आज 19 फरवरी को नामवर सिंह की पुण्यतिथि है। नामवर सिंह सिर्फ एक आलोचक नहीं थे, उन्होंने हिंदी साहित्य को अपने लेखन से एक नई दृष्टि दी। आलोचना के पुराने औजारों की जगह एकदम नई कसौटियों के आधार पर हिंदी साहित्य को परखना शुरू किया। हमारी कोशिश है कि प्रतिबिम्ब ने मीडिया में उन पर कुछ लेख दिए जाएं। यह लेख समालोचना से साभार।
पुण्यतिथि पर विशेष
नामवर सिंह का छात्र-जीवन
रविभूषण
हिन्दी भाषा-साहित्य के छात्रों, शोधार्थियों एवं अध्यापकों के साथ ही कवियों, लेखकों और आलोचकों के लिए भी यह जानना जरूरी है कि नामवर सिंह ने अपने छात्र-जीवन से ही साहित्य-मार्ग पर कैसे डग भरे. 1945 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और इसी वर्ष एक कहानी ‘कहानी की कहानी’ शीर्षक से लिखी. तुलसी पर एक निबन्ध भी लिखा –
‘समाज के अग्रचेता : तुलसी’. उम्र उन्नीस वर्ष थी. इस निबन्ध में उन्होंने युग-प्रभाव से किसी भी कवि के वंचित न रहने की बात कही, सामंत-युग में गोस्वामी जी के पलने के कारण ‘ऊँच-नीच के भेद, स्त्री-स्वतंत्रता की निन्दा, कठोर वर्ण-व्यवस्था आदि बातों की परिधि से’ नहीं निकलने के आक्षेपों का उल्लेख कर यह लिखा-
‘‘वर्तमान भारतीय समाज का निर्माण शंकराचार्य, स्वामी दयानन्द तथा राजा राममोहन राय से कहीं अधिक गोस्वामी तुलसीदास ने किया है…! उन्होंने राम राज्य के स्वर्णिम स्वप्न में चातुवर्ण व्यवस्था को भी भारत के लिए कल्याणप्रद बताया. साथ ही सोशल डिसप्लीन पर प्रधानतया जोर दिया.’’1 यह निबन्ध ‘क्षत्रिय मित्र’ के जुलाई-अगस्त 1945 के अंक में प्रकाशित हुआ था. इसी वर्ष पिता नागर सिंह ने
‘‘जल्दबाजी में मेरी शादी तय कर दी. मैं घर से भाग आया. लेकिन पकड़ कर लाया गया. हाई स्कूल का इम्तिहान खत्म हुआ था और मेरी शादी कर दी गई. गाँव, मचखिया में यू.पी. से लगा हुआ बिहार का बॉर्डर है दुर्गावती नदी के किनारे बसा हुआ गाँव. वहीं मेरी शादी हो रही थी और मैं रो रहा था.’’2
पिता अपने गाँव जीयनपुर के बगल के गाँव आवाजापुर में लोअर प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे.
‘‘नामवर जी ने ‘अ आई’ की पढ़ाई इसी स्कूल में की. सूर्योदय के कुछ देर बाद वे वर्णमाला की किताब, स्लेट और दिन का खाना बस्ते में डाल कर आवाजापुर के लिए चलते और पढ़ाई करके सूरज डूबने के बाद घर लौटते.’’3
चौथी कक्षा में दाखिला घर से तीन मील की दूरी पर माधोपुर स्कूल में लिया क्योंकि पिता का तबादला इसी स्कूल में हो गया था. ‘
‘पिता के साथ वे माधोपुर में ही रहकर पढ़ाई करने लगे. अपना घर और गाँव हमेशा के लिए छूट गया.’’4
माधोपुर स्कूल के मतउल्ला खाँ पिता के पीटने पर उन्हें बचाते थे. इस स्कूल के शिक्षक धर्मदेव सिंह के व्यक्तित्व ने उन्हें प्रभावित किया. 1936 में जब जवाहरलाल नेहरू बगल के गाँव कमालपुर आए थे, धर्मदेव सिंह ने उनकी सभा में नामवर सिंह को जाने को प्रेरित किया. उस समय उनकी उम्र दस वर्ष थी.
