कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा संत रविदास जयंती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा संत रविदास जयंती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र के हिंदी विभाग द्वारा संत रविदास जयंती के उपलक्ष्य में ‘संत रविदास की वाणी में सामाजिक समरसता’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का शुभारंभ हिंदी विभाग की अध्यक्षा प्रो. पुष्पा रानी एवं इंडिक स्टडीज की अधिष्ठात्री प्रो. कृष्णा रंगा द्वारा अतिथियों का स्वागत पुष्प गुच्छ देकर एवं वक्ताओं के परिचय के साथ किया गया।

संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. इमाम उमेर अहमद इलयासी, चीफें इमाम, ऑल इंडिया इमाम ओंगनाइजेशन ने किया। उन्होंने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि जाति-पाति के भेदभाव मनुष्य ने बना रखे है। मैं चीफें इमाम होने के नाते हिन्दू-मुस्लिम का भेदभाव नहीं करता। इमाम साहब ने इस बात पर भी जोर दिया कि हमारे पूर्वज भी भारतीय थे। हम सबसे पहले हिन्दू है. हिन्दी है, हम भारतीय हैं, हिन्दुस्तानी है, राष्ट्रप्रेमी है। हमारे लिए राष्ट्र ही सर्वोच्च है। मेरा नारा भी यह है सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास, सबका विश्वास। यही असली लगाव अपनी मातृभूमि से है। मैं युवाओं को भी अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित होने के लिए कहूँगा। तभी हम देश के सच्चे नागरिक हो सकते है। अपने देश को हर कीमत पर बचाना हमारा परमकर्तव्य है।

मुख्य वक्ता प्रो. सुशील कुमार, मिजोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय, आइजोल ने अपने संबोधन में संत रविदास को सामाजिक समरसता का प्रतीक पुरुष बताते हुए कहा कि वे सामाजिक चेतना के महान प्रवर्तक थे। उनकी वाणी जाति, वर्ग एवं धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर मानव को मानव से जोड़ने का संदेश देती है। उन्होंने बेगमपुरा की संकल्पना को सामाजिक न्याय का आदर्श मॉडल बताया।

अतिविशिष्ट वक्ता प्रो. वी.एन. भालेराव, सावित्रीबाई फुले युनिवर्सिटी, पुणे ने रविदास की वाणी में समरसता का संदेश बताया कि आज भी रविदास की वाणी हमारे लिए प्रेरणादायक एवं प्रासंगिक है। रविदास की वाणी व्यावहारिक जीवन दर्शन है। वह श्रम और सेवा के प्रेरणा स्त्रोत है। रविदास भी अपना भरण-पोषण करने के लिए जूती-गाँठते थे। यह आज के लिए कितना बड़ा स्कील्ड का संदेश है।

विशिष्ट वक्ता प्रो. निशिकान्त पाठक, प्रो. अनल सिंह, प्रो. अमर सिंह, सासाराम्, बिहार, प्रो. जंग बहादुर पाण्डे, राँची युनिवर्सिटी ने संत शिरोमणि रविदास की वाणी को प्रासंगिक, जाति-पाति से ऊपर और इक्कीसँवी सदी के लिए मूल्यवान बताया और कहा कि रविदास की वाणी का चिंतन-मनन करना आज भी जरूरी है।

निशिकांत पाठक ने अपने वक्तव्य में कहा कि संत रविदास की वाणी में कर्म और अनुभव को विशेष महत्व दिया गया है। उनकी भक्ति केवल आध्यात्मिक न होकर सामाजिक क्रांति का माध्यम रही है, जिसमें श्रम की गरिमा और समानता का सशक्त स्वर सुनाई देता है।

इसके पश्चात् जंग बहादुर पाण्डे ने संत रविदास के विचारों को राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए युवाओं से उनके आदर्शों को व्यवहार में आत्मसात करने का आह्वान किया।

राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. ऋषिपाल वेदी ने शिक्षा, सामाजिक समरसता और मानवता जैसे मानवीय मूल्यों पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि संत रविदास केवल एक संत ही नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति के अग्रदूत थे, जिनकी शिक्षाएँ आज भी समाज को नई दिशा प्रदान कर रही हैं।

डॉ. विजेंद्र कुमार ने कहा कि यह संगोष्ठी केवल वक्तव्यों तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मसात करने का विषय है। उन्होंने कहा कि कर्म ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं, न कि उसकी जाति। अच्छे कर्मों में ही मानव की सच्ची महानता निहित है।

संगोष्ठी की संयोजिका प्रो. पुष्पा रानी ने अपने संबोधन में कहा कि यह आयोजन केवल हिंदी विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने का एक सार्थक प्रयास है। उन्होंने कहा कि संत रविदास जैसे महापुरुषों के विचारों पर संवाद आयोजित करना वर्तमान समय की आवश्यकता है, क्योंकि उन्होंने भक्ति को कर्म और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोडा।

इस संगोष्ठी में भठिड़ा से प्राचार्य डॉ. राकेश दुबे, पंजाबी विभाग से डॉ. कुलदीप, इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. धर्मवीर, राजनीति शास्त्र विभाग से डॉ. परवीन कुमार, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल से डॉ. बलबीर सिंह, डॉ. यशवंती, डॉ. कमलेश कुमारी, डॉ. जयकुमार, गुरु नानक खालसा कॉलेज से डॉ. बीर सिंह, पंडित चिरंजी लाल गर्वेमेंट कॉलेज, करनाल से डॉ. सुनील दत, डी.ए.वी कॉलेज, करनाल से डॉ. रीतू, अंबाला कैंट से डॉ. राजेंद्र कुमार, डॉ. अनीश, डॉ. रीतू गुप्ता, आर.के.एस.डी. कॉलेज, कैथल से डॉ. विजेंद्र सिहं, डॉ आर.पी. मौन , उर्दू अध्यापक मनजीत सिंह सहित शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।