AI चैटबॉट्स-युवाओं के नए साथी या बढ़ती दूरी?
डॉ रीटा अरोड़ा
अकेलापन अब मजबूरी नहीं, बल्कि एक नई आदत बनता जा रहा है और इसी खालीपन को भरने के लिए आज का युवा एक नया रास्ता चुन रहा है-AI चैटबॉट्स।

दुनिया भर में करोड़ों लोग अब अपने मन की बात मशीनों से कर रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि 50 करोड़ से ज्यादा लोग भावनात्मक सहारे के लिए AI ऐप्स का इस्तेमाल कर चुके हैं। भारत में भी 15 से 35 साल के युवाओं के बीच यह ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। AI हमेशा साथ रहता है-24 घंटे, बिना सवाल, बिना जजमेंट। जब चाहो बात करो, तुरंत जवाब मिलता है। तेज़ रफ्तार जिंदगी, बढ़ता तनाव और कम होते रिश्तों के बीच यह एक आसान और आकर्षक विकल्प बन गया है।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है-क्या हम सुविधा के लिए अपने रिश्तों को खो रहे हैं?
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि AI पर बढ़ती निर्भरता हमें धीरे-धीरे समाज और परिवार से दूर कर सकती है। जब दिल की बात मशीन से कहना आसान लगने लगे तो इंसानों से संवाद करना मुश्किल हो जाता है। यह एक ऐसा जुड़ाव है जो दिखता तो सुकून देने वाला है, लेकिन भीतर से खालीपन बढ़ा सकता है।
इसके साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि AI चैटबॉट्स पूरी तरह नकारात्मक नहीं हैं। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में ये कई लोगों के लिए शुरुआती सहारा बन रहे हैं-खासतौर पर उन युवाओं के लिए जो खुलकर अपनी बात कहने में हिचकते हैं। कई बार यह एक “पहला कदम” साबित होता है जो व्यक्ति को अपनी भावनाओं को पहचानने और व्यक्त करने में मदद करता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब यह सहारा आदत बनकर वास्तविक रिश्तों की जगह लेने लगता है।
हमें यह समझना होगा कि AI सिर्फ जवाब देता है, एहसास नहीं। वह सुन सकता है, लेकिन समझ नहीं सकता। उसमें अपनापन नहीं, केवल एल्गोरिदम है। तकनीक हमारी जरूरत है, लेकिन रिश्ते हमारी पहचान हैं। अगर हमने दोनों के बीच संतुलन नहीं बनाया तो नुकसान हमारा ही होगा।
आज सवाल तकनीक का नहीं, हमारी सोच का है। कहीं ऐसा न हो कि कल हमारे पास बात करने के लिए मशीनें हों-और सुनने के लिए कोई अपना न हो।