“चौथी कक्षा के छात्र नामवर जी स्कूल से चार मील पैदल चलकर नेहरू की सभा के लिए कमालपुर गए. लेकिन सभा स्थल रामलीला मैदान में जब पहुँचे, तब तक नेहरू की सभा समाप्त हो चुकी थी.’’5
गाँव से तीन मील की दूरी के गाँव कमालपुर में 1937 में पाँचवीं कक्षा में पढ़ने के लिए आए. नामवर जी का ‘साहित्यिक संस्कार’ उनके पिता के मित्र कामता प्रसाद विद्यार्थी के घर आने-जाने से हुआ. कामता प्रसाद विद्यार्थी को उन्होंने ‘धर्म पिता जैसा’ कहा है. पिता नामवर जी को लेकर अक्सर विद्यार्थी जी के यहाँ जाया करते थे. विद्यार्थी जी के
‘‘घर में काम करने वाले रसोइया-नौकर सब चमार थे…. विद्यार्थी जी कहते थे – जात-वात कुछ नहीं होती. मन में पड़ी ये गाँठें तोड़ो. … उन्होंने मुझसे कहा – तुम क्या पहनते हो, खादी पहननी चाहिए. मैं सात-आठ बरस का था तबसे खादी ही पहनने लगा.’’6
विद्यार्थी जी हेतमपुर के स्वाधीनता सेनानी थे. उनके यहाँ नामवर सिंह ने ‘सैनिक’ और ‘आज’ पत्र के साथ सस्ता साहित्य मंडल की किताबें देखीं. टाल्सटाय के ‘माई कन्फेशन’ का अनुवाद पढ़ा. नेहरू की ‘मेरी कहानी’, ‘विश्व इतिहास की झलक’ और गाँधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़ी.
नामवर सिंह के साहित्यिक-संस्कार के निर्माण में आवाजापुर की साहित्यिक मंडली की महत्वपूर्ण भूमिका है.
‘‘वहाँ एक छोटी-सी लाइब्रेरी थी. जयचंद सिंह और श्यामनारायण गुप्त साहित्यिक रूचि के दोस्त थे. दोनों ही मिडिल एडवांस की तैयारी कर रहे थे. रीतिकालीन काव्य-संवेदना का माहौल था. ठाकुर बलराज सिंह, सूबेदार सिंह, ठाकुर रामगति सिंह सवैया और घनाक्षरी लिखते गाते थे. अमरेश भट्ट मुसलमान थे. उनसे द्विजदेव का ‘काव्य-कुसुमाकर’ लेकर पढ़ा.’’7
छठी कक्षा में पढ़ते समय दस वर्ष की उम्र में इंग्लैंड पर हिटलर की जीत को लेकर एक कविता लिखी. उपनाम रखा ‘पुनीत’. उस कविता की अंतिम पंक्ति है –
‘‘चढ्यो बरतानिया पर हिटलर ‘पुनीत’ ऐसे
जैसे गढ़ लंक पर पवन सुत कूदि गौ.’’8
पाँचवीं-छठी कक्षा से ही नामवर सिंह ने ब्रजभाषा में कविता लिखना आरंभ किया. काव्य-रचना का आरंभ वीर रस से हुआ और सातवीं कक्षा में श्रृंगार रस की ओर मुड़े- ‘‘आस दुइ मास प्रिय मिलन अवधि की है/उमगे उरोज रहै कंचुकी मसकि मसकि.’’ यह 33 वर्णों की घनाक्षरी है, जिसका अधिक प्रयोग रीतिकालीन कवि जसवन्त सिंह ने किया था. मिडिल स्कूल के हेडमास्टर पं. राम अधार मिश्र ने कापी में लिखी यह कविता देखकर ‘कंचुकी’ का अर्थ पूछा था और नाराज हो कर पिता नागर सिंह से ‘शादी-वादी’ करा देने की बात भी कही थी. स्कूल में डिप्टी साहब आने वाले थे. हेडमास्टर ने उनके स्वागत में एक कविता लिखने को कहा. छात्र कवि ‘पुनीत’ ने डिप्टी साहब के स्वागत में एक कविता लिख कर अपने हेड मास्टर का क्रोध खत्म किया. 1940 की मिडिल परीक्षा में इतिहास में अनुत्तीर्ण होने के कारण नामवर सिंह फेल हो गए क्योंकि शिवाजी पर ही इतना लम्बा लिखा कि दूसरे सवाल को पूरा नहीं कर सके. 1941 में पुनः मिडिल की परीक्षा दी और प्रथम श्रेणी से पास हुए.
