समाज को आइना दिखाता ग़ज़ल संग्रह उजाले हर तरफ़ होंगे /मनजीत भोला 

समाज को आइना दिखाता ग़ज़ल संग्रह उजाले हर तरफ़ होंगे /मनजीत भोला


 

 

मनजीत भोला की ग़ज़ल-कृति “उजाले हर तरफ़ होंगे” समकालीन समाज की उन दरारों को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर रोशनी, आस्था और नैतिकता के नाम पर ढक दिया जाता है। किताब की पहली ग़ज़ल के अशआर यह स्पष्ट कर देते हैं कि कवि समाज की बुराइयों की जड़ आम लोगों या साधारण वस्तुओं में नहीं, बल्कि सत्ता, धर्म और नैतिक मूल्यों के उस दुरुपयोग में देखता है, जिसे ताक़तवर वर्ग अपने स्वार्थ के लिए करता है। रोशनी स्वयं किसी से नहीं लड़ती, लेकिन जब उसे राजनीति का औज़ार बना दिया जाता है, तो अँधेरा बना रहता है और सच ओझल हो जाता है।कवि उस आस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है जो संवेदना और विवेक से कटकर मात्र पत्थर बन जाती है। ऐसी इबादत, जो इंसान को बेहतर नहीं बनाती, बल्कि अपराध को पवित्र शब्दों में ढकने का माध्यम बन जाती है, समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मासूमों की हत्या को “शहादत” कहकर प्रस्तुत करना इसी नैतिक पतन का उदाहरण है, जहाँ भाषा का इस्तेमाल सच को छुपाने के लिए किया जाता है।किताब की अगली ग़ज़लों में कवि गरीब बस्तियों के यथार्थ को सामने लाता है। वहाँ दिन तो किसी तरह धूप के सहारे गुजर जाता है, लेकिन शामें बिना दीये के होती हैं। मज़दूर स्त्री का शरीर थकान से झुलसा हुआ है, फिर भी उसे काम पर जाना पड़ता है—आराम उसकी पहुँच से बाहर है। सरकार की घोषणाएँ रोटियों का विकल्प नहीं बन पातीं, बल्कि अक्सर वे गरीबों को ही बदनाम करने का कारण बन जाती हैं। लेबर चौक पर चाय पीता मज़दूर दूध के दाम नहीं जानता, क्योंकि उसकी ज़िंदगी में बुनियादी ज़रूरतें भी विलास बन चुकी हैं।शिक्षा को लेकर कवि का स्वर और तीखा हो जाता है। जिन बच्चों के लिए स्कूल के दरवाज़े ही बंद हैं, उनके लिए योजनाएँ बेमानी हैं। अगर समाज एक कलम और कुछ किताबें तक नहीं दे सकता, तो झोपड़ी पर अम्बेडकर का नाम लिख देना केवल दिखावा है—विचारों के साथ एक क्रूर मज़ाक।पिछले समय की याद दिलाती ग़ज़ल में कवि बताता है कि यह सब कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। कभी सामाजिक जीवन में संयम था, धार्मिक सहिष्णुता थी और शिक्षा घर से शुरू होती थी। मंटो जैसी सच्ची आवाज़ें असहज करती थीं, लेकिन औरत की इज़्ज़त सुरक्षित थी। मक़तब और स्कूल सबके लिए खुले थे, ताकि कोई बच्चा पढ़ाई से वंचित न रहे।कवि तथाकथित रहबरों पर भी सवाल उठाता है—वे जो रास्ता दिखाने का दावा करते हैं, लेकिन डर पैदा करते हैं। तपती रेत पर बने कदमों के निशान की तरह उनकी साख भी मिट जाती है। हर गली में पैदा हुए “गिरधर” उस धार्मिक अराजकता का प्रतीक हैं, जहाँ हर व्यक्ति स्वयं को सत्य का ठेकेदार समझने लगता है।

