हरियाणा : जूझते जुझारू लोग – 107
भगवानदत्त शर्मा – लम्बी पारी के समर्पित योद्धा
हरियाणा के अध्यापक और कर्मचारियों के आन्दोलन में लम्बे समय तक जमकर काम करने वाले नेताओं में भगवानदत्त शर्मा ऐसी शख्सियत हैं जो कभी विचलित नहीं हुए। वर्षों लम्बे सानिध्य के आधार पर मैं दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि वे निजी स्तर पर भिन्न विचारों को संगठन के बीच में नहीं लाते थे।
आन्तरिक जनतंत्र और अनुशासन को वे बहुत महत्व देते थे। मैंने उन्हें कभी आन्दोलनों के बीच विचलित नहीं देखा। वे व्यक्तिगत रूप से पूर्व मंत्री श्री मांगेराम गुप्ता के करीबी रहे लेकिन संगठन और आन्दोलन के मामले कभी समझौतावादी रूख नहीं अपनाया।
उनका जन्म 10.08.1947 यानी स्वतंत्रता दिवस से ठीक पाँच दिन पहले हुआ था। उनकी माँ श्रीमती नानो देवी और पिता श्री बदलूराम निवासी जीतगढ़ जिला जीन्द एक किसान और पशुपालक थे। वे तीन भाई और दो बहनें हैं। गाँव में स्कूल नहीं था तो माँ उन्हें अपने गाँव करोड़ा में पढ़ने के छोड़ दिया। वहीं से भगवानदत्त ने दसवीं कक्षा पास करने के बाद दो वर्षीय जे.बी.टी. प्रशिक्षण प्राप्त किया।
पहले 1967 अस्थायी और 24.09.1968 को स्थायी आधार पर प्राथमिक शिक्षक नियुक्त हो गए। सेवाकाल में उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करना जारी रखा तथा बी.ए. बी.एड. उपाधियां प्राप्त की। वे पदोन्नति के जरिए सन् 1992 में एस एस मास्टर बने और कई वर्ष तक जीन्द स्थित गवर्नमेंट एलिमेंट्री टीचर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में अध्यापक प्रशिक्षक के रूप में काम किया। वे दिनांक 31.08.2005 को एस एस मास्टर पद से सेवानिवृत्त हो गए।
वे अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान और परिश्रमी रहे। जहाँ भी तैनात रहे वहाँ छात्रों और अभिभावकों के बीच बहुत बेहतरीन रिश्ते बनाए। जब टीचर्स ट्रेनिंग में कार्यरत थे तो इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि भावी अध्यापकों के पास स्तरीय ज्ञान और कौशल पहुंच सके। इस उद्यम में वे दूसरे स्रोतों से नई जानकारियां जुटाते रहते थे।
उन्होंने सन् 1969 हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के गठन के समय से ही काम शुरू कर दिया था। वे संगठन में 1973 में ब्लॉक प्रधान चुने गए; उसके बाद 1984 से 1992 तक जिला सचिव व जिला प्रधान का उत्तरदायित्व संभाला और 1992 में वे राज्य के संगठन सचिव के रूप में मुख्य नेतृत्व का हिस्सा बने। सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा के गठन के पश्चात वर्षों तक जिला स्तर पर काम किया।
भगवानदत्त शर्मा को अगली पंक्ति के जुझारू नेता के रूप में पहचाना जाता रहा है। वे पुलिस या प्रशासन के साथ टकराव की स्थिति में हमेशा आगे रहते थे। सन् 1973 की हड़ताल में उन्होंने दिल्ली में गिरफ्तारी दी और 36 दिन तिहाड़ जेल में रहे। इसके बाद सन् 1980 के आन्दोलन में चण्डीगढ़ की बुड़ैल जेल में रहे।
हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ में आन्तरिक विवाद छिड़ने पर पूर्व अध्यक्ष मास्टर सोहनलाल ने दूरस्थ स्कूल में बदलवा दिया। उन्होंने इस विषय पर यूनियन के मंच से ही संघर्ष किया तथा पूर्व राज्याध्यक्ष मदनगोपाल शास्त्री के जरिए नेतृत्व की ओछी हरकत को बेनकाब किया। फिर भी अध्यापक संघ के साथ दृढ़ता से खड़े रहे। सन् 1985 में जब व्यक्ति की तानाशाही के खिलाफ अध्यापक संघ में माहौल बनने लगा तो वे प्रगतिशील और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के पक्ष में मजबूती के साथ खड़े हुए।
इस तरह जीन्द जिले और राज्य भर में संगठन को बचाने वाले जागरूक कार्यकर्ताओं में शामिल हुए। वे 4 सितंबर 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी से मिलने वाले डेलिगेशन में शामिल थे जिसके चलते राज्य में मेडिकल भत्ता और मकान किराया भत्ता सभी कर्मचारियों को मिलने लगा।
वे सन् 1986-87 के ऐतिहासिक संघर्ष में जीन्द जिले और विशेषकर अध्यापक वर्ग के बीच मुख्य किरदारों में से एक थे। वे इस दौर में हुई सभी हड़तालों व अन्य गतिविधियों में शामिल रहे। उन्हें इस समय निलंबित किया गया था जो आन्दोलन के बाद समाप्त हुआ। इस लड़ाई से लेकर सेवानिवृत्त होने तक सभी संघर्षों में शामिल रहे।
उन्हें सन् 1989 में विधायक आवास पर धरने के समय भी गिरफ्तार किया गया और आठ दिन जेल में रहे। सन् 1993 की हड़ताल वे बर्खास्त किए गए और 15 दिसम्बर 1993 को समझौता होने पर बहाल हुए। इसके बाद राज्य में अलग वेतन आयोग बनवाने के संघर्ष में वे सक्रिय रहे। वे सन् 1994 के बाद पदाधिकारी नहीं बने लेकिन आन्दोलनों में सक्रिय रहे। सन् 1996-97 के पालिका आन्दोलन और 1998 की नर्सिंग हड़ताल के दौरान उन्होंने पद न होते हुए अच्छी भूमिका निभाई। सन् 1991 से सन् 2005 तक हुई सभी ऑल इंडिया हड़तालों में भाग लिया। स्थानीय स्तर उन्हें अनेक बार हिरासत में लिया गया।
उनके किरदार को समझने के दो प्रसंगों का उल्लेख करना आवश्यक लगता है। जब अध्यापक भवन जीन्द पर कब्जा करने की नीयत से तत्कालीन नेतृत्व द्वारा सहकारी बैंक को किराए पर दे दिया गया तो भगवानदत्त जी ने स्थानीय कार्यकर्ताओं की मदद से बैंक वालों सामान बाहर फैंकवाने में साहसिक भूमिका निभाई। उसके बाद आन्दोलन के जरिए किराए का अनुबंध रद्द करवाया। सन् 1987 में चौधरी देवीलाल मुख्यमंत्री थे। उनके जीन्द दौरे के समय अध्यापकों के तबादलों में अनियमितता की शिकायतें आई तो उन्होंने जिला शिक्षा अधिकारी को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया।
इस पर भगवानदत्त व जिला के साथियों ने मुख्यमंत्री से मिलकर बताया कि अनियमितता के लिए डीईओ नहीं, शिक्षा मंत्री के भाई का हस्तक्षेप व बिना नीति के तबादले करना मुख्य कारक रहा है। उनके मौके पर हस्तक्षेप से मुख्यमंत्री प्रभावित हुए। प्रशासन की मदद से रातोंरात अध्यापक संघ के राज्य नेतृत्व को एकत्रित करवाया तथा अगले दिन स्थानांतरण नीति पर रोहतक में मुख्यमंत्री के साथ महत्वपूर्ण बैठक हुई। भगवानदत्त जी में मौके के अनुसार ठोस व सटीक हस्तक्षेप करने की तत्पर बुद्धि थी।
