मोबाइल की दुनिया में सिमटता बचपन

मोबाइल की दुनिया में सिमटता बचपन

डॉ रीटा अरोड़ा

शाम के 5 बजे थे। पार्क में झूले खाली थे, स्लाइड पर धूल जमी थी।

उसी पार्क के सामने एक घर की बालकनी में 6 साल का आरव बैठा था-हाथ में मोबाइल, आँखें स्क्रीन पर टिकी हुईं।

माँ ने आवाज़ लगाई, “बेटा, नीचे खेलने जाओ…”

आरव ने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, “मम्मा, मेरा लेवल पूरा होने वाला है…”

नीचे खेल का मैदान इंतज़ार करता रहा और ऊपर एक बचपन धीरे-धीरे स्क्रीन में सिमटता गया।

आज का माता-पिता अपने बच्चे को बाहर खेलने भेजने से पहले सौ बार सोचता है। सुरक्षा का डर, पढ़ाई का दबाव और हर पल मन में उठता “क्या पता…?” उसे बच्चे को घर की चारदीवारी में सीमित कर देता है। लेकिन इसी सुरक्षा और नियंत्रण की कोशिश में वह अनजाने में बच्चे के हाथ में एक और बड़ा खतरा थमा देता है-मोबाइल फ़ोन।

शुरुआत केवल पाँच मिनट की होती है-“थोड़ा व्यस्त रखने के लिए।” धीरे-धीरे, यही पाँच मिनट रोज़ की आदत बन जाते हैं।

स्क्रीन एक ऐसे इंजेक्शन की तरह काम करने लगती है-जो तुरंत शांति तो देती है, लेकिन धीरे-धीरे लत भी लगा देती है।माता-पिता को एक आसान समाधान मिल जाता है-आराम का दायरा। बच्चे मनोरंजन में खो जाते हैं। ऊपर से सब सामान्य दिखता है, लेकिन भीतर ही भीतर एक खामोश संकट पनपने लगता है।

फिर सवाल उठता है-दोष किसका है?

क्या उन बच्चों का, जो मोबाइल की ओर हाथ बढ़ाते हैं? या उन माता-पिता का, जो अपनी थकान, चिंता या अत्यधिक सुरक्षा की भावना में स्वयं ही यह विकल्प उनके सामने रखते हैं? सच कड़वा है, लेकिन स्पष्ट है-हम वही आदतें बना रहे हैं, जिनकी शिकायत हम भविष्य में करेंगे।

प्रबंधन का एक सिद्धांत है-“आज की समस्या का समाधान ऐसा न हो, जो कल का संकट बन जाए।” पालन-पोषण भी इसी सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए।

जब हम बच्चों के खेल के मैदानों पर रोक लगाते हैं तो हम उन्हें काल्पनिक दुनिया के मैदानों की ओर धकेल देते हैं। जब हम छोटे–छोटे जोखिमों से डरते हैं तो हम उन्हें बड़ी निर्भरता के जाल में फँसा देते हैं।

जब हम अत्यधिक नियंत्रण रखते हैं तो हम सच्चा जुड़ाव खो देते हैं। यह समस्या तकनीक की नहीं है, यह हमारी सोच की है।

बच्चों को और एप्लिकेशन नहीं चाहिए-उन्हें चाहिए भरोसा, वास्तविक अनुभव और सुरक्षित खेल–कूद का अवसर ।माता–पिता को पूर्ण बनने की आवश्यकता नहीं है, उन्हें केवल अपने बच्चों के साथ उपस्थित रहना है।

जब तक हम अपनी पालन-पोषण की रणनीति में बदलाव नहीं लाते, स्क्रीन समय उसी खालीपन को भरता रहेगा

जो हमारे अपने डर और असुरक्षाओं ने पैदा किया है।

बदलेंगे सोच तो बदलेगा बचपन का सफ़र,

जागो माता–पिता, नहीं लौटता बीता हुआ पहर।

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