चैनलों का खेल खत्म! लाइसेंस सरेंडर का युग शुरू…
भारतीय न्यूज़ चैनलों का भविष्य अब सिर्फ संकट में नहीं, बल्कि ढलान पर है।
जिस माध्यम ने कभी जनमत बनाया, सत्ता से सवाल पूछे और करोड़ों दर्शकों को जोड़ा — वही माध्यम आज दर्शकों से खाली स्टूडियो और सरेंडर होते लाइसेंस देख रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में दर्शकों ने न्यूज़ चैनल्स को “देखना ही छोड़ दिया”।
यह केवल TRP की गिरावट नहीं, बल्कि विश्वसनीयता के पूर्ण पतन की कहानी है।
मुख्य कारण साफ हैं:
जनसरोकार की खबरों से दूरी
दिन-रात सांप्रदायिक, प्रायोजित और एकतरफा बहसें
सत्ता के सामने पत्रकारिता का आत्मसमर्पण
एक बार जब कोई माध्यम एक्सपोज़ हो जाता है, तो प्रकृति का नियम है — वह हमेशा के लिए हाशिये पर चला जाता है।
नतीजा?
करीब 50 टीवी चैनल अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस सरेंडर कर चुके हैं
विज्ञापन राजस्व में भारी गिरावट
परिचालन लागत लगातार बढ़ती हुई
कम दर्शक = कम विज्ञापन = चैनल बंद
हालिया उदाहरण
ABP News HD बंद
NDTV Gujarati का लाइसेंस वापस
Sony (Culver Max) ने 26 डाउनलिंकिंग अनुमतियां सरेंडर कीं
Zee, JioStar, TV Today, NDTV, ABP जैसे बड़े नेटवर्क्स ने भी कई चैनल समेटे
सबसे पहले प्रादेशिक चैनल्स गिरे — वही चैनल जो कभी “ग्राउंड रिपोर्टिंग” की पहचान थे।
आज जो चैनल बचे हैं, वे भी कई राज्यों में
सूचना विभागों और मंत्रालयों के विज्ञापन वेंटिलेटर पर ज़िंदा हैं।
एक बड़ी कंपनी के CEO (नाम गोपनीय):
> “हमारा सालाना पब्लिसिटी बजट 20 करोड़ था।
घटती क्रयशक्ति, निर्यात संकट और चीन की चुनौती के बीच अब यह संभव नहीं।”
यह सिर्फ भारत की कहानी नहीं है
अमेरिका और यूरोप में केबल न्यूज़ लगातार गिरावट में
युवा दर्शक टीवी छोड़कर YouTube, Podcast, Digital News की ओर
CNN, BBC, Fox जैसे नेटवर्क्स भी डिजिटल शिफ्ट को मजबूर
भारत में बदलाव और तेज़ है
वरिष्ठ पत्रकारों के YouTube चैनल
बिना सेंसर, संदर्भों के साथ कंटेंट
खुली टिप्पणियां, त्वरित असहमति
शाम 6–8 बजे “मुर्गा-मुर्गी बहस” से मुक्ति
नया प्रयोग
छोटे राज्यों में GPS-ट्रैक्ड LED वैन —
कम लागत, सीधे जनता से संवाद, और बिना स्टूडियो ड्रामा।
इतिहास याद रखें
1965: दूरदर्शन का पहला 5 मिनट का बुलेटिन
1991: CNN और खाड़ी युद्ध
1992: Zee News
2000–2020: चैनलों का विस्फोट
2025 के बाद: सरेंडर युग
सच कड़वा है:
आप चैनल खोल सकते हैं,
दर्शक खरीद नहीं सकते।
जो माध्यम जनता से कट गया,
वह तकनीक से नहीं — अविश्वसनीयता से मरा।
न्यूज़ चैनलों का संकट असल में पत्रकारिता का आईना है।
