जन्मदिन पर विशेष
स्वामी विवेकानंद के चिंतन की वैचारिक पुनर्व्याख्या
राम आह्लाद चौधरी
स्वामी विवेकानंद की 163वीं जयंती के मौके पर उनकी चिंतन प्रक्रिया की आलोचनात्मक पड़ताल आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद को प्रायः एक आध्यात्मिक महापुरुष, राष्ट्र-जागरण के उद्घोषक और युवाओं के आदर्श के रूप में स्मरण किया जाता है। किंतु उन्हें केवल प्रेरक वक्तव्यों और प्रतीकात्मक गौरव तक सीमित कर देना उनके चिंतन की जटिलता और सामाजिक चिंता के साथ अन्याय होगा। विवेकानंद का वास्तविक योगदान भारतीय समाज को आत्महीनता, जड़ता और नैतिक निष्क्रियता से बाहर निकालने के प्रयास में निहित है।
उन्नीसवीं सदी का भारत औपनिवेशिक शासन के कारण केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी पराजित था। ऐसे समय में विवेकानंद ने सबसे पहले भारतीय समाज को उसकी आत्मछवि से रूबरू कराया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत की समस्या उसकी आध्यात्मिक परंपरा नहीं, बल्कि उस परंपरा से कट चुका उसका समाज है। शिकागो धर्म सम्मेलन में दिया गया उनका भाषण पश्चिम के सामने आत्मप्रदर्शन नहीं, बल्कि भारत के लिए आत्म-स्मरण का क्षण था। फिर भी यह भी सच है कि सांस्कृतिक गौरव का यह विमर्श यदि सामाजिक न्याय से न जुड़े, तो वह आत्मालोचना के बजाय आत्मतुष्टि में बदल सकता है।
विवेकानंद का धर्म-दर्शन कर्मकांड-विरोधी और मानव-केंद्रित था। उनके लिए धर्म का मूल्य मंदिरों, शास्त्रों या अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि भूखे, शोषित और अपमानित मनुष्य के प्रति समाज के व्यवहार में निहित था। “दरिद्र नारायण” की अवधारणा इसी दृष्टि की अभिव्यक्ति है। परंतु आलोचनात्मक प्रश्न यह है कि क्या यह अवधारणा संरचनागत शोषण—जाति, वर्ग और संपत्ति के असमान संबंधों—पर निर्णायक प्रहार करती है, या वह करुणा और सेवा की नैतिक सीमा में ही ठहर जाती है।
शिक्षा के क्षेत्र में विवेकानंद का चिंतन औपनिवेशिक शिक्षा-पद्धति के प्रतिरोध के रूप में उभरता है। वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो व्यक्ति को आज्ञाकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी नागरिक बनाए। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य जानकारी देना नहीं, बल्कि मनुष्य को भयमुक्त और स्वावलंबी बनाना है। यह दृष्टि आज भी प्रासंगिक है, किंतु तब ही, जब इसे वैज्ञानिक सोच, लोकतांत्रिक मूल्य और सामाजिक समता से जोड़ा जाए—अन्यथा यह केवल नैतिक उपदेश बनकर रह जाती है।
राष्ट्रीयता के प्रश्न पर विवेकानंद का दृष्टिकोण सांस्कृतिक और नैतिक था। वे भारत को किसी राजनीतिक सत्ता से अधिक एक सभ्यतागत चेतना के रूप में देखते हैं। युवाओं से उनका आग्रह था कि वे दुर्बलता, भाग्यवाद और पलायन की प्रवृत्ति को त्यागें। किंतु बाद के समय में उनके विचारों का जिस प्रकार सरलीकरण और राजनीतिक उपयोग हुआ, उसने उनके व्यापक मानवतावाद को संकीर्ण व्याख्याओं में बाँधने का भी काम किया।
आज के संदर्भ में विवेकानंद की प्रासंगिकता उनके नारों में नहीं, बल्कि उनके असहज प्रश्नों में है—गरीबी क्यों है, समाज इतना असमान क्यों है, और धर्म मनुष्य को जोड़ने के बजाय विभाजित क्यों करने लगा है। विवेकानंद को यदि सचमुच समझना है, तो उन्हें एक स्थिर मूर्ति नहीं, बल्कि एक बेचैन और प्रश्नवाचक विचारक के रूप में पढ़ना होगा।
स्वामी विवेकानंद भारतीय समाज के लिए आत्मसम्मान, सेवा और सक्रियता का आह्वान करते हैं। पर उनका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है—ताकि वे केवल गौरवशाली अतीत के प्रतीक न बनें, बल्कि वर्तमान की सामाजिक चुनौतियों से संवाद करने वाले विचारक के रूप में जीवित रहें।
स्वामी विवेकानंद के चिंतन की वैचारिक पुनर्व्याख्या की जरूरत है। स्वामी विवेकानंद को यदि केवल एक संन्यासी, धर्मोपदेशक या वेदांत के प्रवक्ता के रूप में देखा जाए, तो यह उनके ऐतिहासिक और वैचारिक कद को कम करके आँकना होगा। वे आधुनिक भारत की राष्ट्रीय चेतना के उन विरले चिंतकों में हैं, जिन्होंने पराधीनता, आत्मग्लानि और सामाजिक जड़ता से ग्रस्त समाज को आत्मबल, गरिमा और सक्रियता का दर्शन दिया। इस अर्थ में विवेकानंद एक विचारक ही नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की दीर्घकालिक परियोजना के सूत्रधार थे।