पिता की इच्छा थी कि टीचर्स ट्रेनिंग कर बेटा प्राइमरी स्कूल में शिक्षक हो जाय, पर अपने मित्र विद्यार्थी जी के कहने पर उन्होंने नामवर सिंह का नामांकन बनारस के हीवेट क्षत्रिय स्कूल में जुलाई 1941 में सातवीं कक्षा में करा दिया. उत्तर प्रदेश के एक रजवाड़े भिंगा के राजा उदय प्रताप सिंह ने अपने एकमात्र पुत्र की मृत्यु से मर्माहत होकर क्षत्रिय समुदाय में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बनारस में 1909 ईसवी में हीवेट क्षत्रिय स्कूल की स्थापना की. तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर ‘हीवेट’ के नाम पर ‘ हीवेट क्षत्रिय स्कूल’ स्थापित हुआ, जो बाद में ‘उदय प्रताप कॉलेज’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ. जुलाई 1941 में नामवर सिंह, सातवीं कक्षा के छात्र के रूप में बनारस आए. इसी वर्ष 2 फरवरी को रामचन्द्र शुक्ल दिवंगत हो गये थे. पाँचवीं-छठी कक्षा में पढ़ते हुए ब्रजभाषा में नामवर सिंह कविताएँ लिखा करते थे.
“भोजपुरी भाषी होते हुए भी ब्रजभाषा में कविताएँ लिखने का कारण यह था कि उन दिनों ब्रज में ही कविताएँ पढ़ने-सुनने को मिलीं. दूसरी बात कि उन दिनों विद्यालयों के बीच अन्त्याक्षरी की प्रतियोगिताएँ हुआ करती थीं.उनमें अपने विद्यालय की ओर से मैं भाग लिया करता था. तो उस बहाने बहुत सारी कविताएँ याद रखनी पड़ती थीं. उनमें कोर्स के बाहर की ढेर सारी कविताएँ रहती थीं. कोर्स के बाहर की ये कविताएँ इस तरह याद हो गई थीं.”9
आवाजापुर गाँव के ठाकुर जयचन्द सिंह के जरिये उनका सम्पर्क बिहारी, रत्नाकर तथा रीतिकाल के अन्य कवियों से हुआ था. ग्यारह-बारह वर्ष की अवस्था में वे ब्रजभाषा में लिखने लगे थे. बनारस आने के बाद उन्हें मालूम हुआ कि कविता खड़ी बोली में लिखी जाती है.
“अब मुझे भी अपनी वे कविताएं बेकार की चीज लगीं. वे तुकबन्दियाँ तो अभ्यास के लिए थीं. मैंने उनमें से कई फाड़ कर फेंक दीं.”10
हीवेट क्षत्रिय स्कूल में जुलाई 1941 में नामांकन के मात्र कुछ महीने बाद ‘क्षत्रिय मित्र’ पत्रिका में खड़ी बोली की उनकी पहली कविता ‘दीवाली’ प्रकाशित हुई. दूसरी प्रकाशित कविता थी – ‘सुमन, रो मत, छेड़ गाना.” इसी वर्ष त्रिलोचन से परिचय हुआ. अगस्त या सितम्बर 1941 में उनके छात्रावास में त्रिलोचन जी को भाषण और काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था. स्कूल परिसर में
“मुख्य द्वार के पास प्राचीन छात्र-भवन था. उसमें ‘क्षत्रिय मित्र’ नाम की पत्रिका का नया-नया कार्यालय स्थापित हुआ था. उस पत्रिका के सम्पादक शम्भुनाथ सिंह थे.”11
स्वास्थ्य-लाभ के लिए शम्भुनाथ सिंह के बाहर जाने के बाद ‘क्षत्रिय-मित्र’ का सम्पादकीय दायित्व त्रिलोचन जी को सौंपा गया था. नामवर सिंह उनसे मिले. त्रिलोचन जी ने उन्हें लिखने-पढ़ने की सलाह दी. वे उम्र में दस वर्ष बड़े थे. नामवर सिंह चौदह वर्ष के थे और त्रिलोचन चौबीस वर्ष के. उनकी प्रेरणा से उन्होंने किताबें – गोर्की की ‘आवारा की डायरी’ का इलाचन्द्र जोशी का अनुवाद और निराला की ‘अनामिका’ खरीदीं.
