अनीता हत्‍याकांड: एसएसपी नहीं, जादू की छड़ी हैं मूर्ति

अनीता हत्‍याकांड: एसएसपी नहीं, जादू की छड़ी हैं मूर्ति

बेहद सवालों को भी अनसुलझा छोड़ दिया झांसी पुलिस ने

अपनी नाक बचाने को कानून की नाक काटने की कवायद

जवाब जीवंत ज्‍वाजल्‍यमान बड़़ा दारोगा देगा या कोई मूर्ति

कुमार सौवीर

झांसी की सड़कों पर ‘सशक्तिकरण’ का खूनरानी लक्ष्मीबाई की धरती पर एक और औरत मारी गई, लेकिन इस बार किसी युद्ध में नहीं, बल्कि रोज़ी-रोटी की जंग में। तलवार नहीं थी उसके हाथ में, ऑटो का स्टीयरिंग था। सामने कोई घोषित दुश्मन नहीं था, बल्कि वह आदमी था जो यात्री बनकर बैठा, भरोसे की चुप्पी ओढ़े। 40 साल की अनीता चौधरी की हत्या सिर्फ एक और आपराधिक घटना नहीं है; यह उस समाज का बयान है जहाँ एक महिला का ‘ना’ कहना, उसका आत्मनिर्भर होना और अपने पैसे माँगना, तीनों मिलकर उसकी मौत का कारण बन सकते हैं।
झांसी में जो हुआ, वह हत्या से ज़्यादा एक मानसिकता का विस्फोट है। अनीता बुंदेलखंड में महिला सशक्तिकरण की चलती-फिरती मिसाल थीं। ऑटो चलाने वाली महिला जिसे प्रशासन ने सम्मानित किया, मीडिया ने प्रेरणा बताया। लेकिन वही सिस्टम, वही सड़कें, वही रात उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकीं।


