हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-68
सत्तर साल की आयु में युवाओं सी सक्रियता – रामफल देशवाल
करनाल जिले (अब पानीपत) के अटावला गांव में 02 जनवरी 1956 को रामफल का जन्म हुआ। उनके पिता जी चतर सिंह आर्मी में थे और माँ सरतोदेवी घर संभालती थीं। यह एक किसान पृष्ठभूमि का साधारण परिवार था। रामफल चार भाई और दो बहनें हैं। रामफल ने 1971 में दसवीं कक्षा पास कर ली थी। उसके बाद 1975 में एस.डी.कॉलेज, पानीपत बी.ए. उत्तीर्ण किया। वे सन् 1981 में हरियाणा सिविल सेवाएं चयन बोर्ड के माध्यम से रोडवेज विभाग में कंडक्टर नियुक्त हो गए। वे 31 जनवरी 2014 को सब-इंस्पेक्टर पद से सेवानिवृत्त हुए।
रामफल भिवानी में रहने लगे थे। शुरुआत में तो इंटक की यूनियन थी। वे सर्वकर्मचारी संघ बनने के बाद ही सक्रिय हुए थे। जब 1989 में भिवानी डिपो में प्रधान पद का चुनाव हारने के बाद बलदेव सिंह ने अलग यूनियन बना ली तो ये बलदेव सिंह के विरोध के लिए इंटक का समर्थन भी करने लगे थे। संभवतः यह 1992 की बात है। साथियों से बातचीत के बाद इस भूल में सुधार किया गया। उस समय यहाँ बामला निवासी महावीर शर्मा भी थे जो यूनियन के महासचिव भी बने। रामफल देशवाल आदि के साथ होने पर वे अधिकारियों व विरोधियों के साथ भिड़ जाते थे।
रामफल देसवाल आन्दोलन में आगे बढ़कर चलने वालों में थे इसलिए बहुत बार लाठीचार्ज में पुलिस की पिटाई का शिकार भी हुए। वे 7 मार्च 1991 में हुए लाठीचार्ज के बाद गिरफ्तार किए गए साथियों में शामिल थे। उस मौके पर 17 दिन जेल में रहे। सन् 1993 के संघर्ष के दौरान उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। वर्ष 1994-95 में शिक्षा बोर्ड कर्मचारियों के 6 महीने लंबे चले जुझारू आंदोलन में 31 जनवरी 1995 को हुए बर्बर लाठी चार्ज में वह और सिरसा से मास्टर गुरटेग सिंह बुरी तरह चोटिल हुए थे। नगरपालिका आन्दोलन (1996-97) में भी जेल गए तथा निलंबित रहे। सन् 1998 में 8 से 11 दिसम्बर तक भी जेल में रहे। तब सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य थे।
वर्ष 2006 में किलोमीटर स्कीम के तहत वोल्वो बसें चलाने के विरोध में 5 मई को हिसार में भारी दमन का सामना किया और एकता के दम पर लाठीचार्ज में घायल हुए 9 साथियों में से एक रहे (जिन्हें सरकार को लाठीचार्ज का मुआवजा देना पड़ा)। यह आंदोलन के दौरान सरकार के दमन के विरुद्ध मुआवजा देने पर मजबूर करने का संभवत पहला उदाहरण होगा।
हरियाणा रोडवेज वर्करज यूनियन में वे संगठन सचिव, कोषाध्यक्ष और वरिष्ठ उपप्रधान रहे। अपनी रिटायरमेंट से एक सप्ताह पहले वर्ष 2014 सर्व कर्मचारी संघ और महासंघ की तालमेल कमेटी के आह्वान पर 21-23 जनवरी को हुई राज्यव्यापी हड़ताल में बिना किसी परवाह के सक्रिय रूप से शामिल रहे। फिलहाल भिवानी जिले में किसान सभा में काम करते हैं। वे दूसरी बार किसान सभा जिलाध्यक्ष हैं और हाल ही में किसान सभा के भट्टू(फतेहाबाद) में हुए राज्य सम्मेलन में राज्य उपाध्यक्ष भी चुने गए हैं । वे सन् 1995 में आजाद सिवाच के जरिए वामपंथी विचारधारा के साथ संपर्क में आए।
उनकी पत्नी सन्तोष देसवाल भी सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे वर्षों तक जनवादी महिला समिति की नेत्री रहीं। अब वे किसान सभा में काम कर रही हैं। उनके दो बेटे हैं। दोनों विवाहित हैं। बड़ा बेटा भिवानी में प्लास्टिक फर्नीचर का काम करता है। छोटा विनोद घर में वामपंथी माहौल से प्रेरित होकर पढ़ाई के बाद होलटाइमर के रूप में रोहतक में ट्रेड यूनियन मोर्चे पर सक्रिय है। छोटे बेटे विनोद और पुत्रवधू अंजू के अपनी पसंद से अंतर्जातीय विवाह करने के फैसले को पूरी आत्मीयता से स्वीकार कर एक उम्दा इंसान होने की परीक्षा में भी सफल रहे। बड़ी पुत्रवधू सुमन सरकारी सेवा में लिपिक है और छोटी पुत्रवधू निजी कॉलेज में पढ़ाती हैं। (सोजन्य: ओम सिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच
