सतबीर सिंह तक्षक – बेहतरीन शिक्षक, समाजसेवी और कर्मचारी नेता

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 88

सतबीर सिंह तक्षक – बेहतरीन शिक्षक, समाजसेवी और कर्मचारी नेता

सत्यपाल सिवाच

दादरी जिले के भागवी गांव में 08.01.1947 को श्रीमती मोटादेवी और चौधरी देवीराम के घर किसान परिवार में जन्मे सतबीर सिंह ने अपने शानदार जीवन और आदर्शों के कारण गांव ही पूरे इलाके में सम्मान के साथ याद किए जाते हैं। वे चार भाई और तीन बहनें हैं। बड़े भाई श्री बलबीर सिंह और इनसे छोटे श्री रणबीर सिंह ऑनरेरी कैप्टन पद से सेवानिवृत्त हुए। सबसे छोटे जयवीर सिंह भी आर्मी में थे और कर्नल पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। वे कुश्ती के बेहतरीन खिलाड़ी रहे हैं। उनका सामाजिक कार्यों में काफी योगदान रहता है जिसके चलते समाज में एकता और भाईचारा बढ़ा है। सतबीर सिंह ने स्कूली शिक्षा के बाद बी.ए. बी.एड. उपाधि प्राप्त की और 15 सितंबर 1970 शिक्षा विभाग में एस.एस. मास्टर के नियुक्त हो गए तथा 31 जनवरी 2005 को मुख्याध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए। वे परिश्रमी और समर्पित शिक्षक होने के साथ-साथ उच्च कोटि के खिलाड़ी भी रहे।

वे सेवा में आने के प्रारंभिक दौर में यूनियन में सक्रिय हो गए। सन् 1973 की हड़ताल में वे पंद्रह दिन उत्तरप्रदेश की बरेली जेल में बंद रहे। उन्होंने हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ, सर्वकर्मचारी संघ और एस.टी.एफ.आई. के अलावा सेवानिवृत्ति के किसान सभा में काम किया।

सतबीर सिंह सन् 1973 में संगठन के कार्यकर्ता बन गए थे। सन् 1992 से 1994 तक वे उपमंडल प्रधान व 1994-96 तक जिला के उपाध्यक्ष रहे। सन् 1996 से 2000 तक दो बार जिला सचिव रहे। इसके बाद 2000-02 तक वे सलाहकार व उपमंडल सचिव की भूमिका में रहे। वे सर्वकर्मचारी संघ खण्ड सचिव भी रहे।

सतबीर सिंह ने 1973 में पंद्रह बरेली जेल से लड़ाई में उत्पीड़न का दंश झेलना शुरू किया। इस दौरान हड़ताल की अवधि वेतन नहीं दिया गया और हड़ताल अवधि को लम्बे समय बाद नियमित किया। वे सन् 1987 के आन्दोलन में भी लाठीचार्ज व पुलिस दमन के शिकार हुए। उन्हें 24 नवंबर 1993 से 30 नवंबर 1993 तक बुड़ैल जेल में रखा। जेल भरो आंदोलन के इस आह्वान में उन्हें भिवानी में गिरफ्तारी से बचकर चण्डीगढ़ पहुंचने के लिए मोतीराम व दर्जनों साथियों के साथ सांजरवास से बस लेनी पड़ी थी।

सेवानिवृत्ति के बाद किसान आन्दोलन में भी वे प्रशासन से भिड़े। सभी प्रकार का उत्पीड़न आन्दोलनों के बाद समझौते के साथ निरस्त्र होता रहा।

वे स्वयं बुनियादी रूप से शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता मानते थे। उनके कोई भी ऐसा आचरण स्वतः वर्जित रहा जो एक शिक्षक, एक नागरिक और इंसान के लिए अकरणीय माना जाता हो। यही आदर्श उनके जीवन का मूलमंत्र रहा। वे कभी किसी नेता अथवा अधिकारी के पीछे इसलिए नहीं भागे कि ऐसा अवसरवादी आचरण व्यक्ति की गरिमा के विपरीत होता। उन्होंने अपने छात्रों और बच्चों को भी यही शिक्षा दी। वे महसूस करते हैं कि पहले की तुलना में अब यूनियन में काम करना आसान है। उन दिनों पैदल, साइकिल द्वारा अथवा मेन रूट बस द्वारा जाया जा सकता था। तब भी कर्मचारियों से जुड़ाव रहता था। अब टेलीफोन, इंटरनेट, बाइक, गाड़ियां आदि अनेक सुविधाओं ने संपर्क आसान बना दिया है, लेकिन विश्वास में क्षरित हुआ है। संगठन व संघर्ष के प्रति विश्वास घटना संगठन के लिए हानिकारक है।

सतबीर सिंह के परिवार का विवरण भी जान लीजिए। 22 मई 1966 को सुश्री चांदकौर से विवाह हुआ था। उनके तीन बच्चे हैं, एक बेटी और दो बेटे। बच्चे खेती व अन्य निजी काम से निर्वाह करते हैं। संघर्षों के दौरान परिवार का सहयोग इसलिए मिलता रहा, क्योंकि वे अपनी गतिविधियों के बारे में घर पर बताते रहते थे। इस समाजसेवी शिक्षक का 18 जनरी 2020 को उनका निधन हो गया। उनकी स्मृति आने वाले समय पर नये साथियों को प्रेरित करती रहेगी। (सौजन्य -ओमसिंह अशफ़ाक )

लेखक – सत्यपाल सिवाच

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