लेकिन ऐतराज इस बात पर है कि झांसी की रानी के बाद बुंदेलखंड की सबसे साहसी युवती की ऐसी नृशंस हत्‍या के मामले में भी पुलिस ने अपनी वाहवाही के लिए गहरी छानबीन करने के बजाय केवल खानापूर्ति ही की। पुलिस ने जो थ्‍योरी पेश की है, वह कई सवालों का जवाब दे ही नहीं दे रही है। घटना के 14 घंटों के बाद पुलिस ने पर्दाफाश का ऐलान करके तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया है, मगर साजिश साफ़ है, लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं।
झांसी की सड़कों पर सशक्तिकरण का खून अब सवालों की परतों में डूबा हुआ है! पुलिस ने गिरफ्तारियां कीं, पोस्ट-मॉर्टम कराया, इनाम घोषित किया, लेकिन वो निर्णायक सवाल छोड़ दिए जो इस हत्या को महज एक रिलेशनशिप फॉलआउट से आगे ले जाकर समाज की गहरी सड़ांध उजागर कर सकते थे। अनीता चौधरी की मौत सिर्फ एक गोली की कहानी नहीं है, बल्कि वो एक महिला की आजादी पर लगी रोक की चीख है, और पुलिस की जांच में जो खामियां बाकी रह गईं, वो इस चीख को दबाने जैसी हैं।
बंदूक का स्रोत ट्रेस क्यों नहीं किया गया, जो ये बता सकता था कि मुकेश पहले से हिंसा की तैयारी में था या ये इंप्रोवाइज्ड क्राइम था? और वो गहने, मोबाइल फोन जो गायब हैं, क्या उनकी रिकवरी के लिए कोई ठोस सर्च ऑपरेशन चला, या बस लूट का बहाना मानकर छोड़ दिया गया, जबकि ये प्रतीकात्मक अपमान का हिस्सा हो सकते थे, जैसे शादीशुदा पहचान को मिटाने की कोशिश? परिवार बार-बार सीसीटीवी फुटेज की मांग कर रहा है, लेकिन क्या पुलिस ने रूट के हर कैमरे को स्कैन किया, स्टेशन-सिविल लाइंस रोड से लेकर बारुआ सागर डैम तक, जहां तक अनीता या मुकेश की मौजूदगी मिली?
वो फुटेज जो अनीता के ऑटो का पीछा करते दिखाती है, क्या उसमें कोई गवाह या अतिरिक्त वाहन नजर आया, जो इस साजिश की और परतें खोल सकता था? शुरुआत में पुलिस ने इसे एक्सीडेंट माना, लेकिन पोस्ट-मॉर्टम ने गोली का खुलासा किया। क्या ये शुरुआती गलती जांच की सुस्ती नहीं दिखाती, और क्या इससे कोई सबूत मिस हो गया, जैसे सीन पर फॉरेंसिक ट्रेस जो समय के साथ मिट जाते हैं? मुकेश के बेटे शिवम और साले मनोज को गिरफ्तार किया गया, लेकिन क्या पुलिस ने ये सवाल उठाया कि परिवार के सदस्यों को क्यों शामिल किया गया, क्या ये ‘फैमिली क्राइम’ की ट्रेनिंग थी, जहां हिंसा घर की विरासत बन गई, या इनकी भूमिका सिर्फ कवर-अप थी? गहने असली थे, कहां हैं, पिस्‍तौल कहां है। इसका जवाब कोई जीवंत ज्‍वाजल्‍यमान मनुष्‍य बतायेगा या कोई मूर्ति।
उनके फोन रिकॉर्ड्स, मैसेज, लोकेशन डेटा को डीप एनालिसिस क्यों नहीं किया गया, जो प्लानिंग की टाइमलाइन बता सकता था? और वो पुरानी शिकायत, कुछ महीने पहले अनीता ने मुकेश पर उत्पीड़न और धमकी की एफआईआर दर्ज कराई थी, लेकिन सजा सात साल से कम होने के बहाने गिरफ्तारी नहीं हुई, क्या पुलिस ने ये पूछा कि उस एफआईआर पर प्रभावी एक्शन क्यों नहीं लिया गया, जो शायद इस हत्या को रोक सकती थी?
मुकेश का कोई पुराना हिंसक इतिहास था या नहीं, क्या उसकी जांच हुई, क्योंकि अगर था, तो ये रिलेशनशिप फॉलआउट से आगे यौन कुंठा या कंट्रोल की मानसिकता का मामला बन सकता था? फॉरेंसिक रिपोर्ट में शारीरिक यौन हिंसा नहीं मिली, लेकिन क्या मनोवैज्ञानिक एंगल से जांच हुई, जैसे अनीता के ‘ना’ कहने पर उपजी जलन जो परिवार तक फैल गई? ये सवाल निर्णायक हैं, क्योंकि ये सिर्फ मुकेश को नहीं, बल्कि उस सिस्टम को कटघरे में खड़ा करते हैं जो महिलाओं को सशक्त बनने को कहता है, लेकिन उनकी सुरक्षा और न्याय को आधा-अधूरा छोड़ देता है। अगर पुलिस ने इन्हें नजरअंदाज किया, तो अनीता की मौत एक केस नहीं, बल्कि एक और चेतावनी बनकर रह जाएगी, कब तक ऐसी जांचें अधर में लटकती रहेंगी, और समाज की महिलाएं खून बहाती रहेंगी?
अनीता चौधरी की हत्या एक केस फाइल नहीं है। यह एक सामाजिक चेतावनी है। यह बताती है कि स्त्री की आज़ादी आज भी कई घरों में अपराध मानी जाती है। ‘इज्जत’ के नाम पर सामूहिक हिंसा को जायज़ ठहराने की सोच अब भी ज़िंदा है, और पितृसत्ता कैसे परिवार के भीतर ही हिंसा की ट्रेनिंग बन जाती है। यह मामला तभी पूरा होगा जब सज़ा के साथ-साथ इस मानसिकता पर खुलकर बात होगी। वरना अनीता का नाम सिर्फ रिकॉर्ड में रह जाएगा, और झांसी जैसी घटनाएं चीखती रहेंगी, कब तक ऐसी बहादुर महिलाएं खून में डूबेंगी? कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से साभार