं को अभिव्यक्त किया।

मध्य पूर्व से आई फिल्मों और वृत्तचित्रों ने जीवन-मरण के प्रश्नों को और भी प्रत्यक्षता से सामने रखा। टू अ लैंड अननोन, पुट योर सोल ऑन योर हैंड एंड वॉक, याल्ला पार्कौर, पैलेस्टाइन 36 और द वॉइस ऑफ हिंद रजब जैसी कृतियाँ केवल कलात्मक अभिव्यक्तियाँ नहीं रहीं, बल्कि वे ऐतिहासिक साक्ष्य और प्रतिरोध के दस्तावेज़ बन गईं।
सेंसरशिप, प्रतिरोध और सांस्कृतिक टकराव
2025 में सरकारों और सांस्कृतिक कर्मियों के बीच सेंसरशिप को लेकर संघर्ष एक नियमित घटना बन गया। विशेष रूप से युवाओं में बढ़ते सत्ता-विरोधी और पूँजीवाद-विरोधी भावों को दबाने के लिए हताश प्रयास किए गए। संगीत समारोहों, फिल्म महोत्सवों और पुरस्कार समारोहों में खुले विरोध आम होते गए। आयरिश बैंड नीकैप जैसे कलाकारों ने शासक अभिजात वर्ग और उनके समर्थकों के तीव्र आक्रोश के बीच हज़ारों लोगों को “फ्री फ़िलिस्तीन” के नारे लगाने के लिए प्रेरित किया।
‘नो अदर लैंड’ और संस्थागत पाखंड
वेस्ट बैंक में ज़ायोनी आतंक पर आधारित फिल्म नो अदर लैंड का 2025 के अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का सम्मान प्राप्त करना एक ऐतिहासिक क्षण था। 2 मार्च को आयोजित समारोह में सह-निर्देशकों बेसल अदरा और युवल अब्राहम की उपस्थिति ने हॉलीवुड के भीतर सुलगते राजनीतिक तनाव को सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया। गाज़ा नरसंहार का विरोध करने वाले कलाकारों को ब्लैकलिस्ट करने के आदी हॉलीवुड अधिकारी इस दृश्य पर केवल असहज मौन साध सके।
हालाँकि, पुरस्कार समारोह के मात्र तीन सप्ताह बाद, फिल्म के तीसरे सह-निर्देशक हमदान बल्लाल पर इज़रायली बस्तियों के लोगों द्वारा किए गए क्रूर हमले पर अकादमी नेतृत्व की चुप्पी ने उसके वास्तविक चरित्र को उजागर कर दिया। जिस व्यक्ति को उसने सम्मानित किया था, उसी पर हुए हमले पर उसका मौन संस्थागत पाखंड का प्रतीक बन गया।
अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव और जन-आक्रोश
बर्लिन फिल्म महोत्सव में, जीवन-पर्यंत उपलब्धि पुरस्कार स्वीकार करते हुए टिल्डा स्विंटन ने “राज्य द्वारा किए गए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थित नरसंहार” की स्पष्ट निंदा की और गाज़ा की पृष्ठभूमि में शरणार्थियों के सामूहिक निर्वासन के अभियान की ओर ध्यान आकर्षित किया।
सितंबर में वेनिस फिल्म महोत्सव के दौरान हुए विशाल प्रदर्शन ने इतिहास रच दिया। आयोजकों के अनुसार यह किसी बड़े फिल्म आयोजन में अब तक का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन था। हज़ारों लोग फिलिस्तीनी झंडों के साथ “आज़ाद फ़िलिस्तीन” और “नरसंहार बंद करो” के नारे लगाते हुए सड़कों पर उतरे।
उद्योग संकट और श्रमिकों पर हमला
राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा संबंध फिल्म और टेलीविजन उद्योग में कलाकारों और श्रमिकों की नौकरियों पर हो रहे हमलों से है। चैलेंजर ग्रे की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के पहले 11 महीनों में 17,000 से अधिक नौकरियाँ समाप्त हुईं—जो पिछले वर्ष की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक है। 2024-25 के बीच कुल मिलाकर 32,000 नौकरियाँ समाप्त हो चुकी हैं। कॉर्पोरेट विलय, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और सस्ते श्रम वाले देशों में उत्पादन का स्थानांतरण इसके प्रमुख कारण हैं।
