समाज की चेतना को झकझोरने की कोशिश… डार्लिंग्स और थप्पड़

समाज की चेतना को झकझोरने की कोशिश… डार्लिंग्स और थप्पड़

डॉ उर्वशी

 

समकालीन भारतीय सिनेमा में कुछ फिल्में ऐसी हैं जो केवल कथानक नहीं रचतीं, बल्कि समाज की चेतना को झकझोरने का कार्य करती हैं। डार्लिंग्स और थप्पड़ इसी श्रेणी की महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं। ये दोनों फिल्में मानवाधिकारों के संदर्भ में स्त्री के सम्मान, समानता, स्वतंत्रता और हिंसा-मुक्त जीवन के अधिकार को अत्यंत संवेदनशील, मार्मिक और वैचारिक गहराई के साथ प्रस्तुत करती हैं। इनकी कथाएँ हमें उस कठोर सत्य के सामने खड़ा करती हैं कि विवाह और परिवार जैसे पवित्र माने जाने वाले संस्थान भी कभी-कभी स्त्री के लिए असुरक्षा, अपमान और मानसिक कैद का कारण बन जाते हैं।

डार्लिंग्स घरेलू हिंसा की उस त्रासदी को चित्रित करती है, जो हमारे समाज में अनगिनत घरों की बंद दीवारों के भीतर घटित होती रहती है। फिल्म की नायिका अपने पति द्वारा निरंतर शारीरिक मारपीट, मानसिक उत्पीड़न और भावनात्मक अपमान का सामना करती है। वह प्रेम के भ्रम, सामाजिक प्रतिष्ठा के भय और “सब ठीक हो जाएगा” जैसी उम्मीदों के सहारे इस हिंसा को सहती रहती है। किंतु यह सहनशीलता उसकी नियति नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना की देन है जो स्त्री को त्याग और धैर्य का प्रतीक बनाकर उसके अधिकारों को गौण कर देती है। फिल्म यह स्पष्ट करती है कि घरेलू हिंसा कोई निजी मामला नहीं, बल्कि महिला के मौलिक मानवाधिकारों—जीवन के अधिकार, शारीरिक सुरक्षा, मानसिक संतुलन और गरिमा—का खुला उल्लंघन है। यहाँ हिंसा केवल शरीर पर नहीं, आत्मा पर भी प्रहार करती है। स्त्री का आत्मविश्वास, उसकी स्वतंत्र सोच और उसकी पहचान धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होती जाती है।

फिल्म का विशेष पक्ष यह है कि वह पीड़ा को केवल करुणा के रूप में नहीं, बल्कि प्रतिरोध के रूप में भी प्रस्तुत करती है। नायिका की चेतना जब जागृत होती है, तब वह भय और अपमान की दीवारों को तोड़ने का साहस करती है। इस प्रतिरोध में एक गहरा संदेश छिपा है—स्त्री को अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने का अधिकार है, और यह आवाज़ किसी भी संबंध की पवित्रता को नष्ट नहीं करती, बल्कि उसे नैतिक आधार प्रदान करती है। डार्लिंग्स यह स्थापित करती है कि प्रेम के नाम पर हिंसा को स्वीकार करना प्रेम नहीं, बल्कि अन्याय है।

दूसरी ओर, थप्पड़ एक अत्यंत सूक्ष्म और संयत कथा के माध्यम से पितृसत्तात्मक मानसिकता की जड़ों को प्रश्नांकित करती है। फिल्म की नायिका एक संतुलित, शांत और संतुष्ट जीवन जीती हुई प्रतीत होती है। किंतु एक सामाजिक समारोह में पति द्वारा मारा गया एक थप्पड़ उसके समूचे अस्तित्व को झकझोर देता है। वह थप्पड़ केवल क्षणिक आवेश का परिणाम नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जो स्त्री को पुरुष से कमतर मानती है। फिल्म यह प्रश्न उठाती है कि क्या विवाह के भीतर हिंसा को सामान्य मान लिया जाना चाहिए? क्या आत्मसम्मान से समझौता कर लेना ही एक “अच्छी पत्नी” होने की शर्त है?

नायिका के लिए वह थप्पड़ उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न है। वह समझती है कि यदि वह इस घटना को सामान्य मान लेगी, तो यह उसके आत्मसम्मान का स्थायी ह्रास होगा। फिल्म अत्यंत सूक्ष्म ढंग से यह दिखाती है कि आत्मसम्मान कोई विलासिता नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। स्त्री की चुप्पी को उसकी सहमति नहीं माना जा सकता। विवाह, प्रेम और परिवार तभी सार्थक हैं जब वे समानता और सम्मान पर आधारित हों। थप्पड़ यह स्थापित करती है कि किसी भी संबंध में हिंसा—चाहे वह एक बार की क्यों न हो—मानवाधिकारों के विरुद्ध है, क्योंकि वह व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को आहत करती है।

दोनों फिल्मों का व्यापक महत्व इस बात में निहित है कि वे पितृसत्तात्मक सोच की जड़ता को चुनौती देती हैं। वे उस सामाजिक प्रवृत्ति पर प्रहार करती हैं जो स्त्री से सहनशीलता की अपेक्षा करती है, पर पुरुष के व्यवहार पर प्रश्नचिह्न लगाने से बचती है। डार्लिंग्स में प्रतिरोध तीखा और प्रत्यक्ष है, जबकि थप्पड़ में प्रतिरोध शांत, संयमित और आत्मचेतस है। एक में पीड़ा का विस्फोट है, तो दूसरी में आत्मसम्मान का दृढ़ संकल्प। किंतु दोनों का निष्कर्ष समान है—स्त्री की गरिमा सर्वोपरि है।

मानवाधिकारों की दृष्टि से देखें तो ये फिल्में जीवन के अधिकार (Right to Life), गरिमा के साथ जीने के अधिकार (Right to Dignity), समानता के अधिकार (Right to Equality) और हिंसा-मुक्त जीवन के अधिकार (Freedom from Violence) को केंद्र में रखती हैं। वे यह स्पष्ट करती हैं कि स्त्री कोई संपत्ति नहीं, बल्कि स्वतंत्र व्यक्तित्व है। उसे अपने निर्णय लेने का अधिकार है, अपनी सीमाएँ निर्धारित करने का अधिकार है, और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का अधिकार है।

डार्लिंग्स और थप्पड़ केवल स्त्री-विमर्श की फिल्में नहीं हैं; वे समाज के नैतिक विवेक को जागृत करने वाली कृतियाँ हैं। वे दर्शकों को यह सोचने पर विवश करती हैं कि हम अपने घरों, अपने संबंधों और अपनी सोच में कितनी समानता और सम्मान सुनिश्चित कर पाए हैं। ये फिल्में हमें सिखाती हैं कि प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान है; और सम्मान का अभाव किसी भी संबंध को खोखला बना देता है। इस प्रकार ये दोनों फिल्में महिलाओं के मानवाधिकारों को न केवल उजागर करती हैं, बल्कि उन्हें एक सशक्त वैचारिक और भावनात्मक आधार भी प्रदान करती हैं। डॉ उर्वशी के फेसबुक वॉल से साभार

 

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