अंतिम ग़ज़ल में कवि लोकतंत्र और राजनीति की विडंबना पर सीधा प्रहार करता है। खौफ़ की दुकानें चलाने वाले लोग फूलों की बात होते ही गायब हो जाते हैं। शिक्षा, रोज़गार और इलाज जैसे असली मुद्दों के बजाय लहू से लिखे नारों की माँग की जाती है, क्योंकि आज वोट विकास से नहीं, डर और हिंसा से हासिल किए जाते हैं।

इस प्रकार “उजाले हर तरफ़ होंगे” केवल गजल-संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय का नैतिक दस्तावेज़ है—जो यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या हम सचमुच उजालों की ओर बढ़ रहे हैं, या अँधेरे की राजनीति को ही रोशनी मान बैठे हैं।मनजीत भोला की किताब उजाले हर तरफ़ होंगे के पहली ग़ज़ल के कुछ अशआर जो इस प्रकार से हैं

 

चरागों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है

अँधेरा मिट नहीं पाया उजालों की सियासत है‌।

 

जहाँ तू सर पटकता है वहाँ बस एक पत्थर है

इबादत से बड़ी गाफ़िल यहाँ पर शय नदामत है।

 

बहाना मत ज़रा आँसू समझ लेना मेरे बाबा

क़त्ल मेरा करेंगे वो बताएंगे शहादत है।

 

 

समाज की बुराइयों की जड़ आम लोगों या साधारण चीज़ों में नहीं है, बल्कि सत्ता, धर्म और नैतिकता को अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों में है। रोशनी अपने आप में किसी से नहीं लड़ती, लेकिन जब उसे राजनीति का औज़ार बना दिया जाता है तो अँधेरा बना रहता है।

कवि कहता है कि लोग जिस आस्था को पूज रहे हैं, वह कई बार सिर्फ़ एक निर्जीव पत्थर बनकर रह जाती है, क्योंकि सच्ची इबादत—जो इंसान को बेहतर बनाए—उसकी जगह दिखावा और खोखली नदामत ले लेती है। यहाँ भावना है, समझ नहीं।मासूमों की हत्या को बड़े शब्दों और पवित्र नामों से ढक दिया जाता है। क़त्ल को “शहादत” कहकर पेश किया जाता है ताकि अपराधी अपने अपराध से बरी दिखें और समाज भ्रम में रहे।

इसके बाद कवि सत्ता की ओर उँगली उठाता है—वह कहता है कि हुकूमत का नशा इंसान को अंधा कर देता है। शासक जिस कुर्सी पर बैठा है, वह उसकी निजी मिल्कियत नहीं, बल्कि जनता की अमानत है, जिसे वह भूल जाता है।अंत में कवि इस नैतिक विडंबना पर चीख़ उठता है कि जिनके हाथ खून से रंगे हैं, वही अगर दान और भलाई का ढोंग करें तो यह पूरे समाज के लिए क़यामत जैसी स्थिति है—जहाँ सही और ग़लत की पहचान ही मिट जाती ‌।

किताब से पंक्तियां निम्नलिखित हैं –

 

मुफ़लिसों की बस्तियों में ये नज़ारा आम है

धूप को दिन रखा गया है बेचरागां शाम है

 

तप रहा था गात फिर भी जा चुकी है काम पर

कह रही थी चाँदनी कुछ आज तो आराम है

 

ये दिया है वो दिया है रोटियां पर हैं कहाँ

घोषणा सरकार की हमको करे बदनाम है

 

चाय जाकर वो पिए है रोज़ लेबर चौक पर

क्या पता मज़दूर को किस दूध का क्या दाम है

 

 

गरीब बस्तियों में अभाव और अँधेरा होना कोई नई बात नहीं है। वहाँ दिन को तो किसी तरह धूप के सहारे गुज़ार लिया जाता है, लेकिन शामें बिना दीये के होती हैं, यानी जीवन में रोशनी और सहारा नहीं है।एक मज़दूर स्त्री का शरीर थकान और धूप से झुलस चुका है, फिर भी वह काम पर जाने को मजबूर है। मन और तन दोनों आराम चाहते हैं, पर गरीबी में विश्राम एक सपना ही रहता है।