छात्र-जीवन में नामवर सिंह को “स्कूल नामक संस्था के साथ-साथ बिरादरी की भी संस्थाओं का बोध हुआ.’ क्षत्रिय महासभा’ नामक संस्था के जलसे में वे कभी नहीं गए. स्कूल में हेड मौलवी, हेड पंडित और अंग्रेज प्रिंसिपल को छोड़ कर सभी क्षत्रिय थे. जे पी सिंह पहले भारतीय प्रिंसिपल थे. इस स्कूल में केदारनाथ सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भी छात्र थे.
“हमारे इस स्कूल में एक रॉयल विंग था. वहाँ राजकुमारों का अपना अलग कमरा होता था. हम प्रजाजन एक कमरे में चार होते थे. इस हॉस्टल में मैं छह बरस रहा. यहाँ फौजी जीवन था, कड़ा अनुशासन था. रोज पी. टी. होती थी. हाथ-मुँह धोकर रोज मेस में खाना खाने पंक्तिबद्ध होकर जाते थे. पढ़ाई के बाद दोपहर का भोजन होता. सुबह का नाश्ता कमरों में ही मेज पर सजा रहता. आधी छुट्टी के बाद फिर पढ़ाई शुरू हो जाती थी. पूरी छुट्टी चार बजे होती थी. खेलों के घंटे में कमरे में कोई न रहता था. शाम को संध्या भवन में प्राणायाम, व्यायाम करना, उसके बाद शाम का खाना होता और नौ बजते न बजते रोशनी बुझा दी जाती. सीधा मेन स्विच ऑफ कर दिया जाता और लालटेन जलाने की भी इजाजत न होती.”12
स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे. शनिवार को डिबेट होती थी. सांस्कृतिक कार्यक्रम के दिन विशेष प्रकार का भोजन बनता था. दूध सस्ता था.
“जलेबी-बालूशाही के साथ जम कर दूध पीते थे. वहाँ पर सात-आठ घोड़े भी थे. राजस्थान के मेजर मान सिंह घुड़सवारी सिखाते थे. शनिवार की शाम पढ़ाई नहीं होती थी. तीन बजे लाइन-हाजिर होना पड़ता. मैदान में दौड़ होती.”13
छात्रावास का जीवन अनुशासित था. स्कूल मेंपढ़ाई सस्ती थी.फीस बहुत कम थी- आठ आने, एक रुपया.वह भी माफ हो जाती थी. पिता जी प्रतिमाह पन्द्रह रुपये भेजते थे, जिसमें आराम से काम चल जाता था.
बनारस आने के एक महीने के भीतर ही नामवर सिंह का शिवदान सिंह चौहान, शमशेर बहादुर सिंह और अन्य साहित्यकारों से परिचय हुआ. वे कवि सम्मेलनों में जाने लगे थे. 1942 के आन्दोलन के समय वे आठवीं कक्षा के छात्र थे. उन दिनों उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन के बारे में जाना, उसके बारे में शिक्षा प्राप्त की. बनारस के उनके स्कूल में गर्मी, दशहरे और जाड़े की छुट्टियाँ होती थीं. इन छुट्टियों में वे गाँव आया करते थे. गाँव में होने वाले शादी-ब्याह के कार्यक्रमों, नाच-गान आदि से उन्हें कोई मतलब नहीं था.
