मल्लिका अमर शेख की पुस्तक की समीक्षा
मैं बरबाद होना चाहती हूं – स्त्रियों के लिए यातना का जाना पहचाना अनुभव
रूपम मिश्र
मल्लिका अमर शेख की आत्मकथा ‘ “मैं बरबाद होना चाहती हूँ ” एक ऐसी आत्मकथा है जिसे पढ़कर हो सकता है कोई पुरूष हैरान हो जाये लेकिन स्त्रियों के लिए यातना का ये अनुभव बहुत जाना-पहचाना होगा।
मल्लिका का जन्म एक बेहद खुले हुए परिवेश में हुआ था । आधुनिक विचारों से लैस माता-पिता की वे संतान थीं। जहाँ एक लोकतांत्रिक वातावरण में उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश की। सामूहिकता और सामाजिकता के साथ समता और न्याय के लिए मुखर राजनीतिक जीवन उन्होंने देखा था ऐसे ही वातावरण में एकदिन मल्लिका नामदेव ढसाल से मिलती हैं।
एक धूसर और बेतरतीब सा निडर और साहसी मनुष्य जिससे उन्हें तीक्ष्ण आकर्षण हुआ जो और आगे जाकर गहरे प्रेम में परिवर्तित हुआ। मल्लिका लिखती हैं कि”मटमैले रंग की कमीज-पैंट, माथे पर झूलती लटें ,कंधे पर सबनम बैग और मुँह में चिनार सिगरेट। उस समय के युवाओं में उसका यह स्टाइल प्रिय बनता जा रहा था। वही प्रसन्न व प्रेमिल हँसी।काला-साँवला , तेजतर्रार चेहरा।”
मल्लिका ने जन्म से ही खुला हुआ परिवेश देखा था जहाँ मनुष्य की मुक्ति की बहसें थीं। प्रेम के चयन और साथ चुनने की स्वतंत्रता थी, लेकिन उन्हें तब नहीं पता था कि जिस प्रेम की बांह पकड़कर वो जीवन जीना चाहती हैं वहाँ कितना कठिन झंझावात है।आत्मकथा पढ़ते हुए मैं लेखिका की ईमानदारी और निर्वक्तिकता को देखकर हैरान रह गयी कि जीवन में प्रेम और घृणा के इतने विकृत और भयानक संस्तर को झेलकर कोई स्त्री इतना तटस्थ होकर कैसे लिख सकती है।
मल्लिका ने आत्मकथा लिखते हुए कहीं से भी नामदेव के वैचारिक मूल्यों पर हमला नहीं किया है उन्होंने पुरुषों में गहरे धंसे पितृसत्तात्मक अभ्यास को ही चिन्हित करके आरोपित किया है। किसी भी आत्मकथा के लिए ये मूल्य उसे ज्यादा प्रमाणिक बनाते हैं।
मलिका अमर शेख के पिता एक वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता थे और वह खुद भी एक कार्यकर्ता ही थीं । विचार और राजनीतिक जीवन उन्होंने जन्म से ही देख था लेकिन प्रेम में जब स्त्री को साथी नहीं पति मिलता है तो उसकी आत्मा पर जाने कितने घाव मिलते हैं ।
ये आत्मकथा एक लोकनायक के जीवन मे आयी स्त्री की उसकी जमीन तलाशने और बार-बार घायल होने की कहानी है। साथ ही मराठी दलित आंदोलन , उसकी सफलता ,असफलता व उसके अंतर्विरोधों और उस राजनीति का एक समृद्ध दस्तावेज भी है ।
हमारी परम्परागत भारतीय संस्कृति के लिहाज से समाज में मर्दवाद का वर्चस्व हर जगह अपनी सहज स्वीकार्यता से चलता है, समाज की रहन में ये इतने गहरे धंसा हुआ है कि बहुधा उन पुरुषों को इहलाम भी नहीं रहता कि वो कब स्त्री को लेकर अलोकतांत्रिक हो जाते हैं। और यही नहीं पितृसत्तात्मक संस्कृति के प्रभाव से कभी-कभी स्त्रियाँ भी एकदम मुक्त नहीं हो पातीं
ये बात ये आत्मकथा बखूबी समझाती है।
नामदेव ढसाल से प्रेम करते हुए मल्लिका जो कि एक आधुनिक विचारों की स्त्री थीं लेकिन नामदेव के कई मर्दवादी व्यवहार और हिंसाओं को झेलती रहीं । एक तरह से उसे लम्बे समय तक ऐड्रेस नहीं कर सकीं। और ये भ्रम बनना स्वाभाविक था क्योंकि मल्लिका का जीवन साथी कोई सामान्य मनुष्य नहीं था।
वे मराठी के बेहद मशहूर दलित कवि नामदेव ढसाल थे जो दलित पैंथर के अगुआ भी थे।एक सामन्ती पुरूष में जितनी हिंसा और अलोकतांत्रिक मूल्य होते हैं वे सब उनके भीतर था।। लापरवाही , हद से ज़्यादा शराब और सिगरेट का नशा करने के साथ वेश्या के पास जाना , तमाम अराजक यौन-संबंध को जीता हुआ मनुष्य । पत्नी मलिकाअमर शेख को बेरहमी से पीटना और उनके साथ जबर्दस्ती यौन संबंध बनाना । घर परिवार की जिम्मेदारी से हमेशा उदासीन रहन उनकी आदत थी।
