ओमप्रकाश तिवारी की कविता – कीटनाशक

कविता

 कीटनाशक

ओमप्रकाश तिवारी


फसलों में अंधाधुंध

कीटनाशकों का प्रयोग

भयावह हो गया है

ऐसा चारा खाने के बाद

कमजोर हो गईं हैं

दुधारू पशुओं की नसें

दूध निकालने पर अब

निकलने लगता है खून

जमीन भी होती जा रही

दिन प्रतिदिन बंजर, ऊसर

भविष्य में नहीं उगेंगी फसलें

ऐसे अनाज खा कर

आदमी भी हो रहा बीमार

जीने कम, मरने का अधिक

उपाय कर रहा है कीटनाशक

दुश्मन कीट मारने के चक्कर में

मर रहे हैं मित्र कीट

यही वे चेता रहे, बता रहे हैं

वैज्ञानिक हैं, कोई दुश्मन नहीं

तुम्हारे भले की बात करेंगे

मान जाओगे तो भला ही होगा

तुम भी स्वस्थ, तुम्हारी धरती भी

भविष्य में फसल भी लहलहायेगी

बचेगी सभ्यता और तुम्हारा वंश भी

 

(खेती में कीटनाशकों के प्रयोग की यह एक हकीकत है। लेकिन यह एक बिंब है आज की सियासत का भी है। जितना यह कश्मीर पर लागू होता है उतना ही सीरिया पर या किसी भी ऐसी जगह पर जहां ऐसी सियासी गतिविधयां चल रही हैं। अपने बिंब में यह कविता यूनिवर्सल है। वैश्विक है।)

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