संत रविदास और उनकी साखियाँ
-मनजीत सिंह
भारतीय भक्ति साहित्य की परंपरा में संत रविदास की साखियाँ एक ऐसी रौशन मशाल हैं, जिनकी रोशनी केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज, इंसानियत और नैतिक मूल्यों के अँधेरों को भी उजागर करती है। उनकी साखियाँ जीवन की हकीकत, समाज की बेइंसाफी और इंसान के भीतर छिपी हुई ताक़त को पहचानने का रास्ता दिखाती हैं। यही कारण है कि संत रविदास केवल एक संत या कवि नहीं, बल्कि एक ऐसे राहनुमा हैं, जिनकी वाणी आज भी उतनी ही मौज़ूँ और असरदार है, जितनी अपने समय में थी।
साखी का अर्थ है—अनुभव से प्राप्त सत्य। संत रविदास की साखियाँ किसी शास्त्रीय कल्पना की उपज नहीं, बल्कि जीवन के कड़वे-मीठे तजुर्बों से निकली हुई सच्चाइयाँ हैं। इनमें न दिखावा है, न शब्दों की सजावट; बल्कि सादगी, गहराई और मानवीय संवेदना की खुशबू है। उनकी वाणी समाज के उस वर्ग की आवाज़ है, जिसे सदियों तक हाशिए पर रखा गया, लेकिन जिसने कभी अपनी इंसानियत नहीं खोई।
भक्ति साहित्य में साखी एक ऐसा काव्य-रूप है, जिसमें कम शब्दों में जीवन का पूरा दर्शन समा जाता है। संत रविदास की साखियाँ इसी परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। वे अनुभव को प्रमाण मानते हैं और उसी अनुभव को समाज के सामने बे-खौफ़ होकर रखते हैं।
उनकी साखियों का स्वर उपदेशात्मक होते हुए भी कठोर नहीं है। वे न डाँटते हैं, न डराते हैं, बल्कि इंसान को सोचने, समझने और खुद को पहचानने की दावत देते हैं। उनकी वाणी में आत्मविश्वास है, लेकिन अहंकार नहीं; विरोध है, लेकिन नफ़रत नहीं; और भक्ति है, लेकिन पाखंड नहीं।
जाति-व्यवस्था के विरुद्ध साखियाँ
संत रविदास की साखियों का सबसे प्रखर और निर्भीक स्वर जाति-व्यवस्था के विरोध में सुनाई देता है। वे जन्म के आधार पर ऊँच-नीच को समाज की सबसे बड़ी बेइंसाफी मानते हैं।
“जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रविदास मनुष ना जुड़ सके, जब तक जाति न जात।।”
यह साखी केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का एलान है। रविदास यहाँ कहते हैं कि साधु या मनुष्य का मूल्य उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, आचरण और कर्म से तय होना चाहिए। जिस प्रकार तलवार की क़ीमत उसके म्यान से नहीं, बल्कि उसकी धार से होती है, उसी प्रकार इंसान की पहचान उसके गुणों से होनी चाहिए।
इस साखी में सामाजिक इंसाफ़, मानवीय इज़्ज़त और बराबरी का संदेश स्पष्ट रूप से झलकता है। यह उस मानसिकता पर करारा प्रहार है, जो इंसान को जन्म के आधार पर छोटा-बड़ा ठहराती है।
मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति
संत रविदास की साखियों में सच्ची भक्ति का अर्थ बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि मन की शुद्धता है। वे कहते हैं कि अगर दिल साफ़ है, तो ईश्वर हर जगह मौजूद है।
“मन चंगा तो कठौती में गंगा।”
