विविधता में एकता का प्रतीक है उर्दू भाषा
मनजीत सिंह
*‘रम्ज-ए-उर्दू’* युवा लेखक मनजीत सिंह (सहायक प्राध्यापक,कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र) का उर्दू भाषा एवं साहित्य पर एक विवेचनात्मक निबंध संग्रह है। रम्ज-ए-उर्दू का अर्थ यहाँ रेख्ता से है अर्थात अरबी-फारसी और हिंदी के शब्दों से बने मिश्रित भाषा उर्दू जिसे शुरुआत में हिंदवी या हिन्दुस्तानी भी कहा गया है।आम तौर पर उर्दू को विदेशी भाषा मान लिया जाता है लेकिन यह हिंदुस्तान की ही भाषा है । यहीं पर इसका जन्म हुआ है। इसमें अरबी, फारसी हिंदी और बहुत सारी अन्य देसी-विदेशी भाषाओं और बोलियो के शब्दों का मिश्रण होता रहा है। केवल इसकी लिपि (अरबी-फारसी) ही अलग रही । इस लिपी को दाएं से बाएं लिखा जाता है।
इस निबंध-संग्रह में उर्दू के क्रमिक विकास का पता चलता है। इन निबंधों में मनजीत सिंह ने आम पाठकों और विद्यार्थियों में उर्दू के बारे में समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया है । इन लेखों से पता चलता है कि उर्दू भाषा एवं साहित्य से हमारी संस्कृति सदियों से जुड़ी रही है । इसका विपुल साहित्य इसी देश का साहित्य है । इसीलिए हमारे सभी धर्म-ग्रंथों का अनुवाद भी उर्दू में हुआ है। इस पुस्तक में उर्दू के प्रारंभ से लेकर आज तक की यात्रा के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है । इस निबंध-संग्रह में कुल 18 निबंध हैं , मुख्य तौर पर उस उर्दू भाषा के साहित्य की विभिन्न विधाओं पर विस्तृत सामग्री है । उर्दू लघुकथा, अफसाना, निबंध, गज़ल, नज्म, लोक गीत आदि का विस्तार से वर्णन है ।
विद्यार्थियों और उर्दू सीखने की इच्छा रखने वाले आम लोगों के लिए उर्दू की वर्णमाला को भी बहुत सरल ढंग से समझाया गया है। यदि थोड़ा समय निकाल कर इसमें दिए गए वर्णमाला के कायदे को अच्छी तरह समझा जाए और अभ्यास किया जाए तो आसानी से उर्दू सीखा जा सकता है ।
आधुनिक काल के बारे में लेखक मनजीत सिंह कहते हैं कि आधुनिकतावादी आंदोलन लाहौर और दिल्ली के शहरों में शुरू हुआ । इंतिजार हुसैन अनवर सज्जाद, सुरेंद्र प्रकाश,,बलराज मैनरा आदि इस काल के प्रमुख लेखक थे । बाद के लेखकों के रूप में लेखक ने ईस्मत चुगताई, धर्मपाल वफा,हीरानंद सोज़, मीर तकी मीर, ग़ालिब, मंटो आदि के योगदान का विशेष रूप से वर्णन किया है। 1950 से 1970 के काल की कुछ महत्वपूर्ण पत्रिकाओं जैसे—दिल- गदज, मखजान,अदब-ए-लतीफ, निगार, शायर, अदबी- दुनिया,साकी ,नीरंग-ए-ख्याल आदि के योगदान को भी लेखक ने महत्वपूर्ण माना है। आधुनिक काल में उर्दू लघुकथा , ईस्मत चुगताई की अफसाना निगारी, भारत में उर्दू पत्रकारिता का इतिहास और वर्तमान, स्वतंत्रता आंदोलन और उर्दू साहित्य,, उर्दू कायदा और उर्दू-अध्ययन में महिलाओं की भूमिका, गज़ल क्या है, गालिब का उर्दू दीवान, मातृभाषाओं का अस्तित्व और संवर्धन, उर्दू भाषा के विकास और दक्कन का इतिहास, उर्दू में लोकगीतों का महत्त्व,धर्मपाल वफा-एक अफसाना निगार, हीरानंद सोच का उर्दू साहित्य में योगदान , उर्दू साहित्य की पत्रिकाएँ, मीर तकी मीर की गज़ल का जायजा, सआदत हसन मंटो और आज का युग, उर्दू अदब मैं गाँधी जी का योगदान आदि विषयों पर इस पुस्तक में विस्तार से चर्चा की गई है। इन लेखों का महत्व इस इस बात में है कि यह पुस्तक पाठक को हिन्दोस्तान के इतिहास और संस्कृति से जोड़ती है तथा विविधता में एकता को स्थापित करती है। यह सिद्ध करती है कि हिंदू- मुस्लिम भारत की दो आंखे हैं जिन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता ,यही बात महात्मा गाँधी बार बार कहा करते थे।
इन लेखों को पढ़कर पता चला है कि ये लेख निबंध शैली में लिखे गए हैं लेकिन इनकी भाषा हिंदी लेखन जैसी है और शैली पुस्तकीय या सहायक पुस्तिका जैसी है जो इन निबन्धों की सीमा भी है। इसका लेखन-प्रवाह, हिन्दी लेखन शैली जैसा न होकर हिन्दी-उर्दू शब्दों का सुमेल हिन्दुस्तानी भाषा-शैली होता तो लेखन अधिक रोचक और पठनीय होता। फिर भी उर्दू भाषा और उर्दू साहित्य में रुचि रखने वाले छात्र-छात्राओं और भाषा प्रेमियों के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक साबित हो सकती है । इस लिए इस पुस्तक का स्वागत किया जाना चाहिए।
पुस्तक के लेखक मनजीत सिंह को बहुत- बहुत बधाई
समीक्षा- जयपाल [94666-10508]
पुस्तक—-रम्ज-ए-उर्दू [लेख-संग्रह]
लेखक—–मनजीत सिंह
[9671504409]
कीमत-Rs.199/-[पेपर बैक/पृष्ठ-136]
प्रकाशक— वैदिक प्रकाशन,हरिद्वार(उत्तराखंड)
मोबाइल नंबर -70074 70800

