बात बेबात
डिप्लोमेटिक साइलेंस मोड
विजय शंकर पांडेय
डोनाल्ड ट्रंप अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे दुकानदार हैं, जो “मित्रता” के बोर्ड के नीचे सबसे महंगी रसीद थमा देते हैं। ग्राहक भारत हो तो मुस्कान और चौड़ी—“डील शानदार है, बस थोड़ा-सा झुकना पड़ेगा।” उधर भारत झुकता नहीं, बल्कि योग करता हुआ दिखाई देता है—स्ट्रैटेजिक फ्लेक्सिबिलिटी आसन में।
ट्रंप की वसूली नीति सीधी है—टैरिफ दो, हथियार लो, तेल खरीदो और ऊपर से तारीफ भी सुनो। बदले में मिलेगा “ग्रेट रिलेशनशिप” का सर्टिफिकेट, जो अगले ट्वीट तक ही वैध रहता है। भारत पूछता है—हमारे हित? जवाब आता है—“यू आर ग्रेट, बट अमेरिका फर्स्ट।”
मोदी सरकार इस पूरी कवायद में वैश्विक मंच पर ऐसी खड़ी दिखती है जैसे पड़ोसी की शादी में बिना निमंत्रण गए मेहमान—न मुस्कुराना छोड़ा जा सकता है, न प्लेट खाली रखी जा सकती है। संप्रभुता की बात हो तो बयान सख्त, लेकिन डील की मेज़ पर आवाज़ अचानक ‘डिप्लोमैटिक साइलेंट मोड’ में चली जाती है।
भू-राजनीतिक प्राथमिकताएँ अब पंचवर्षीय योजना नहीं, बल्कि “व्हाइट हाउस वीकेंड ऑफर” पर तय होती हैं। ट्रंप पूछते हैं—कितना दोगे? भारत सोचता है—कितना बचा सकते हैं? और जनता पूछती है—कब तक मुस्कान में राष्ट्रीय हित ढूंढते रहेंगे?
आख़िर में फोटो आती है, हाथ मिलते हैं, ट्वीट होता है—#AMAZINGFRIENDSHIP।” और बिल? वो तो हमेशा भारत के नाम।

लेखक- विजय शंकर पांडेय