वे बचपन से उत्साही स्वभाव के थे। नाना के घोड़ी थी तो वे घुड़सवार बन गए। वे धार्मिक विचारों के थे लेकिन पाखंड व अंधविश्वास के खिलाफ थे। ननिहाल में रहते बणी में आग जलती देखकर वहाँ पहुंच गए। एक निर्वस्त्र होकर पुड़े बना रही थी। उसके पास जाकर गमछा दिया और कारण पूछा तो वह किसी पाखंडी बाबा के बहकावे में आकर सन्तानोत्पत्ति के लिए ऐसा कह रही थी। उसके बनाए पुड़े खा लिए तथा उसे समझा कर घर तक छोड़ा। वे उन दिनों कबड्डी और कुश्ती के शौकीन बन गए थे। स्कूल स्तर पर बहुत बार ईनाम जीते। ग्रामीण खेलों में कबड्डी के रैफरी बनते थे।
इलाके में प्रमुख व्यक्तियों शामिल होने के कारण उनके श्री मांगेराम गुप्ता, चौधरी वीरेन्द्र सिंह, जयप्रकाश, बृजमोहन सिंगला, डॉक्टर मिड्ढा, रामकुमार गौतम, डी पी वत्स आदि अनेक नेताओं से सम्बन्ध रहे। आईएएस अमित खत्री से भी उनकी नजदीकी रही। वे सामूहिक कार्यों के लिए तो अनेक बार इनसे मिले लेकिन निजी लाभ नहीं उठाया। भगवानदत्त जी एक भरोसेमंद साथी और सहयोगी रहे हैं। वे प्रखर वक्ता थे। बेबाक, बेलाग और बेदाग रहे। संगठन में उन्हें साफगोई, दृढ़ निश्चय और जुझारूपन के लिए जाना जाता है। सामाजिक मामलों के निपटारे के लिए वे कण्डेला खाप की गतिविधियों में भी सक्रिय रहते थे।
उनका विवाह सन् 1968 में श्रीमती सुखदेवी के साथ हुआ। यूनियन व दूसरे सामाजिक कार्यों में उनकी सक्रियता धर्मपत्नी के सहयोग के बिना संभव नहीं हुई होती। वे बहुत सकारात्मक ऊर्जा के साथ घर को संभालने के अलावा घर आए मेहमानों के लिए भी बहुत उदार रही हैं। ध्यान रहे कि उन दिनों यूनियन के कार्यकर्ता अपने साथियों के घरों पर ही रूकते थे। इनकी तीन संतान हुई। बेटा सुशील कुमार एम.ए. बीएड है और शिक्षा विभाग में हिन्दी प्राध्यापक है और पुत्रवधू सुश्री अंजू शर्मा प्राथमिक शिक्षक हैं। बड़ी बेटी निर्मला दसवीं तक पढ़ीं हैं व उनके पति वीएलडीए पद से रिटायर हुए हैं। दूसरी बेटी कमलेश ने दस+दो तक शिक्षा प्राप्त की और दामाद मुख्याध्यापक पद से सेवानिवृत्त हैं। अगली पीढ़ी में दो पोतियां और एक पौत्र परीक्षित है।
भगवानदत्त 29.10.2021 को डेंगू की बीमारी के कारण अपनी सांसारिक यात्रा पूरी करके चले गए हैं। वे जिन्दल हस्पताल हिसार में दाखिल थे। प्लेटलेट्स कम होने के कारण दसवें दिन अचेत हो गए और फिर नहीं उठे। उससे पहले वे कोरोना की चपेट में आ गए थे जिसके चलते काफी कमजोर गए थे। इसी कारण वे डेंगू का वार नहीं झेल पाए। उनमें जिजीविषा बहुत अधिक थी। भयावह बीमारी में वे उत्साह के साथ रहे। कभी चेहरे पर नैराश्य भाव नहीं आया। फिलहाल बेटा व परिवार जीन्द में रहते हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद वे रामराय स्थित संस्कृत महाविद्यालय की प्रबंधक कमेटी के सचिव रहे और वर्षों तक संस्था के बेहतरीन संचालन में श्रीयुत् ऋषिकांत शर्मा व श्रीयुत् फूलकुमार शास्त्री के साथ कार्य किया। बाद में उन्हें ब्राह्मण धर्मशाला जीन्द का अध्यक्ष चुना गया तो उन्होंने इसके विस्तार में अहम् भूमिका निभाई। इसी दौर में सफीदों रोड भगवान परशुराम के नाम पर चौक का निर्माण भी करवाया।
