विहाग वैभव की एक कविता

विहाग वैभव की  कविता

याद करो
किस उत्साह से तुमने
हत्यारों, बलात्कारियों और अपराधियों के मस्तक पर
मुकुट रखा था

तुम तब भी तालियों की दुंदुभी पीटते रहे
जब सामूहिक हत्याओं को
उन्होंने आपदाएं कहीं

भय जब भूख पर विजय पाता है
तब सबसे पहले खून पानी बनता है

अब बात तुम्हारे चूल्हे तक आ पहुंची

तुम अपनी भूख के विरुद्ध भी लड़ना भूल गए
कैसा शिथिल पड़ गया तुम्हारे आक्रोश का जल

और आग?
आग तो तुमने बहुत पहले खो दी थी।

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