औपनिवेशिक शासन के दौर में भारत केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, मानसिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी पराजित था। विवेकानंद ने सबसे पहले इसी मानसिक दासता पर प्रहार किया। उनका विश्वास था कि कोई भी राष्ट्र तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक उसके नागरिक स्वयं को शक्तिहीन और हीन मानते रहें। इसलिए उनका राष्ट्रवाद सत्ता-प्राप्ति से पहले आत्मबोध पर ज़ोर देता है। वे बार-बार कहते हैं कि सशक्त राष्ट्र का निर्माण सशक्त व्यक्तियों से होता है—और व्यक्ति का निर्माण चरित्र, आत्मविश्वास और नैतिक साहस से।
विवेकानंद ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की नई व्याख्या की। उनके लिए वेदांत आत्मविमुख साधना नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम था। उन्होंने धर्म को जीवन से जोड़ते हुए सेवा, श्रम और करुणा को उसका अनिवार्य तत्व बनाया। गरीब, दलित और उपेक्षित जनसमूह को ‘दरिद्र नारायण’ कहकर संबोधित करना केवल प्रतीकात्मक भाषा नहीं थी, बल्कि यह उस राष्ट्र-निर्माण की अवधारणा थी, जिसमें समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी केंद्रीय स्थान रखता है। इस दृष्टि से विवेकानंद का राष्ट्रवाद नैतिक और मानवीय आधारों पर खड़ा दिखाई देता है।
उनकी राष्ट्रीय दृष्टि संकीर्ण सांस्कृतिक गर्व तक सीमित नहीं थी। वे भारतीय सभ्यता की आंतरिक शक्ति के पक्षधर थे, पर साथ ही पश्चिम की वैज्ञानिक सोच, अनुशासन और संगठन क्षमता को अपनाने के समर्थक भी। शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में दिया गया उनका भाषण उपनिवेशित भारत की आत्मछवि को बदलने वाला क्षण था। उस मंच पर विवेकानंद ने भारत को एक याचक राष्ट्र नहीं, बल्कि विश्व-मानवता को दिशा देने वाली सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया। यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास राष्ट्र-निर्माण की बुनियादी शर्त बन जाता है।
फिर भी, विवेकानंद के विचारों का आलोचनात्मक मूल्यांकन आवश्यक है। उनका अत्यधिक नैतिक-आध्यात्मिक आग्रह कई बार आर्थिक संरचनाओं, वर्ग-विभाजन और राजनीतिक संघर्षों के ठोस विश्लेषण को पीछे छोड़ देता है। इसके अतिरिक्त, बाद के समय में उनके विचारों को चुनिंदा रूप में ग्रहण कर संकीर्ण राष्ट्रवादी विमर्शों से जोड़ने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है, जो उनकी मूल मानवतावादी और सार्वभौमिक चेतना के विपरीत है।
इसके बावजूद, यह स्पष्ट है कि विवेकानंद ने भारतीय राष्ट्र-चेतना को आत्मसम्मान और कर्तव्यबोध की नई भाषा दी। वे भावनात्मक उन्माद नहीं, अनुशासित शक्ति के पक्षधर थे; भीड़ नहीं, चरित्रवान नागरिक चाहते थे। आज जब राष्ट्र-निर्माण को प्रायः आर्थिक आँकड़ों या राजनीतिक प्रभुत्व तक सीमित कर दिया जाता है, विवेकानंद का यह आग्रह विशेष रूप से प्रासंगिक हो उठता है कि नैतिक आधार के बिना कोई भी राष्ट्रीय परियोजना टिकाऊ नहीं हो सकती।
अतः स्वामी विवेकानंद को एक राष्ट्र-निर्माता के रूप में समझना हमें यह बोध कराता है कि भारत का भविष्य केवल नीतियों और संस्थानों से नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी, संवेदनशील और सामाजिक उत्तरदायित्व से युक्त मनुष्यों से निर्मित होगा। यही विवेकानंद की राष्ट्र-निर्माण संबंधी सोच का मूल और स्थायी संदेश है।
आधुनिक भारत में स्वामी विवेकानंद की प्रासंगिकता शाश्वत है। स्वामी विवेकानंद का स्मरण आज प्रायः उत्सवों, उद्धरणों और प्रतीकात्मक गौरव तक सीमित कर दिया गया है। किंतु प्रश्न यह नहीं है कि हम उन्हें कितना पूजते हैं, बल्कि यह है कि हम उन्हें कितना समझते हैं। इक्कीसवीं सदी का भारत तीव्र आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्वीकरण के दौर में प्रवेश कर चुका है, पर साथ ही असमानता, सामाजिक विघटन और नैतिक अनिश्चितता जैसी गंभीर चुनौतियों से भी जूझ रहा है। ऐसे समय में विवेकानंद की प्रासंगिकता केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि गहराई से समकालीन बन जाती है।
