ओमप्रकाश तिवारी की चार कविताएं
1
चौथे स्थान पर रहे तो क्या हुआ
चौथे स्थान पर रहे तो क्या हुआ
क्या कम है खेल में भाग तो लिए
दर्शक दीर्घा में भी रह सकते थे
खड़े सबसे पीछे ताली बजाते हुए
मैदान तक न पहुंचना भी तय था
पहुंच कर खेल में शामिल तो हुए
तब तो खेल को ही न जान पाते
संतति को बताने लायक तो हुए
अगली पीढ़ी में कोई विजेता होगा
यह जताने ओ बताने लायक तो हुए
2
खास इलाका
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कंटीले तारों को घेर कर
उस पर टांग दी गईं तख्तियां
लिख दिया गया कि
यह आम रास्ता नहीं है
मकसद
तारों के उस पार के इलाके को
खास बताना है
कि इधर रहते हैं खास लोग
उधर जाना मना है
ठीक ही है यह व्यवस्था
मानव सभ्यता के विकास की तरह
व्यवस्थाओं का भी इतिहास रहा है
ढहती और बदलती रही हैं व्यवस्थाएं
जनता का क्या है हुजूर
वह तो अभ्यस्थ ही है
नए रास्ते बनाने के लिए
जहां बंद होता है एक रास्ता
तीन दिशाओं में बन जाते हैं रास्ते
फिर खास नहीं रह जाता
कोई भी खास इलाका।
3
साजिश
गेंद जो उछल रही है
आसमान छूने को आतुर
कभी जमीन से कुछ ऊपर
दिखा रही कलाबाजी
दावे कर रही हसीन
सपने भी दिखा रही
बच्चे बजा रहे ताली
हो रहा उनका मनोरंजन
दरअसल
बच्चे नहीं जानते
गेंद रबड़ की है
उसे किसी ने उछाला है
ताकि होता रहे उनका मनोरंजन
और वह उनके सपने कैद कर सके…
4
पसंद
….
बस में सभी सीटें ख़ाली हों तो
मुश्किल होता है चयन करना
किस सीट पर बैठें सोचना पड़ता है
कोई एक पसंद ही नहीं आती
किसी सीट पर बैठ गए तो
कई कमियां निकल आती हैं
फिर सीट बदल भी लेते हैं
जब खाली नहीं होते है सीट
तब खड़े होकर मायूस देखते हैं
कोई सीट तो खाली मिल जाय
कोई सवारी उठने की कोशिश करती है
देखते ही टूट पड़ते हैं कि कोई और न बैठ जाय
पसंद का चयन गायब हो जाता है
बाजार में खरीदारी करते समय भी
जेब में मौजूद पैसे तय करते हैं पसंद
घर में भोजन की पसंद भूख नहीं
पैसा ही तय करता है
लगी हो भूख तो कुछ खाया जा सकता है
भरी हो जेब तो पसंद करने में समय लगता है।
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