“मेरा साथ किताबों से था… मैं अपनी किताबें लिए अलग पढ़ा करता था. उपन्यास पढ़ने का शौक मुझे बहुत कम था. कुछ कविता की किताबें हुआ करती थीं – पुरानी-नई. इस तरह से पढ़ा करता था. किताबें मेरा जीवन साथी हैं, यह मेरे बचपन के एकान्त ने मुझे सिखा दिया था.”14
नामवर सिंह ने अपने स्कूल और कॉलेज के कई अध्यापकों का बार-बार स्मरण किया है, उनकी प्रशंसा की है. क्षत्रिय स्कूल और उदय प्रताप कॉलेज के ठाकुर मार्कण्डेय सिंह उन्हें हमेशा याद रहे. वे ‘बहुत अच्छे अध्यापक’ थे. ठाकुर मार्कण्डेय सिंह की उन पर गहरी छाप पड़ी. उन्हें वागाडम्बर या वाग्जाल पसंद नहीं था.
“पढ़ाते हुए जो पहला संस्कार हमारे मन पर पड़ा, वह था विचारों की स्पष्टता, भाषा की स्पष्टता, वागाडम्बर से बचना… वो रामचन्द्र शुक्ल की भाषा को पसन्द करते थे, प्रेमचन्द की भाषा को आदर्श मानते थे. कठिन-से-कठिन, जटिल-से-जटिल को सुलझा करके कहने की अद्भुत क्षमता थी उनमें.”15
जे.पी. सिंह (जगदीश प्रसाद सिंह) नामवर सिंह के प्रिंसिपल थे, अंग्रेजी के अध्यापक थे. उनके बारे में यह कहा जाता था कि वे बीएचयू के वाइस चांसलर डॉ. राधाकृष्णन से अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं. उन्होंने ‘गोल्डेन ट्रेजरी’ पढ़ाई थी. उनके पढ़ाने का ढंग अनूठा था. कविता याद हो जाती थी.
‘‘यह भी कविता को किस तरह पढ़ना चाहिए, रिसाइट कैसे करना चाहिए एप्रीशिएट कैसे करना चाहिए, समझाना कैसे चाहिए. इतनी अच्छी कविता पढ़ानेवाला आदमी हमें दूसरा नहीं मिला. तो कविता में एक अन्तः प्रवेश और आस्वाद यह हमें जे.पी. साहब से ही मिला.”16
प्रिंसिपल जे.पी. सिंह ने नामवर सिंह जब आठवीं कक्षा के छात्र थे, उनकी खड़ी बोली का एक सवैया, तान के सोता रहा जल चादर, वायु से खींचा जगा गया कोई’ पत्रिका में प्रकाशित किया था. बिहारी दोहों को पढ़ते हुए नामवर सिंह को जलचादर शब्द मिला था. इस सवैये को जब नामवर सिंह पढ़ते थे, तो उनके प्रिंसिपल ‘साथ-साथ उसे गाते थे.’
स्कूल जीवन में नामवर जी को ‘गढ़ने’ का श्रेय मार्केण्डेय सिंह, जे.पी.सिंह और त्रिलोचन शास्त्री को है. संस्कृत के अध्यापक पंडित विजय शंकर मिश्र और इतिहास के अध्यापक, प्रोफेसर, हीरालाल सिंह को भी उन्होंने याद किया है. प्रिंसिपल जे.पी. सिंह ने ‘अंग्रेजी में गहरी रूचि’ पैदा की थी और अंग्रेजी के एक अध्यापक तारा प्रताप सिंह ने उन्हें ‘शुद्ध व्याकरण की दृष्टि से और ‘बामुहावरा’ अंग्रेजी लिखना सिखाया.
