हीरा महल की चमक, गणतंत्र की परछाई
कृष्ण कायत
3 फरवरी 2026 को नाभा के हीरा महल में 124 साल पुरानी सिख-शाही परंपरा दोहराई गई। 16 वर्षीय अभि उदय प्रताप सिंह को शीशगंज गुरुद्वारा के प्रमुख बाबा राय सिंह ने पगड़ी बांधी, जबकि अखंड पाठ का भोग भी संपन्न हुआ। पंजाब विधानसभा स्पीकर कुलतार सिंह संधवा, हरियाणा सीएम नायब सैनी, डेरा ब्यास प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लो जैसे बड़े नेता-संत उपस्थित रहे, जो इसे सांस्कृतिक गौरव बता रहे थे।
आजादी के 78 वर्षों बाद पंजाब के नाभा में हीरा महल की शाही रौनक एक बार फिर सुर्खियों में है। दस्तारबंदी का आयोजन, शोभायात्रा-सा दृश्य, राजसी प्रतीक, और संतों-नेताओं की मौजूदगी—सब कुछ ऐसा मानो समय ने पलटकर औपनिवेशिक दौर से पहले के रजवाड़ों की तरफ कदम बढ़ा दिए हों। यह दृश्य केवल एक परिवार की परंपरा का सार्वजनिक उत्सव नहीं है; यह हमारे लोकतांत्रिक विवेक के सामने खड़ा एक असहज सवाल है – क्या हम इतिहास से सबक लेकर आगे बढ़े हैं, या शानो-शौकत की चमक में फिर उसी मानसिकता की ओर लौट रहे हैं जिससे निकलने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा था?
नाभा रियासत का इतिहास पंजाब की राजनीतिक स्मृति का हिस्सा रहा है। महाराजा रिपुदमन सिंह जैसे व्यक्तित्वों की विरासत में प्रतिरोध, स्वाभिमान और सत्ता के साथ टकराव के अध्याय भी दर्ज हैं। लेकिन आज उस इतिहास के चयनित अंशों को चमकदार प्रतीकों में ढालकर पेश करना – राजा, राजकुमार, दरबार, शाही स्वागत ; एक नई कथा रचता है। यह कथा परंपरा के नाम पर सत्ता के पुराने ढाँचों को सांस्कृतिक गौरव की शक्ल में वैध ठहराने की कोशिश करती है।
सबसे चिंताजनक वह सहजता है, जिससे इस आयोजन को “सांस्कृतिक” कहकर सामान्य बना दिया गया। लोकतंत्र में परंपराएँ निजी आस्था और सामुदायिक पहचान का हिस्सा हो सकती हैं, पर जब वे सार्वजनिक मंच पर सत्ता-प्रदर्शन का रूप ले लें, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। राजनेताओं की उपस्थिति इसे केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं रहने देती; यह उसे राजनीतिक अर्थ देती है। चुनावी मौसम में प्रतीकों की राजनीति नई नहीं है । धर्म, जाति, क्षेत्र और अब राजशाही की स्मृतियाँ ; सबका इस्तेमाल वोटों की गणित में होता रहा है। फर्क बस इतना है कि यहाँ गणतंत्र के मूल्यों के समक्ष ऐसे प्रतीक खड़े किए जा रहे हैं, जो समानता नहीं, विशेषाधिकार की याद दिलाते हैं।
आम लोगों का उत्साह भी इस बहस का अहम हिस्सा है। भीड़ का कौतूहल, तालियाँ और जयकारे केवल आयोजन की भव्यता के लिए नहीं होते; वे उस गहरे बैठे मनोविज्ञान को उजागर करते हैं, जहाँ सत्ता अब भी “वंश” और “शान” से जोड़ी जाती है। यह वही गुलामी वाली मानसिकता है, जिसमें शासक का जन्म उसे श्रेष्ठ बना देता है और नागरिक होने का बोध पीछे छूट जाता है। लोकतंत्र इसके ठीक उलट विचार पर खड़ा है—यह कहता है कि सत्ता सेवा है, वंशानुगत अधिकार नहीं।
पंजाब के वर्तमान हालात इस संदर्भ को और गंभीर बनाते हैं। नशे, बेरोजगारी, कृषि संकट और सामाजिक विभाजन से जूझते राज्य में ऐसे आयोजनों की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? क्या यह जनता का ध्यान असली मुद्दों से हटाने का एक और तमाशा नहीं है? इतिहास गवाह है कि जब समाज संकट में होता है, तब प्रतीकों और भावनाओं का सहारा लेकर ध्यान भटकाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं। धार्मिक मंचों और राजनीतिक ताकतों का यह मेल यदि विवेक से बाहर चला जाए, तो वह समाज को समाधान नहीं, बल्कि भ्रम देता है।
यह लेख किसी व्यक्ति या परिवार की निजी आस्था पर हमला नहीं है। सवाल आयोजन के स्वरूप और उसके सार्वजनिक संदेश का है। क्या आज के भारत में, जहाँ संविधान हर नागरिक को समान मानता है, “राजकुमार” के स्वागत का कोई औचित्य बचता है? क्या हम परंपरा के नाम पर उस इतिहास को फिर से सजाने जा रहे हैं, जिसने असमानता और शोषण को जन्म दिया?
हीरा महल की चमक क्षणिक हो सकती है, पर उसके पीछे पड़ती परछाईं दूर तक जाती है। यह परछाईं हमें आगाह करती है कि लोकतंत्र केवल संविधान की किताबों में नहीं, नागरिकों की चेतना में जीवित रहता है। अगर चेतना पर चमक भारी पड़ने लगे, तो गणतंत्र खोखला होने लगता है। आज ज़रूरत है जागरूकता की , परंपरा और तमाशे के फर्क को समझने की, इतिहास का सम्मान करते हुए भविष्य की रक्षा करने की। वरना कल कोई और महल, कोई और शोभायात्रा, और हम हर बार यही कहते रह जाएंगे कि यह तो बस एक आयोजन था ; जबकि धीरे-धीरे लोकतंत्र की जमीन हमारे पैरों तले से खिसकती जाएगी।
आजादी के बाद राजपरिवारों को समाप्त किया गया, फिर भी ऐसे आयोजन गुलामी के रजवाड़ों को जिंदा करते हैं। आम लोगों का कौतूहल दर्शाता है कि शिक्षा-जागरूकता की कमी से वोटर वर्गीय भेदभाव की ओर लौट रहा है। पंजाब पहले ही नशा, बेरोजगारी और अलगाववाद से जूझ रहा; यह राजशाही का प्रदर्शन साजिशों को हवा देगा। सतर्क रहें, वरना लोकतंत्र राजाओं के हाथों बिकेगा।
