मास्टर भरत सिंहः पद नहीं, उद्देश्य के प्रति समर्पण

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-86

 

मास्टर भरत सिंहः पद नहीं, उद्देश्य के प्रति समर्पण

 

सत्यपाल सिवाच

 

हिसार जिले के नारनौंद क्षेत्र के गांव बुडाना निवासी मास्टर भरत सिंह अध्यापक वर्ग, कर्मचारी और जनवादी आन्दोलन के ऐसे कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं जिन्हें पद, ओहदे अथवा दर्जे की नहीं, लक्ष्य को हासिल करने की चिंता काम के लिए संचालित करती है। वे उम्र इस पड़ाव पर भी बौद्धिक रूप से बहुत सक्रिय और जागरूक हैं। रोजमर्रा के जनजीवन, राजनीतिक व सामाजिक घटनाक्रम की पूरी जानकारी रखते हैं। हर मुद्दे पर अपनी राय बेबाक ढंग से रखते हैं। सामने वाले की बात ध्यान से सुनते हैं और दूसरे पक्ष के तर्कों के प्रति सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। मेरा उनसे लगभग चालीस साल पुराना परिचय है। वे जिस आत्मीयता से पेश आते हैं उसे महसूस करके ऐसा लगता है कि मानो परिवार को बड़ा अपने अनुभव से सलाह दे रहा है।

उनका जन्म 2 जनवरी 1942 को श्रीमती पतोरी देवी और श्री राजेराम के घर एक साधारण किसान परिवार में हुआ। वे छह भाई और एक बहन हैं। उन्होंने दसवीं तक शिक्षा प्राप्त करके जे.बी.टी. प्रशिक्षण प्राप्त किया।

वे दिनांक 25 अगस्त 1964 को शिक्षा विभाग हरियाणा में प्राथमिक शिक्षक नियुक्त हो गए और 31 जनवरी 2000 को सेवानिवृत्त हो गए। वे अपने सेवाकाल के प्रारंभिक दौर में ही अध्यापक संघ से जुड़ गए थे। शिक्षकों में कोठारी शिक्षा आयोग लेकर आन्दोलन चला तो संयुक्त पंजाब के शिक्षक भी उसमें सम्मिलित हुए। हरियाणा बनने पर वह विरासत कायम रही। उनके क्षेत्र के पेटवाड़ निवासी रिसाल सिंह व मदनगोपाल शास्त्री उस समय तक यूनियन नेता स्थापित हो गए थे। बाद में मास्टर सोहनलाल के राखी गढ़ी में तैनाती के दौरान भरतसिंह व बलबीर सिंह गामड़ा का इनसे निकट संपर्क बन गया था।

वे पहले आदमपुर क्षेत्र में नियुक्त थे। सत्ता के दबाव में अधिकतर शिक्षक सामने आने से झिझकते थे। इन्होंने पहल करके धरने का नेतृत्व किया। इससे उत्साहित होकर अन्य शिक्षक भी सामने आ गए।

वे हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ में ब्लॉक प्रधान, 1993 तक जिला कमेटी में पदाधिकारी और एक बार राज्य ऑडिटर पद पर चुने गए। वे आमतौर पर दूसरों को पदाधिकारी बनाने के लिए कोशिश करते। स्वयं बिना पद के ही पूरी सक्रियता से सहयोग करते। बाद के दौर तक वे, बलबीर सिंह और रामकुमार शर्मा तीनों हर छोटे-बड़े संघर्ष व गतिविधि उपस्थित रहते। वैसे वे 1969 में पहली बार पदाधिकारी बन गए थे।

25 जनवरी 1970 में दिल्ली में रैली में भाग लेने पर उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।

5 जनवरी 1970 को आदमपुर एम एल ए की दुकान पर धरने के कारण निलंबित किया गया।1975 और 1982 में उन्हें दूर ट्रांसफर किया गया। सन् 1973 में हड़ताल हिस्सा लिया और जेल में गए। सन् 1993 में फिर रात में घर से गिरफ्तार कर हिसार जेल में डाला गया।निलंबन के डेढ़ महीने बाद तबादला हुआ और आपातकाल के पांच साल बाद 1982 में सरकार बदलने के बाद वापसी हुई।

भरत सिंह बताते हैं कि कर्मचारी आन्दोलन, विशेषकर सर्वकर्मचारी संघ बनने का अच्छा अनुभव रहा। सभी संगठनों का एक साथ आना, सर्व कर्मचारी संघ का बनना अच्छा रहा। वर्षों बाद 1973-74 याद ताजा हो गई। 1993 में अध्यापकों और 20–25 अन्य कर्मचारियों को फोर ह्वीलर में इकट्ठा करके स्कूलों और दफ्तरों में जाना अच्छा अनुभव था। उससे उत्साह का वातावरण बना।

परिवार यूनियन के काम को सही नहीं मानता था। घर में ऐसा लगता था कि हमें घरेलू जरूरतों को महत्व देना चाहिए। साथ ही “अतिथि देवोभव” के संस्कार के चलते घर में आने वालों के भोजन आदि व्यवस्था को कर्तव्य के रूप में ही लिया जाता था। उन दिनों यूनियन के लोगों का घर पर आना, भोजन करना, रात को रुकना आदि आम बात होती थी। सन् 1980 के बाद इनका शेरसिंह आदि से भी घनिष्ठ संबंध बन गया था।

जनता पार्टी की ओर से अध्यापक नेता रहे रणसिंह मान, शान्ति राठी आदि एम एल ए बनने पर शिक्षक आन्दोलन से जुड़े नहीं रहे। उनके रुख से निराशा हुई। शुरुआत में उनसे कुछ उम्मीद बंध गई थी लेकिन वे अपने राजनीतिक करियर के लिए चिंतित रहने के कारण संगठन विरोधी बन गए। उन्होंने निजी रूप से किसी नेता या अधिकारी से सम्बन्ध बनाने या काम निकालने नहीं सोची।

वे महसूस करते हैं कि “शिक्षण, संगठन और संघर्ष” का मंत्र ही अध्यापक आन्दोलन की सफलता का मंत्र हो सकता है। वे स्वयं अपने सेवाकाल में समर्पित और परिश्रमी शिक्षक रहे।

वे अपने समय के याद करते हुए कहते हैं कि पहले संसाधनों के अभाव के चलते भी काम अच्छा होता था परंतु आज संसाधनों के बावजूद प्रतिबद्धता कम दिखाई देती है। उनका मानना है कि जब तक व्यक्ति सक्रिय रूप से सामाजिक मामलों में लगा रहता है तब तक वह बीमारियों से भी मुक्त रहता है और लोगों के साथ प्रेम भी बना रहता है।

अब परिवार में उनकी पत्नी का  सुनेहरी देवी हैं जिनसे 1958 में विवाह हुआ था। उनके पांच (3 लड़के 2 लड़की) बच्चे हैं। सभी की शादी हो चुकी है। लड़कियां घरेलू काम, दो बड़े लड़के अपना बिजनेस करते हैं, छोटा सामाजिक काम के साथ-साथ सी.पी.एम. पार्टी का जिला सचिव और राज्य सचिवमंडल सदस्य है। पोते-पोतियों का समृद्ध परिवार है। फिलहाल हिसार में रहते हैं। (सौजन्यः ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक- सत्यपाल सिवाच

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *