हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 43
कमल सिंह सहरावत – लम्बी दौड़ के अगुवा नेता
सत्यपाल सिवाच
नूंह जिले के हसनपुर तावड़ू निवासी कमल सिंह सहरावत उन गिने-चुने अध्यापक नेताओं में शामिल हैं जिनकी सक्रियता की न केवल लंबी अवधि है, बल्कि वे सेवानिवृत्ति के बाद भी सक्रिय एवं गतिशील बने हुए हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1945 को गुड़गांव जिले के हसनपुर तावडू गांव में श्रीमती बोहती देवता और सुल्तान सिंह सहरावत के घर हुआ। वे पाँच भाई-बहन हैं। वे एम.ए., एम.एड. तक शिक्षा प्राप्त कर 12 दिसंबर 1970 को अस्थायी और पर और 10 अगस्त 1973 को स्थायी रूप में एस.एस. मास्टर नियुक्त हुए। वे नौकरी में आते ही अध्यापक संघ से जुड़ गए थे। मेवात के इलाके में वे वर्षों तक अध्यापक/कर्मचारी आंदोलन के मजबूत स्तम्भ बने रहे।
जब सन् 1985 में जनतांत्रिक कार्यप्रणाली को लेकर हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ विभाजित हुआ तो कमल सिंह सहरावत दृढ़तापूर्वक प्रगतिशील पक्ष के साथ जुड़ गए थे। दरअसल जब बंसीलाल ने 1969 में अध्यापकों को अनिवार्य रूप से दूसरे जिलों में ट्रांसफर किया तो भिवानी से दिवान सिंह सांगवान उनके विद्यालय में तैनात हुए। उनके सानिध्य में कमल सिंह की यूनियन में सक्रियता और ट्रेनिंग हो गई। सांगवान साहब के भिवानी आने पर भी दोनों परिवारों का आपस में संपर्क बना रहा।
मेरी उनसे पहली मुलाकात तो शेर सिंह के साथ 1985 में हुई थी। बाद में जब भी मेवात क्षेत्र में जाना होता तो कमल सिंह के गांव में ही पहली रात पहुंच जाते। वे बहुत उच्च नैतिकता को मानने वाले व्यक्ति हैं, इसलिए अपने छात्रों, गांववासियों, गुहांड और शिक्षकों के बीच भी उनकी उच्च प्रतिष्ठा रही है। पहले-पहल एक बार मैं उनके विद्यालय में तावड़ू गया तो उनके शिक्षण कौशल से भी प्रभावित हुए बिना न रह सका। वे धैर्य और शांत स्वभाव के व्यक्ति हैं। वर्षों पहले एक सड़क दुर्घटना में परिवार व रिश्तेदारी के कई युवा मारे गए। पता लगने पर मैं और जयप्रकाश शास्त्री सुबह कैथल से चलकर सायंकाल उनके घर पहुंचे। उन दिनों में न टेलीफोन थे और न आने जाने बहुत साधन। मैंने महसूस किया विपत्ति के समय एक धैर्यवान व्यक्ति ही खुद को और परिवार को संभाल सकता है।
उनकी एक विशेषता और उल्लेखनीय है कि वे कभी पद के पीछे नहीं भागे, बल्कि संगठन की प्राथमिकता के लिए जो भी कार्य सौंपा गया उसे सदैव लगन और परिश्रम के साथ पूरा किया। वे समय-समय पर खण्ड प्रधान, जिला तथा राज्य के ऑडिटर, जोनल सचिव, संगठन सचिव व उपप्रधान के रूप में चुने जाते रहे। वे वर्षों तक सर्वकर्मचारी संघ में जिला सचिव की जिम्मेवारी निभाते रहे। फिलहाल रिटायर्ड कर्मचारी संघ हरियाणा में सक्रिय हैं। सन् 1973 की हड़ताल से 31जुलाई 2003 को सेवानिवृत्ति तक सभी आंदोलनों में शामिल रहे। उन्हें धारा 311 (2)ए. बी. सी. के तहत 1993 में सेवा से बर्खास्त किया गया था।
कमल सिह के परिवार में उनकी पत्नी निर्मला सदैव सहयोगी रहीं। उनका विवाह अप्रैल 1956 में हो गया था। उनके पुत्र सूबे सिंह व दिवानसिंह तथा पुत्रियां मधु व मनजीत हैं। एक बेटा आर्मी से रिटायर्ड है और दूसरा खेती करता है। वे अपने विनम्र, मिलनसार एवं सहयोगी स्वभाव के कारण जाना-पहचाना चेहरा हैं। सेवानिवृत्ति के बाद वे ब्लाक समिति के सदस्य भी चुने गए। सर्व शिक्षा के तहत उन्होंने सुंद, थाहल्का आदि गांवों के मुस्लिम समुदाय के बच्चों के लिए विशेष शिक्षा अभियान चलाया। वे 1990 से 1993 तक साक्षरता अभियान के ब्लॉक को-आर्डिनेटर भी रहे।
बाद के दौर में भाजपा के स्थानीय नेताओं के संपर्क में आ गए थे लेकिन उन्होंने सर्वकर्मचारी संघ, हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ और अब रिटायर्ड कर्मचारी संघ से अपनी आस्था पर आँच नहीं आने दी। ठीक इसी तरह वे स्थानीय स्तर पर अपने व्यवहार में हिन्दू-मुस्लिम द्वेष भाव की बजाय आपसी प्रेम और सौहार्द्र के पक्ष खड़े रहे हैं। अस्सी वर्ष की आयु में भी वे न केवल गतिशील हैं बल्कि समुदाय में स्वीकार्य और सम्मानित व्यक्ति के रूप में पहचाने जाते हैं।
कमल सिंह के अनेक नेताओं – खुर्शीद अहमद, तैयब हुसैन, जाकिर हुसैन, जगदीश नेहरा, रहीम खान, रणसिंह मान और अजमत खान आदि से अच्छे संपर्क रहे, इन्होंने इन सम्बन्धों का सामुदायिक हित के लिए इस्तेमाल भी किया। वे आई ए एस अधिकारी प्रताप सिंह जून और एच सी एस राजबीर सिंह के भी करीब रहे। निजी लाभ उठाने की उनकी प्रवृत्ति नहीं रही। अध्यापन या संगठन – वे सभी क्षेत्रों में समय की पाबंदी, अनुशासन, व्यावसायिक गरिमा और समर्पण को आवश्यक मानते हैं। उन्हें लगता है कि पहले कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से काम करते थे लेकिन अब स्वहित और मौकापरस्ती बढ़ रही है। उनका परामर्श है कि यदि लोग संगठनों से नहीं जुड़े तो शासन की क्रूरता से बच नहीं पाएंगे। वे कहते हैं कि 1973 के आन्दोलन के समय यूनियन एक थी, परन्तु अब शिक्षक अनेक समूहों में विभाजित हैं। शिक्षा व शिक्षकों के हित हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के साथ जुड़े रहने पर ही सुरक्षित रह सकते हैं। सौजन्य- ओमसिंह अशफ़ाक

लेखक- सत्यपाल सिवाच