‘‘साहित्य की रूचि तो जे.पी. सिंह में थी लेकिन तारा प्रताप सिंह आज कल के जमाने के मुहावरे में इ.एल.टी. (इंग्लिश लैंग्वेज टीचिंग) वाले थे. करेक्ट इंग्लिश, उसकी दीक्षा उन्होंने दी थी.”17
1940 के दशक के स्कूलों के अध्यापक कुछ और थे. फिर ‘हीवेट क्षत्रिय स्कूल’ कोई सामान्य स्कूल नहीं था. अध्यापक छात्रों को निर्मित करते थे. उन दिनों स्कूलों में अंग्रेजी में इतिहास की अच्छी किताबें छात्रों को पढ़ने को मिलती थीं. इतिहास के अध्यापक हीरालाल सिंह से नामवर सिंह ने दो अच्छी बातें सीखने का उल्लेख किया है – अच्छी अंग्रेजी के लिए हिस्ट्री की किताबें पढ़ना जरूरी है और
‘‘उद्धरण कैसे देना चाहिए, यह पोलिटिकल साइंस की किताबों से पता चलेगा… हिन्दी वालों को उद्धरण देना नहीं आता… किसी उद्धरण को इतना लम्बा लिखने की जरूरत नहीं होती. बल्कि उसका जो महत्वपूर्ण मुहावरा है, फ्रेज है, उसे संगतिपूर्ण ढंग से रखा जाए, समझने वाले समझ जाएँगे.’’18
हीराला सिंह इतिहास के अलावा पोलिटिकल साइंस से भी एम.ए.थे. वे ‘‘कोर्स के अलावा दूसरी किताबें देते थे पढ़ने के लिए और हमलोगों को पढ़ने के लिए उकसाते थे.’’19
नामवर सिंह ने ‘प्रतिभा’ को कभी जन्मजात नहीं माना. सब कुछ मिहनत है, श्रम है. उन्होंने ‘प्रतिभा’ को ‘निन्यान्बे प्रतिशत ‘परस्पिरेशन’ कहा है. ‘हिन्दी में अनुवाद करें तो पसीना है.’
‘‘मैंने अनुभव किया है कि मेहनत ही सबसे बड़ी प्रतिभा है. निरन्तर अधिक से अधिक पढ़ते रहना, मेरा ख्याल है कि वह मेहनत ही गुणात्मक परिवर्तन से प्रतिभा बन जाती है. जो परिश्रम है, उसका एक बिन्दु पर पहुँचते ही गुणात्मक परिवर्तन होता है और उसी तरह वह मेहनत या व्यवसाय प्रतिभा बन जाती है. ऐसा मेरा ख्याल है… मेरे भौतिकवादी मन को यह एनोलोजी ज्यादा ठीक मालूम होती है. जन्मजात प्रतिभा नाम की चीज मेरी समझ से परे है. इसलिए मैंने मेहनत से उसका विकास किया है, अर्जित किया है. यह एक तरह की खेती है. उसे जितना जोतोगे, उतनी ही अच्छी फसल काटोगे.’’20
आज बिना जोते फसल काटने में लगभग सब लगे हैं. दो-चार पुस्तकों का संक्षिप्त सारांश प्रस्तुत करना समीक्षा-कर्म माना जा रहा है और ऐसी ‘समीक्षा’ को प्रकाशित करने वाले कुछ सम्पादक सबको समीक्षक, आलोचक घोषित करने में लगे हैं. नामवर सिंह ने अपने छात्र-जीवन में कितना गहन, व्यापक अध्ययन किया था, इसे हम उस समय उनकी लिखी गयी समीक्षाओं, रचनाओं से समझ सकते हैं. उनके छात्र-जीवन को 1936-37 से लेकर उनके रिसर्च करने की अवधि 1956 (‘पृथ्वी राज रासो की भाषा’) या 1952 (‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग) तक देखें, तो यह समय लगभग अठारह-बीस वर्ष का है- स्कूली शिक्षा से लेकर एम.ए. और पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने तक.
