शील के दो गीत
1
अन्त कठिन बीसवीं सदी का,
होंगे उल्कापात।
धन सत्ता की राजमहत्ता,
घेरा डाल रही,
साम्यवाद के बिके पहरुए,
चाल कुचाल रही।
रूस देश हो गया खोखला,
काली बिछी बिसात।
अंत कठिन बीसवीं सदी का
होंगे उल्कापात।
साबित हुई तीसरी दुनिया,
धोखे की पगड़ी।
तटस्थता की खाल ढोल से,
उतरी रही सही।
शोषक-शासक रहे बढ़ाते,
अपनी ही औकात।
अन्त कठिन बीसवीं सदी का,
होंगे उल्कापात।
भूख, रोग, दुर्भिक्ष, विषमता
बजा रहे ढपली।
उपनिवेशवादी समता की
रोके खड़े गली।
गोर्वाच्योवी हठी युक्ति के
फूटे क्षुद्र प्रपात।
अन्त कठिन बीसवीं सदी का,
होंगे उल्कापात।
राष्ट्रसंघ कखरी में दाबे,
बुश का अभिनन्दन।
कसने लगे चेतना के मुख
पूंजी के बन्धन।
देर अदेर बढ़ेंगे निश्चित
बिप्लव के अनुपात।
अन्त कठिन बीसवीं सदी का,
होंगे उल्कापात।
2
पूंजी के प्रपंच मंच, धर्म अभिनेता बना,
करता है नित्य नया अभिनय दरबान का।
जातिगत, हिंसक, अखाड़ों के बनाता ब्यूह,
आदमी लगाता स्वयं चेहरा हैवान का।
धर्म कुछ देता नहीं, फिर भी पड़ा है पीछे,
कहते हैं लोग इसे बेटा भगवान का।
धर्म से अधर्म-धर्म करता है सदा,
शासन का सम्बल, खिलौना धनवान का।।