सरकार की तरफ़ से योजनाओं और सुविधाओं की घोषणाएँ तो बहुत होती हैं, पर ज़मीन पर लोगों के पास रोटियाँ तक नहीं हैं। ये खोखली घोषणाएँ उल्टा गरीबों को ही बदनाम करती हैं।मज़दूर रोज़ लेबर चौक पर चाय पीता है, पर उसे दूध के दाम तक का सही अंदाज़ा नहीं, क्योंकि उसकी ज़िंदगी में मूलभूत चीज़ें भी उसकी पहुँच से बाहर हैं।जो बच्चे स्कूल के गेट के भीतर तक नहीं जा सकते, उनके लिए आपकी सारी योजनाएँ बेकार हैं, क्योंकि शिक्षा तक पहुँच ही नहीं है।अगर समाज और सरकार बच्चों को एक कलम और कुछ किताबें तक नहीं दे सकते, तो फिर झोपड़ी पर अम्बेडकर का नाम लिखना केवल दिखावा है, विचारों का सम्मान नहीं।अब यह शहर मज़हब के नाम पर इतना हिंसक और पाखंडी हो गया है कि यहाँ रहना मुश्किल लगता है—जिसके मुँह में राम का नाम है, उसी के हाथ में दूसरों को चोट पहुँचाने की छुरी है।

किताब से पंक्तियां निम्नलिखित हैं –

 

पीते न थे वो हाफ़ अभी कल की बात है

आता नज़र था साफ अभी कल की बात है

 

शामिल सबा में थी यहाँ खुशबू अजान की

कोई न था खिलाफ अभी कल की बात है

 

बारह खड़ी के साथ में वालिद ज़नाब के

पढ़ते थे काफ गाफ अभी कल की बात है

 

मंटो की बू के साथ अदालत में जो गया

आपा तेरा लिहाफ़ अभी कल की बात है

 

यह सब बहुत पुराने ज़माने की बात नहीं है, बस कल तक ही ऐसा था। लोग खुलेआम शराब नहीं पीते थे और समाज में एक तरह की साफ़गोई और संकोच मौजूद था।

हवा में अज़ान की खुशबू घुली रहती थी और किसी को उससे कोई आपत्ति नहीं होती थी। धार्मिक सहिष्णुता और आपसी सम्मान सामान्य बात थी।पिता अपने बच्चों के साथ बैठकर बारहखड़ी पढ़ाते थे, अक्षरों की पहचान कराते थे। शिक्षा घर और परिवार का हिस्सा हुआ करती थी।मंटो जैसे लेखक की सच्ची और कड़वी रचनाओं को लेकर अदालत तक जाया जाता था, लेकिन औरत की इज़्ज़त और मर्यादा सुरक्षित मानी जाती थी।रात में अगर किसी का कंधा तकिये की तरह इस्तेमाल हो भी जाए, तो उसमें कोई अश्लीलता या संदेह नहीं खोजा जाता था—नियत पर शक नहीं होता था।मक़तब और स्कूलों के दरवाज़े सबके लिए खुले थे और पढ़ाई की फीस भी माफ़ रहती थी, ताकि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे।

 

राह में हमको मिले रहबर कई

दिल से डर कई हो गए हैं दूर

 

हैं निशाँ कदमों के तपती रेत पर

गुम गए लेकिन यहाँ पे सर कई

 

आज मीरा बावली को क्या पता

हर गली पैदा हुए गिरधर कई

 

ज़िंदगी की राह में हमें कई ऐसे लोग मिले जो खुद को रहबर कहते थे, लेकिन उनसे दिल में डर पैदा होता था। ऐसे लोग अब दूर हो चुके हैं, पर उनका असर रह गया है।

तपती हुई रेत पर पैरों के निशान तो दिखाई देते हैं, लेकिन आगे चलकर वे मिट जाते हैं। यहाँ बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके सिर तो हैं, पर दिशा और सोच खो चुकी है।