‘छायावाद’ (1954) और ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ उनकी बाद की दो आलोचना-पुस्तकें हैं. स्कूल में पढ़ते समय उन्होंने ‘समाज के अग्रचेता : तुलसी’ (क्षत्रिय-मित्र, जुलाई-अगस्त 1945) निबन्ध लिखा. निबन्ध मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद प्रकाशित हुआ था, पर तैयारी पहले से थी. छात्र-जीवन में, स्कूल में नामवर सिंह ने कितना अधिक पढ़ रखा था, इसका अनुमान इस निबन्ध को पढ़ कर किया जा सकता है. तुलसी पर लिखने से पहले वे ‘मानस’ तथा ‘कवितावली’ का गंभीर अध्ययन कर चुके थे. तुलसी का ‘अग्रचेता’ होना ‘‘उनके अतीत एवं वर्तमान की सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक आदि परिस्थितियों, समस्याओं का विशद गंभीर एवं सूक्ष्म अध्ययन तथा चिन्तन का परिणाम है.’’21
छात्र-जीवन में लिखे गये नामवर सिंह के सभी निबन्धों में हम उनके ‘विशद गंभीर एवं सूक्ष्म अध्ययन तथा चिन्तन’ को सहज ही देख सकते हैं. स्कूल में पढ़ते हुए वे मार्क्सवाद का अध्ययन भी कर रहे थे. तुलसी वाले इस निबन्ध में नामवर सिंह ने ‘साहित्य एवं समाज के एक शाश्वत द्वन्द्व’ की बात कही है और इसे किसी भी युग के लिए सत्य माना है. तुलसी पर लिखते हुए वे उन्नीसवीं सदी के दार्शनिक-चिन्तक जॉन स्टुअर्ट मिल (20.5.1806-8.5.1873) और जर्मन दार्शनिक नीत्शे (15.10.1844-25.8.1900) को उद्धृत करते हैं. तुलसी के संबंध में दसवीं में पढ़ने वाले छात्र की यह राय थी कि
‘‘न वे जॉन स्टुअर्ट मिल की तरह व्यक्तिवाद के एक छोर पर हैं, न नीत्शे की तरह राज्य के एक छोर पर. यहाँ भी गोस्वामी जी समन्वयवादी हैं.’’22
मिल और तीत्शे की ही नहीं, मार्क्स और लेनिन की भी इस निबन्ध में उन्होंने चर्चा की. वे ‘राज्यतंत्र’ (ऑटोक्रेसी) से भी सुपरिचित थे, ‘वर्ग-संघर्ष’ से भी. वे इसी निबन्ध में ‘साहित्य’ को ‘राष्ट्र की संस्कृति का प्राण’ बता रहे थे और संस्कृति को चिरन्तन. नामवर सिंह के इस पहले निबन्ध ने ही यह बता दिया था कि हिन्दी में एक गंभीर आलोचक का जन्म हो रहा है. यह 1945 का वर्ष था.
नामवर सिंह का त्रिलोचन शास्त्री से संबंध छात्र-जीवन से ही बना. 1941 में बनारस आने से उनका संबंध स्थापित हुआ.
‘‘सन 1941 में त्रिलोचन जी से जो संबंध-सूत्र स्थापित हुआ, वह थोड़े-बहुत अन्तराल के साथ जीवन भर बना रहा.’’23
त्रिलोचन को उन्होंने अपना ‘अभिभावक’ और ‘गुरु’ कहा है.
‘‘मैं आज जो भी हूँ, उन्हीं का प्रसाद है. मुझे उन्होंने साहित्य में उँगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया है और यह इतना बड़ा ऋण है कि उन पर कभी एक पूरी पुस्तक लिख कर ही अंशतः उऋण हुआ जा सकता है.’’24
त्रिलोचन पर उन्होंने पुस्तक तो नहीं लिखी, ‘आलोचना’ नवंबर 82 (जुलाई-सितम्बर 1987) को त्रिलोचन-विशेषांक बनाया. त्रिलोचन शस्त्री की सलाह पर खड़ी बोली में कविताएँ लिखना आरंभ किया. उनकी प्रेरणा से ही निराला की ‘अनामिका’ खरीदी और छायवादी कवियों से जुड़े. नामवर सिंह ने स्वीकारा है कि ‘‘साहित्य का क-ख-ग मैंने उनसे ही सीखा.’’25
