पुस्तक समीक्षा
हरियाणवी लोक जीवन के पारखी शायर कर्म चन्द केसर
जयपाल
“गुल्लर के फूल” हरियाणवी बोली के नामी शायर कर्म चन्द केसर का हरियाणवी गज़ल संग्रह है जो इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है l इस संग्रह में उनकी बहुत ही चर्चित और उम्दा गज़लें हैं।
ग़ज़ल मूल रूप से उर्दू की विधा है लेकिन इसकी लोकप्रियता के कारण यह भारत की क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में भी लिखी जाने लगी है और इसे खूब स्वीकार्यता मिलने लगी है। हालांकि किसी भी भाषा और बोली की ग़ज़ल अभी उर्दू ग़ज़ल की बराबरी करने की स्थिति में नहीं है। गज़ल में भले ही मतला, मक्ता, रदीफ़, काफिया, बहर आदि के साथ-साथ शब्दों के चयन में नजाकत और नफ़ासत भी बहुत महत्वपूर्ण है। इन सामान्य नियमों के साथ-साथ भावों-अनुभावों की गहराई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है l गजल का हर शेर अपने आप में स्वतंत्र होता है जबकि कविता में ऐसा नहीं होता।

शायर – कर्म चंद केसर
कर्म चन्द केसर लोक जीवन के पारखी शायर हैं उनकी शायरी में जीवन के सभी पक्षों के दर्शन होते हैं। हरियाणवी लोक जीवन के प्रति उनके मन में आदर का भाव जरूर है लेकिन वे उसके नकारात्मक पक्ष को महिमामंडित भी नहीं करते । उनके पास एक रचनात्मक आलोचना दृष्टि है जो उनकी गज़लों में स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है।
लोक जीवन में चली आ रही विकृत परंपराओं का वे समर्थन नहीं करते बल्कि उन पर कटाक्ष करते हैं और उनमें समय के अनुकूल सुधार करने का आह्वान करते हैं । वे कहीं न कहीं जड़ता को तोड़ना चाहते हैं। मज़दूर-किसान और जीवन की सामान्य सुख-सुविधाओं से वंचित लोगों के प्रति उनकी पक्षधरता इन गज़लों में स्पष्ट दिखाई देती है ।
वे बेरोजगारी, महंगाई, अनपढ़ता ,गरीबी, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, भ्रुणहत्या, लैंगिक असमानता, आनर-किलिंग, शिक्षा, कुपोषण, आदि सम-सामयिक/सामाजिक विषयों पर भी बिना लागलपेट के गज़लें कहते हैं । ‘गुल्लर के फूल’ पुस्तक में उनकी गज़लों को पढ़कर पता चलता है कि उन्हें आम जीवन के व्यवहार में आने वाले आंचलिक शब्दों का न केवल अच्छी तरह ज्ञान है बल्कि वे स्वयं भी उनमें रचे बसे हैं। हरियाणवी शब्दों का शायरी में इस्तेमाल करते समय वे इस बात के लिए चौकन्ने रहते हैं कि गज़ल की नफ़ासत-नजाकत को कोई चोट न पहुंचे अर्थात ग़ज़ल की नक्काशी करते समय वे अतिरिक्त सतर्कता बरतते हैं।
कर्म चन्द केसर की दृष्टि लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष है । वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं लेकिन किसी भी धर्म की सांप्रदायिकता के खिलाफ़ हैं। वे आम आदमी के पक्षधर शायर है–
घणिये जादा बरकत सै इमान की गठड़ी मैं,
इस गठड़ी नैं सिर पर ठाणा कितना मुसकल सै।
गरमी – सरदी, आंधी – मींह् नैं ओट् रह़्या तन पै ,
किरसक जितना कष्ट उठाणा कितना मुसकल सै।
नफ़रत की काँद्धां नै केसर इक दिन गिरणा सै,
उस दिन तक यूह् मन समझाणा कितना मुसकल सै।
ग़ज़ल के उपरोक्त तीनों शेरों में ईमानदार व्यक्ति और किसान के जीवन की दुश्वारियों को लेकर वर्तमान व्यवस्था पर तीखा प्रहार है। अंतिम शेर में आज के दौर की साम्प्रदायिकता पर निशाना साधते हुए नफरत की दीवारों को शायर गिराना चाहता है l
छोटी बहर के तीन शेर देखिए—
अन्न दाता की जून बुरी सै,
हमनै धक्के खांदा देख्या ।
बच्चयांँ के सुख खात्तर बाब्बू,
बड़े – बड़े दुक्ख ठान्दा देख्या।
उपरोक्त शेरों में किसान-मज़दूर के त्रासद पूर्ण जीवन को उसी की बोली-भाषा में सशक्त अभिव्यक्ति मिली है।
ना बोले इसे बोल बाब्बा।
जो दें जिगर नै छोल बाब्बा।
किसकी लाग्गी नजर देश कै,
बिगड़ गया सै म्हौल बाब्बा।
इस ग़ज़ल संग्रह में कर्म चन्द केसर हरियाणा के साथ-साथ देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का भी सामना करते हैं। वे हरियाणवी लोक जीवन की समस्याओं को पूरे देश के माहौल से जोड़ कर देखते हैं।
शायर अपनी गज़लों में सादा-जीवन,उच्च-विचार जैसे लोक मूल्यों को मानवीय जीवन में जरूरी समझता है। इसलिए वह अपने निश्छल बचपन को याद करता है। गाँव-देहात की खातिरदारी और ईमानदारी को घटते देखकर उसे दुःख होता है। इसी तरह वह निश्छल-सच्चे प्रेम को सम्मान की दृष्टि से देखता है लेकिन भ्रूण हत्या और आनर-किलिंग पर अपने शेरों में तंज कसता है।
कर्म चन्द केसर जनवादी-प्रगतिशील मूल्यों में विश्वास करने वाले शायर हैं। जिस प्रकार हास्य-विनोद हरियाणवी जीवन की पहचान है, उसी प्रकार हास्य-विनोद पूर्ण शैली में ही गहरी बात कहना कर्म चन्द केसर की ग़ज़लों की पहचान है। गज़ल के सभी नियमों-उपनियमों का पालन करते हुए शायर कर्म चन्द केसर बेहतरीन गज़लों को कहने में कामयाब रहे हैं।
वरिष्ठ शायर कर्मचंद केसर को इस गज़ल संग्रह के प्रकाशित होने पर बहुत-बहुत मुबारकबाद !!
पुस्तक ‘गुल्लर के फूल’ गज़ल संग्रह
शायर कर्म चंद केसर 93543-16065
कीमत–Rs.299/- पेपर बैक
प्रकाशक यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र ।
समीक्षक- जयपाल