विवेकानंद ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसकी नींव आत्मबल और आत्मगौरव पर टिकी थी। आज भी भारत की सबसे बड़ी समस्या भौतिक संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि नागरिकों में आत्मविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व का अभाव है। विवेकानंद का “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको” का आह्वान आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरक नारे से अधिक, एक नैतिक अनुशासन की माँग है। यह कथन आलस्य, उपभोक्तावाद और तात्कालिक सफलता की संस्कृति के विरुद्ध एक वैचारिक चुनौती प्रस्तुत करता है।
शिक्षा के संदर्भ में विवेकानंद की सोच विशेष रूप से प्रासंगिक है। वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो केवल जानकारी न दे, बल्कि मनुष्य का निर्माण करे। आज जब शिक्षा बाजार का हिस्सा बनती जा रही है और डिग्रियाँ कौशल से अधिक प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन गई हैं, विवेकानंद की यह चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है कि चरित्रहीन शिक्षा राष्ट्र को कमजोर करती है। उनकी दृष्टि में शिक्षा आत्मनिर्भरता, करुणा और विवेक को विकसित करने का माध्यम थी—न कि केवल रोजगार पाने की सीढ़ी।
समाज के हाशिये पर खड़े वर्गों के प्रति विवेकानंद का दृष्टिकोण आधुनिक भारत के लिए एक नैतिक कसौटी प्रस्तुत करता है। ‘दरिद्र नारायण’ की अवधारणा हमें यह याद दिलाती है कि विकास का वास्तविक मापदंड ऊँची इमारतें या आर्थिक आँकड़े नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति का जीवनस्तर है। आज के भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता और सामाजिक बहिष्कार के बीच विवेकानंद की करुणा-आधारित राष्ट्र-चेतना तीखा प्रश्न खड़ा करती है।
धर्म के प्रश्न पर विवेकानंद की प्रासंगिकता और भी संवेदनशील है। उन्होंने धर्म को विभाजन और संकीर्ण पहचान का उपकरण नहीं, बल्कि मानव एकता और सेवा का आधार माना। वर्तमान समय में जब धार्मिक असहिष्णुता और वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, विवेकानंद की सार्वभौमिक धार्मिक दृष्टि हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम धर्म को शक्ति बना रहे हैं या हथियार।
हालाँकि विवेकानंद के विचारों की आलोचनात्मक समीक्षा भी आवश्यक है। उनका नैतिक-आध्यात्मिक आग्रह आधुनिक राज्य की जटिल राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं का पूर्ण समाधान प्रस्तुत नहीं करता। साथ ही, उनके विचारों का चयनात्मक उपयोग कर उन्हें संकीर्ण राष्ट्रवादी विमर्शों से जोड़ना उनके मूल मानवतावादी चिंतन के साथ अन्याय है। विवेकानंद को आदर्श में बदल देना आसान है, पर उनके असहज प्रश्नों से टकराना कठिन।
फिर भी, आधुनिक भारत के लिए विवेकानंद की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यह है कि वे हमें आत्मालोचना का साहस देते हैं। वे यह पूछने के लिए विवश करते हैं कि क्या हमारा विकास मानवीय है, क्या हमारी शिक्षा संवेदनशील है, और क्या हमारी राष्ट्रीय चेतना नैतिक आधार पर टिकी है। आज, जब प्रगति की चमक कई बार मानवीय मूल्यों को ढक देती है, विवेकानंद का विचार हमें याद दिलाता है कि बिना करुणा, विवेक और चरित्र के कोई भी आधुनिकता अधूरी है।
अतः स्वामी विवेकानंद की वैचारिकी आधुनिक भारत के लिए कोई अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवित वैज्ञानिक चुनौती है—जो हमें बेहतर राष्ट्र ही नहीं, बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में निरंतर प्रश्नांकित करती रहती।

लेखक – राम आह्लाद चौधरी
(लेखक साहित्य संस्कृति और समाज के अध्येता हैं)
