‘जुक्ति तक्को आर गप्पो’ एक जटिल दार्शनिक आख्यान

ऋत्विक घटक की फिल्म पर एक टिप्पणी

‘जुक्ति तक्को आर गप्पो’ एक जटिल दार्शनिक आख्यान

डॉ उर्वशी

 

ऋत्विक घटक की ‘जुक्ति तक्को आर गप्पो’ केवल एक फिल्म नहीं, एक विखंडित आत्मा का दृश्य-दर्शन है। यह उनके सिनेमा की चरम परिणति है—जहाँ कला, जीवन और आत्मस्वीकार एक ही ज्वाला में तपते दिखाई देते हैं। यह कृति आत्मकथात्मक है, परंतु सीमित अर्थों में नहीं; यह उस समूचे ऐतिहासिक क्षण की आत्मकथा है जिसमें बंगाल की राजनीतिक उथल-पुथल, सांस्कृतिक विघटन और नैतिक अवसाद एक साथ ध्वनित होते हैं। फिल्म मानो एक विस्फोटित सभ्यता के मलबे में खड़ा मनुष्य है, जो अपने ही अस्तित्व के बिखरे हुए टुकड़ों को पहचानने की कोशिश कर रहा है।

फिल्म का केंद्रीय पात्र नीलकंठ बागची—एक पराजित, शराब में डूबा, मोहभंग बुद्धिजीवी—दरअसल घटक का ही प्रतिरूप है। यह चरित्र अभिनय नहीं, आत्मप्रकाश है। “नीलकंठ” नाम अपने भीतर ही रूपक का विराट आकाश समेटे है—वह शिव की तरह विषपायी है। उसने समय का जहर पिया है: असफल सपनों का, टूटी वैवाहिकता का, बिखरते समाज का। उसका घर उजड़ चुका है। पत्नी दुर्गा उसे छोड़ गई है—साथ में किताबें और ग्रामोफोन रिकॉर्ड भी ले गई, ताकि पुत्र सत्या एक बेहतर बौद्धिक विरासत में बड़ा हो सके। पीछे रह जाता है नीलकंठ—और उसके पास बचा एक पंखा, जिसे वह शराब के बदले बेच देता है। यह दृश्य वस्तु का नहीं, मूल्य का पतन है; यह बुद्धिजीवी की पराजय का सबसे मर्मांतक प्रतीक बन जाता है।

फिल्म दरअसल रूपकों की बहुस्तरीय संरचना है। नीलकंठ स्वयं टूटे हुए आधुनिक बुद्धिजीवी का प्रतीक है; दुर्गा केवल पत्नी नहीं, शक्ति का वह आद्यरूप है जो जीवन को बचाने के लिए पीछे नहीं देखती। सत्या भविष्य है—जिसके लिए अतीत को त्यागा गया।

नचिकेता, मृत्यु से प्रश्न करने वाली जिज्ञासा है; जगन्नाथ भट्टाचार्य वह शास्त्रीय परंपरा है जो ग्रंथों में जीवित है, पर यथार्थ से विस्थापित। पंचानन उस्ताद लोकधारा की वह धड़कन है जो पुस्तकों में नहीं, स्वर और देह में बसती है। नक्सली युवक विद्रोह की ज्वाला हैं—तीव्र, पर दिशाहीन। घटक इन सबको किसी राजनीतिक पक्षधरता से नहीं, एक साक्षी की तरह देखते हैं। उनका आग्रह विचारधारा नहीं, अनुभव है; निर्णय नहीं, व्यथा है।

यह फिल्म जितनी वैचारिक है, उतनी ही आत्मस्वीकारी भी। घटक यहाँ किसी निर्देशक की तरह नहीं, एक टूटे हुए मनुष्य की तरह उपस्थित हैं। उनका मोहभंग निजी भी है, ऐतिहासिक भी। शराब की गिरफ्त में डूबा यह कलाकार फिर भी अपनी सभ्यता के लिए तड़पता है—जैसे कोई घायल व्यक्ति अपनी मिट्टी को छूकर जीने का कारण खोजता हो। दुर्गा का चरित्र इसी द्वंद्व का आध्यात्मिक विस्तार है—वह स्त्री है, माँ है, और साथ ही उस पौराणिक ऊर्जा का रूप है जो विनाश के बीच सृजन की राह चुनती है।

फिल्म की दृश्यभाषा अद्भुत है। एक फ्रेम मिथकीय प्रतीत होता है, दूसरे ही पल वह सड़ती हुई वास्तविकता में ढह जाता है। लोकगीत, संस्कृत मंत्र, टूटी हँसी, तीखे क्लोज़अप—सब मिलकर एक ऐसी सिनेमाई कविता रचते हैं जिसमें सौंदर्य और क्षय साथ-साथ चलते हैं। नीलकंठ की हँसी विशेष रूप से याद रह जाती है—वह हँसी है भी और विलाप भी; आत्मव्यंग्य भी और आत्मदाह भी।

अंतिम दृश्य—नीलकंठ का गोली खाकर गिरना—व्यक्तिगत अंत का दृश्य होते हुए भी सामूहिक प्रश्न बन जाता है। मदन बुनकर का रूपक कहता है: साधन न हों, तब भी करघा चलाना होगा। जीवन और सृजन की जिद ही मनुष्य की अंतिम शरण है। यही फिल्म का मौन उद्घोष है—पराजय अंतिम सत्य नहीं, जिजीविषा है।
‘जुक्ति तक्को आर गप्पो’ घटक की विदाई फिल्म अवश्य है, पर यह शोकगीत नहीं, एक जटिल दार्शनिक आख्यान है। इसमें समय का नैतिक पतन है, राजनीति की दिशाहीनता है, संस्कृति का विघटन है—और इन सबके बीच एक अकेले मनुष्य की छटपटाहट है। यह फिल्म हमें असुविधाजनक प्रश्नों से टकराती है। यह हमें विवश करती है कि हम अपने भीतर के टूटे हुए नीलकंठ को पहचानें—उस विष को भी, और उस बची हुई जीवन-जिद को भी।

इसीलिए यह फिल्म देखना केवल सिनेमा देखना नहीं, अपने समय के अंत:करण में झाँकना है। इसे एक बार नहीं, बार-बार देखा जाना चाहिए—हर बार यह नई चोट देती है, और हर बार मनुष्य होने का अर्थ फिर से पूछती है। डॉ उर्वशी के फेसबुक वॉल से साभार

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