नामवर सिंह 1944 में जब हाईस्कूल की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, त्रिलोचन उनके कमरे में ‘तारसप्तक’ लेकर आये थे. ‘तारसप्तक’ का प्रकाशन उसी समय हुआ था और इस संकलन के बारे में त्रिलोचन ने उन्हें काफी बताया था. ‘तारसप्तक’ पढ़ने के बाद नामवर सिंह को उसमे ‘रस नहीं आया’ था. त्रिलोचन ने समझाया – ‘‘आपने अभी बोधपूर्वक प्ढ़ा है…. आप इसे भाव पूर्वक पढ़िए.’’26
नामवर सिंह के निर्माण में बनारस की बड़ी भूमिका है. 1940 और 50 के दो दशक एकाध वर्ष छोड़कर उनके बनारस के दशक हैं. हरीश त्रिवेदी को यह सुनने को मिला था कि
‘‘जब नामवर बनारस के स्कूल में पढ़ते थे, तो उनके एक अध्यापक ने कहा कि इस बालक में शंकराचार्य की प्रतिभा है.’’27
क्षत्रिय स्कूल एक जाति-विशेष के छात्रों-अध्यापकों का स्कूल था. अनुशासन कड़ा था और स्कूल में कोई छात्र-संगठन नहीं था. दसवीं पास करने के बाद 1946 में जब नामवर सिंह ग्यारहवीं कक्षा में पहुँचे, तब उन्होंने स्कूल में पहला छात्र-संगठन बनाया. छात्र-जीवन में वे कम्युनिस्ट पार्टी से परिचित हो चुके थे, प्रगतिशील लेखक संघ का सदस्य बन चुके थे. उनके हिन्दी अध्यापक मार्कण्डेय सिंह प्रगतिशील लेखक संघ की बनारस इकाई के उपाध्यक्ष थे. नन्द दुलारे वाजपेयी अध्यक्ष और अमृत राय सेक्रेटरी थे. अमृत राय बनारस आकर स्टडी सर्कल चलाने के लिए उनके स्कूल में ‘शाम को चुपके-चुपके आते थे’ और कुछ ‘बुकलेट दे जाया करते थे’. नामवर सिंह ने छात्र-जीवन में ही कम्युनिस्ट साहित्य भी पढ़ा था. मार्क्स-एंगेल्स को न सही, पर वे कम्युनिस्ट पार्टी की पत्रिकाओं से ‘लोक युद्ध’ से परिचित थे. स्कूल में छात्र-संगठन बनाने के बाद जो हड़ताल की गयी, उसका हिन्दी में पर्चा नामवर सिंह ने लिखा था,
‘‘जिसमें लफ्फाजी बहुत थी, जोश-वोश था, जिसका हमारे प्रिंसिपल साहब ने काफी मजाक बनाया, पढ़ कर सुनाया सबके सामने. हमने बहुत दौड़-धूप की, संगठन किया था. उसमें जो कक्षा में पहली दसों पोजीशन आने वाले लोग थे… सबने गाँधी टोपी पहनकर फोटो खिंचाई थी, उनको कॉलेज से निकाला गया. मैं बीमार पड़ कर कहीं डिस्पेंसरी थी, उसमें पड़ा था… उन दस लोगों में मार्कण्डेय सिंह भी थे, जो बाद में दिल्ली में लेफ्टिनेंट गवर्नर बने.’’28
प्रगतिशील साहित्य और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ने के पहले नामवर बनारस के लेखक-संघ की गोष्ठियों में जाने लगे थे, वहाँ कविताएँ भी सुनाने लगे थे. सक्रियता साहित्य में थी और थोड़ी-बहुत ही सही, राजनीति में भी. बनारस का वातावरण ‘साहित्यिक-राजनीतिक गहमागहमी’ से भरा था. नामवर सिंह ने 1942 के आन्दोलन में ‘बाकायदे भाग लेने’ की बात कही है. ‘‘विद्यार्थी था, आठवीं का. कॉलेज बंद हो गया था. वह जुलूस हमने निकाला था. कचहरी पर झंडा फहराने गये थे तो कॉलेज बन्द कर दिया गया था. बनारस शहर से पैदल चल कर और कमर बराबर पानी भरे धान के खेतों से होते हुए अगस्त के महीने में अपने घर पहुँचा था और 16 तारीख हमारे थाना धानापुर में झंडा फहराया गया था.’’29

लेखक – रविभूषण