आज अगर मीरा को बावली कहा जाता है, तो उसे यह भी नहीं पता कि अब हर गली में अपने-अपने गिरधर पैदा हो गए हैं—हर कोई खुद को ईश्वर या सत्य का प्रतिनिधि मानने लगा है।राजधानी में एक ही महल को रोशनी चाहिए थी, लेकिन उसकी इस चाह में कई घर जलकर खाक हो गए—सत्ता की चमक आम लोगों की बर्बादी बन गई।अब स्वाभिमान और आत्मसम्मान सिर्फ़ शहरों में ही नहीं बिकता, बल्कि गाँवों में भी उसके दफ़्तर खुल गए हैं—यानी समझौते और सौदेबाज़ी हर जगह फैल चुकी है।

अंतिम ग़ज़ल के कुछ अशआर

 

दुकानें खौफ की बेशक यहाँ पर वो चलाते हैं

चले जो बात फूलों की कहीं पे खो से जाते हैं

 

हवा आ ही गई है तो भला मायूस क्यों करना

धरो तुम चाक पर माटी कोई दीपक बनाते हैं

 

यहाँ पर लोग रावण से बुरे भी हैं जलाने को

मगर हर साल पुतला हम बनाते हैं जलाते हैं

 

पढ़ाई की, कमाई की, दवाई की न बातें हों

लिखो नारे लहू से तुम, लहू से वोट आते हैं

 

यहाँ कुछ लोग डर और भय का कारोबार खुलेआम करते हैं। वे समाज को खौफ़ में रखकर अपना स्वार्थ साधते हैं, लेकिन जैसे ही प्रेम, करुणा और फूलों जैसी कोमल बातों की चर्चा होती है, वे लोग चुपचाप गायब हो जाते हैं।

कवि कहता है कि जब बदलाव की हवा चल ही पड़ी है, तो निराश होने का कोई कारण नहीं। अगर इरादा और उम्मीद मौजूद हो, तो साधारण मिट्टी को भी चाक पर रखकर एक दीपक बनाया जा सकता है—यानी छोटे साधनों से भी रोशनी पैदा की जा सकती है।समाज में ऐसे लोग भी हैं जो रावण से भी अधिक क्रूर हैं और सच में जलाए जाने योग्य हैं, लेकिन विडंबना यह है कि हम हर साल केवल रावण का पुतला बनाकर जला देते हैं, जबकि असली बुराइयों को हाथ तक नहीं लगाते।

अंत में कवि राजनीति की क्रूर सच्चाई उजागर करता है—यहाँ शिक्षा, रोज़गार और इलाज जैसे ज़रूरी मुद्दों पर बात नहीं की जाती। इसके बजाय खून से लिखे नारे गढ़े जाते हैं, क्योंकि आज वोट समझ और विकास से नहीं, बल्कि हिंसा, डर और लहू के सहारे जुटाए जाते हैं। अंत में मैं यही कहता हूं –

 

उजालों की नुमाइश में अँधेरा पल रहा है

हर इक चिराग़ बिकता है, अँधों का शहर रहा है

 

जो सच कहे वही अक्सर सलीबों पर चढ़े है

यहाँ झूठ के दरबार में इनाम ही बड़ा है

 

किताबों से जो डरते हैं वही तख़्तों पे बैठे

कलम का इक इशारा भी उन्हें खटका हुआ है

 

वो भूखे पेट से पूछे हैं क्या होता है वादा

क़लम से लिख दिया जिसने कभी देखा न खाया

 

मज़हब की ओट में नफ़रत की खेती हो रही है

भगवान के ही नाम पर इंसान कट रहा है

 

 

 

किताब – उजाले हर तरफ़ होंगे

कवि/शायर – मनजीत भोला

समीक्षाकर्ता- मनजीत सिंह

प्रकाशक – सत्यशोधक फाउंडेशन, कुरुक्षेत्र

कीमत -80 रूपये भारतीय

पृष्ठ संख्या -64

 

 

मनजीत सिंह कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में उर्दू के सहायक प्रोफेसर है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *