राजेश ‘भारती’ की कविताएं

राजेश ‘भारती’ की कविताएं

एक

 

बुरे दिनों में लोग पूछते हैं—

“कैसे हो?”

 

मैं मुस्कराकर कह देता हूँ—

“ठीक हूँ।”

 

वे निश्चिंत हो जाते हैं,

जैसे कोई बोझ उतर गया हो।

और मैं समझता हूँ—

यह झूठ

सच से कहीं ज़्यादा आरामदेह है,

मेरे लिए भी

और उनके लिए भी।

 

 

दो

 

 

राजा बैठा है

सिंहासन पर,

प्रजा खड़ी है नीचे।

 

राजा सोचता है—

“यह प्रजा मेरी है।”

 

प्रजा सोचती है—

“यह राजा हमारा है।”

 

लेकिन सच?

दोनों ही भ्रम में हैं।

 

 

तीन

 

हम वृक्ष काटते हैं

और फिर

उससे बनाते हैं काग़ज़

 

और फिर

उसी कागज़ पर

लिखी जाती हैं

वृक्षों पर कविताएँ

 

यह कैसी विडंबना है!

चार

 

गरीब आदमी

 

 

गरीब आदमी का नाम

रजिस्टर में लिखा होता है

क्रं. सं. 120

और सरकारी फाइल में

वह ‘लाभार्थी’ कहलाता है

 

वोट डालते समय

नेता उसे भाई कहते हैं

फिर चुनाव जीतकर

भूल जाते हैं

कि भाई का नाम क्या था।