बलबीर ठाकन – कर्मचारी संगठन से किसान आन्दोलन तक सफर

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 103

बलबीर ठाकन – कर्मचारी संगठन से किसान आन्दोलन तक सफर

सत्यपाल सिवाच

बलबीर सिंह ठाकन पशुपालन विभाग से रिटायर होने के बाद अखिल भारतीय किसान सभा के मंच से काफी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनका जन्म 4 फरवरी 1956 को आर्मी अस्पताल झांसी में हुआ था। पिता श्री जगराम ठाकन भारतीय सेना में थे और माँ शान्ति देवी गृहिणी थी। वे चार भाई और तीन बहन हैं। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार से वीएलडीए करने बाद वे 22 नवंबर 1976 को पशुधन सहायक पद पर सरकारी सेवा में आ गए। उन्होंने ग्रेजुएशन तक शिक्षा प्राप्त की। 30 अप्रैल 2007 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।

वे सन् 1984 डिप्लोमा वैटरनरी एसोसिएशन में सक्रिय हुए और सन् 2008 में सेवानिवृत्त होने तक लगे रहे। इसी प्रकार 1993 में आल इंडिया फेडरेशन में भाग लेने लगे। वर्ष 1993 से 2008 तक सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा में भी सक्रिय रहे। सेवानिवृत्ति के बाद से लगातार अखिल किसान सभा में पदाधिकारी हैं। उन्होंने पहली बार 1993 में उस समय के लोकप्रिय नेता के विरुद्ध महासचिव पद पर चुनाव लड़ा और हार गए। सन् 1996 में संदीप राणा और वे क्रमशः प्रधान व महासचिव बने। इसके बाद सेवानिवृत्त होने तक बलबीर ठाकन लगातार पदाधिकारी रहे। वे 2004 से 2006 तक फिर महासचिव रहे। वे सर्वकर्मचारी संघ की केन्द्रीय कमेटी में भी रहे।

ठाकन सेवा में आने के बाद से लगातार सक्रिय रहे थे। सन् 1993 में एसोसिएशन ने वर्क टू रूल आन्दोलन चलाया। लगभग डेढ़ महीना तक चले इस संघर्ष में उन्हें चार्जशीट किया गया जो बाद में निरस्त हो गया। संगठन के भीतर नेतृत्व का हिस्सा प्रशासन से मिलकर ट्रांसफर रैकेट चलाता था। इसके चलते दो मोर्चों पर लड़ना पड़ता। यह नेतृत्व सर्वकर्मचारी संघ से सम्बद्धता के पक्ष में नहीं था। काफी आन्तरिक संघर्ष के बाद सम्बद्धता के पक्ष में निर्णय हुआ। जब हिसार में केंद्रीय कमेटी के पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया गया तो उनमें बलबीर ठाकन भी शामिल थे। इस मौके पर वे चार दिन जेल में रहे।

बलबीर सिंह ठाकन को आन्दोलन के दौरान परिवार की ओर से सहज सहयोग मिलता रहा। एकल परिवार है। बच्चे उस समय तक पढ़ रहे थे। धर्मपत्नी ने मान लिया था कि पति को बाहर सक्रिय रहना ही है तो वे सहयोग करती रही हैं। वे बताते हैं कि अब भी किसान सभा के काम से बाहर जाता हूँ तो वे मदद ही करती हैं। उनके किसी बड़े राजनेता या अधिकारियों से घनिष्ठ संबंध नहीं रहे। दरअसल ऐसी कोशिश ही नहीं की। न कभी किसी से कोई निजी काम लिया। बलबीर ठाकन में नियमों को जानने की विशेष रुचि है। इसी के चलते वे जानकारियां जुटाकर संगठनों व व्यक्तियों का मार्गदर्शन भी करते रहे हैं।

उनका विवाह 2 मई 1976 को सुश्री चन्द्रमुखी सांगवान से हुआ। उनकी बेटी कविता मैथेमेटिक्स में एम.एससी. और बी.एड. तक शिक्षा प्राप्त करके राजस्थान में सेकेंड ग्रेड शिक्षक हैं, दूसरी बेटी मंजू बायो-कैमेस्ट्री में एम.एससी. बी.एड. करके हरियाणा में लैक्चरर हैं और तीसरी सुमन एम.ए. अर्थशास्त्र और बी.एड. में है। बेटा अशोक ठाकन इलैक्ट्रोनिक्स व टेलिकम्युनिकेशन में बी. टेक. के बाद पहले एयरटेल में काम करता था। अब पारिवारिक व्यस्तता के चलते घर पर ही है।

पहले और आज के आन्दोलनों में अन्तर पर टिप्पणी करते हुए ठाकन कहते हैं कि प्रत्येक दौर की अपनी समस्याएं होती हैं। संयोगवश हम ऐसे दौर में थे जब संघर्षों और उपलब्धियों का माहौल था। आज के दौर में हमले अधिक हैं और उनका मुकाबला करने के लिए ज्यादा ताकत और समझदारी की जरूरत है। ऐसा लगता है कि अधिकतर लोग संगठनों के बजाय निजी महत्व पर केन्द्रित होते जा रहे हैं। इसलिए अधिक सावधानी की आवश्यकता है।

तीन बातें प्रमुख हैं – हम अभावों के बावजूद शिक्षा व रोजगार प्राप्त कर सके। नयी पीढ़ी ने उपलब्धियों को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ मान लिया है। उदासीनता के चलते पेंशन चली गई, पक्की नौकरी संकट में पड़ गई। संघर्ष ही रास्ता है। सफलता एक बार का ही विषय नहीं है, बल्कि रेले रेस की तरह सबको अपनी भूमिका निभानी है। (सौजन्य ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच

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