मल्लिका एक आधुनिक चेतना से लैस स्त्री थी फिर भी वे आजीवन नामदेव ढसाल से एकदम अलग नहीं हो सकीं जिसका कारण था नामदेव ढसाल की कविताएं और विचार जिसके आभामंडल से मल्लिका कभी एकदम से निकल नहीं सकीं। उन्हें लगता कि नामदेव ढसाल कोई सामान्य मनुष्य नहीं है लाखो लोग उनके दीवाने हैं। ।
हिंसा और अराजकता के अभ्यस्त नामदेव में तमाम दुर्गुण थे लेकिन।मलिका फिर भी उनकी कविताओं और कवि को पसंद करतीं थीं । अपनी आत्मकथा में वे इस बात को बहुत तटस्थ होकर रेखांकित करती हैं कि एक पति के रूप में वे नामदेव से घनघोर नफरत करती थीं(लगभग हर स्त्री) लेकिन कवि और कार्यकता के रूप में उनकी प्रशंसक थीं ।
इस आत्मकथा को पढ़कर हम समझ सकते हैं कि वे आर्टिस्ट और आधुनिक विचारधारा से लैस नयी स्त्री थीं। कला साहित्य और सौंदर्य उनकी दुनिया का अभिन्न हिस्सा थे । वे लेखक कवि जरूर थीं लेकिन जिस तरह का महिला विरोधी हमारा समाज है वहाँ स्त्रियों का आत्मकथा लिखना आसान काम नहीं। पहली बात तो अपनी अस्मिता की चेतना और अपने होने का एक सार्थक बोध इसकी जमीन होती है । देश समाज मे रहकर अपनी अस्मिता का मूल्य जब हम पहचानते हैं तभी खुद को भी दर्ज कर पाते हैं।
मल्लिका अमर शेख अपनी आत्मकथा के आखिरी हिस्से में लिखती हैं कि “मेरा जीवन बहुत रोमांचक या असामान्य आदि नहीं है। सफलता का चढ़ता हुआ ग्राफ भी आपको दिखाई नहीं देगा । ऐसा भी नहीं कि मैंने बहुत दुःख देखा है ” यह कथन लेखिका के सादे अंतर्मन का आईना है जहाँ लिजबिज भावुकता और आत्मपीड़ा का अतुरेक नहीं है ।
एक बड़ा सवाल है नयी दुनिया में स्त्री की जगह और उसकी अस्मिता का। मुक्ति जब स्त्री पुरूष के साथ बिना सम्भव नहीं है तो क्यों उस विचार की राजनीति के शीर्ष पर खड़ा पुरूष स्त्री को भुला देता है।
मल्लिका किताब के आखिरी हिज्जे में लिखती हैं कि ” एक पराजित और असफल मन की है ये यात्रा।” यह पराजय और असफलता उन तमाम स्त्रियों की कथा है जो नायकों से प्रेम करती हैं और एकदिन खुद को कहीं बहुत पीछे छूटी हुई पाती हैं। वो लड़की जिसे बारिश और कविताएं पसंद थी वह एक श्रेष्ठता बोध में भरे पुरूष से प्रेम कर बैठती है और यही से उसके जीवन में उजाड़ शुरू होता है।
यूँ तो स्त्री-साहित्य एक बहुमूल्य हासिल है हमारे लिए लेकिन स्त्रियों की आत्मकथा का आना साहित्य संसार में एक बड़ी परिघटना है क्योंकि जब कोई स्त्री अपनी कथा स्वयं कहती है, तो उसमें ज्यादा प्रामाणिकता होने की गुंजाइश होती है । स्त्री जीवन की समग्रता में उनके अनुभवों के उजाले में उसकी प्रामाणिकता को समझा जा सकता है।।
इस तरह किसी स्त्री की जीवन कथा में सामूहिकता का जीवन पर्याय अधिक होता है क्योंकि स्त्रियों की आत्मकथाएँ उनके साथ उनके समुदायों की कथा के रूप में भी सामने आती हैं। साहित्य में कितनी स्त्रियों की आत्मकथाएँ हैं जो उनके जीवन के दारुण दुखों से हमारा परिचय कराते हुए जाने कितनी स्त्रियों का जीवन कहतीं चलतीं हैं। स्त्रियों ने सब झेलकर उससे पार निकल कर जब एकदिन लिखा तो हमारे सामने एक बहुमूल्य दस्तावेज खुलता है इसलिए स्त्रीवाद भी आत्मकथा लिखने वाली स्त्रियों से समृद्ध और परिष्कृत होता रहा है।
ऐसी बहुत सी आत्मकथाओं का हमें इंतजार है जो हमारे स्त्री-विमर्श और स्त्री-आंदोलनों को नयी दिशा और दशा की ओर ले जायेंगे।