लॉस एंजिल्स काउंटी में मोशन पिक्चर उद्योग में कार्यरत लोगों की संख्या दो वर्षों में लगभग 30 प्रतिशत घट चुकी है। टेलीविजन निर्माण के आँकड़े और भी भयावह हैं—2021 की तुलना में 2024 में शूटिंग दिनों में लगभग 60 प्रतिशत की गिरावट।
इस रोजगार-संहार पर मनोरंजन संघों की प्रतिक्रिया यह रही कि उन्होंने बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ हाथ मिला लिया और संकीर्ण, राष्ट्रवादी “लोकलाइज़ेशन” अभियानों में शामिल हो गए, जिससे अंतरराष्ट्रीय श्रमिक एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े कर दिए गए।
प्रतिक्रांति, संस्कृति और सत्ता
विश्व-व्यापी उग्रवाद के उभार ने शासक वर्गों को भयभीत कर दिया है। इसके प्रत्युत्तर में वे उन्मादी प्रतिक्रांति की ओर बढ़ रहे हैं। ट्रंप प्रशासन के नेतृत्व में संस्कृति और आलोचनात्मक चिंतन के विरुद्ध खुले युद्ध छेड़े गए—चाहे वह केनेडी सेंटर हो, स्मिथसोनियन संस्थान, सार्वजनिक प्रसारण या कला-संस्कृति को मिलने वाली संघीय सहायता। पिछले दो सौ वर्षों की सांस्कृतिक प्रगति को नष्ट करने के इन प्रयासों का न तो डेमोक्रेटिक पार्टी ने और न ही मुख्यधारा मीडिया ने कोई गंभीर प्रतिरोध किया।
कला, इतिहास और भविष्य
2025 की अनेक फिल्मों में सामाजिक प्रश्नों को गंभीरता से उठाने का प्रयास दिखाई देता है—यह एक सकारात्मक संकेत है। किंतु अधिकांश फिल्म निर्माताओं में ऐतिहासिक और सामाजिक समझ की भारी कमी बनी हुई है, विशेषकर 20वीं सदी की निर्णायक घटनाओं के संदर्भ में—रूसी क्रांति, स्टालिनवाद, फासीवाद, अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके वैश्विक संकट।
इसी संदर्भ में दिसंबर 2025 में सोशलिज़्म एआई का शुभारंभ एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक-राजनीतिक घटना रहा। इसने अंतरराष्ट्रीय श्रमिक वर्ग की राजनीतिक शिक्षा और लामबंदी के लिए उन्नत तकनीक के प्रयोग पर एक नई बहस को जन्म दिया।
साथ ही, जर्मनी का इज़राइल के प्रति जुनून नामक वृत्तचित्र ने गाज़ा नरसंहार का विरोध करने वालों पर जर्मन सरकार के दमन को उजागर किया और यूरोपीय लोकतंत्रों के पाखंड को सामने लाया।
कला और सामाजिक क्रांति
यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक कलाकार सीधे राजनीतिक विषयों पर ही काम करे। अंतरंग, गीतात्मक और काव्यात्मक कृतियों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। किंतु ऐसी रचनाएँ भी तभी स्थायी और सार्थक होंगी जब वे उस सामाजिक यथार्थ को समझें जिसमें मानवता जी रही है और संघर्ष कर रही है—जब वे सचमुच “दुनिया को नए सिरे से महसूस करने” का प्रयास करें।
कला स्वयं को अकेले नहीं बचा सकती। वह न तो सामाजिक संकट से अलग रह सकती है और न ही उसके ऊपर उठ सकती है। उसका भविष्य अनिवार्य रूप से सामाजिक क्रांति के भविष्य से जुड़ा हुआ है।
( लेखक साहित्य संस्कृति और समाज के अध्येता हैं)

लेखक- राम आह्लाद चौधरी
