कविता
घूरे की खाद..
ओमप्रकाश तिवारी
रोते सभी हैं..
किसी न किसी के लिए
क्योंकि वह उनका अजीज होता है
रिश्ते में खास हो सकता है
उपकार करने वाला भी हो सकता है
चाटूकार के मरने पर भी कई लोग रोते हैं
पिता के निधन पर मैं भी फूट फूटकर रोया था
उनके जाने से दुखी था?
वे तो बुजुर्ग हो गए थे
बीमार रहते थे और बिस्तर पर पड़े रहते थे
इस तरह वे अपने कष्टों से मुक्त हो गए थे
मेडिकली उनका शरीर निष्क्रिय हो गया था
फिर रोना क्यों?
लेकिन रोना आया और ज़ोर से आया
वे तमाम यादें बादल की तरह घिर आईं
जिनसे उन्होंने मुझे बनाया था
ख़ुद को घटाया था
मुझे बड़ा करने में छोटा होते गए थे पिता
उनकी इन जैसी तमाम कोशिशों पर
शायद रोना आया था
रोना इस बात पर आया था कि
वे इस संसार में मुझे फंसा गए थे
ख़ुद मुक्त होकर मुझे उलझन में डाल गए थे
ज़िंदगी जीने में ये चाटने की कला
नहीं सिखा पाए थे
चाहे जितनी भूख लगी हो
कभी पत्तल नहीं चाटे
आधे पेट जीना मंजूर था
लेकिन थाली चाटकर पेट भरना नहीं
यही जज्बा या स्वाभिमान सिखा गए
यही वह कला है जिससे आदमी
कलाकार बन जाता है
महानता इसी से निकली गंगा है
जो कुछ लोगों के लिए बहुत पवित्र है
जब कोई दूसरा इसमें स्नान के लिए उतरता है तो
अपवित्र कर देता है
कइयों की आस्था आहत हो जाती है
ऐसे लोग आत्मा की बात करते हैं
लेकिन जानते हैं आत्मा नहीं होती
शरीर का संचालन कुदरत करती है
पदार्थ जिम्मेदार हैं उसकी सक्रियता के लिए
कोई जीव तो उसमें होता ही नहीं
जब आत्मा ही अस्तित्व में नहीं है
फिर परमात्मा का भी कांसेप्ट खारिज
फिर इंसान चाटता ही है
बड़ा होने के लिए
महान होने के लिए
पता नहीं क्या क्या होने के लिए
जो नहीं चाटता किसी मठाधीश की
निसंदेह वह हाशिए पर होता है
ज़िंदा होकर भी वह होता नहीं है
कूड़ा समझकर उसे घूरे में डाल दिया जाता है
वह खाद बनकर नए पौधे का निर्माण करता है
उसे बड़ा और बड़ा करता है
पर दिखाई नहीं देता
पौधे की खुशहाली में शामिल नहीं होता
उसका श्रेय भी नहीं लेता
इसलिए उसे कोई जानता भी नहीं है
अज्ञेय जी तो लिख ही गए हैं
जो पुल बनायेंगे वो इतिहास में
निसंदेह बंदर कह लाएंगे
यहाँ तक तो फिर भी ग़नीमत है
मनुष्य उन्हें भी देवता बना ही देता है
पूजता है याचना करता है
गिड़गिड़ाता है और क्षमा मांगता है
चालीसा भी पढ़ता है
पर खाद को कोई पहचान नहीं मिलती
रोने या चाटने वाले की तरफ़
लोग खड़े हो जाते हैं
कुछ हँसते हैं कुछ तालियाँ बजाते हैं
ढेर सारे गालियाँ देते हैं
किसे और क्यों उन्हें नहीं पता होता
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(रोने, होने और चाटने के विवाद पर)