यह छोटी-सी साखी अपने भीतर गहरे दर्शन को समेटे हुए है। ‘कठौती’ एक साधारण पात्र है, लेकिन जब मन पवित्र होता है, तो वही कठौती गंगा के समान पवित्र बन जाती है।
इसका आशय यह है कि ईश्वर किसी विशेष स्थान, तीर्थ या पूजा-विधि में महदूद नहीं है। वह इंसान के भीतर बसता है।
यह साखी धार्मिक पाखंड, दिखावटी आस्था और खोखले कर्मकांड की साफ़ नफ़ी करती है और सच्ची भक्ति को आत्मिक शुद्धता से जोड़ती है।
ईश्वर की सर्वव्यापकता का विचार
संत रविदास की साखियों में ईश्वर को सर्वत्र व्याप्त माना गया है। उनके लिए बाहर और भीतर का भेद केवल भ्रम है।
“घट-घट में हरि बसे, कहत रविदास।
बाहर भीतर एक है, जानो निज दास॥”
इस साखी में संत रविदास स्पष्ट कहते हैं कि ईश्वर हर शरीर में, हर आत्मा में मौजूद है। जो बाहर ईश्वर को खोजता है, वह असल में स्वयं से दूर चला जाता है।
यह विचार इंसान को आत्मचिंतन, विवेक और आत्मसम्मान की ओर ले जाता है।
यह साखी इंसान और ईश्वर के रिश्ते को डर या स्वार्थ से मुक्त करके मुहब्बत, रहम और आत्मीयता से जोड़ती है।
संत रविदास की साखियाँ केवल समाज की आलोचना तक सीमित नहीं हैं। वे एक ऐसे समाज का ख़्वाब भी पेश करती हैं, जहाँ कोई भूखा न रहे, कोई छोटा-बड़ा न हो।
“ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न।
छोट-बड़ो सब सम बसे, रविदास रहे प्रसन्न॥”
यह साखी संत रविदास की सामाजिक दृष्टि का घोषणापत्र है। यहाँ ‘राज’ का अर्थ केवल सत्ता नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था है, जिसमें हर इंसान को जीने का बराबर हक़ मिले।
यह साखी सामाजिक रहम, मानवीय इत्तेहाद और इंसानियत पर आधारित शासन-व्यवस्था की कल्पना करती है।
संत रविदास की वाणी में बेगमपुरा का विचार उनके सामाजिक दर्शन का शिखर है। यह एक ऐसा नगर है, जहाँ कोई ग़म नहीं, कोई डर नहीं और कोई ज़ुल्म नहीं।
“बेगमपुरा शहर को नाउँ,
दुख अन्दोह नहिं तिहिं ठाँउ।”
बेगमपुरा केवल एक काल्पनिक स्थान नहीं, बल्कि इंसानियत, बराबरी और सामाजिक इंसाफ़ का प्रतीक है। यह साखी बताती है कि समाज ऐसा भी हो सकता है, जहाँ मनुष्य मनुष्य का दुश्मन नहीं, बल्कि साथी हो।
कर्म, श्रम और आत्मसम्मान
संत रविदास स्वयं श्रम से जुड़ा जीवन जीते थे। इसलिए उनकी साखियों में कर्म और मेहनत की इज़्ज़त विशेष रूप से दिखाई देती है। वे श्रम को ही सच्ची इबादत मानते हैं।
उनकी वाणी यह सिखाती है कि इंसान की पहचान उसके काम से होती है, न कि उसके जन्म से। यह विचार श्रमिक वर्ग को आत्मसम्मान और हौसला प्रदान करता है।
संत रविदास की साखियों की भाषा सादी, सहज और लोकधर्मी है। उसमें हक़, रहम, करम, इंसाफ़, दुनिया, नसीब जैसे उर्दू-फ़ारसी मूल के शब्द भावों को और भी दिलनशीं बना देते हैं।
उनकी भाषा की सबसे बड़ी ताक़त उसकी सच्चाई है। यही सच्चाई उनकी साखियों को कालजयी बनाती है।
आज के दौर में, जब समाज फिर से भेदभाव, असहिष्णुता और वैमनस्य की चुनौतियों से जूझ रहा है, संत रविदास की साखियाँ और भी ज़्यादा मौज़ूँ हो जाती हैं। वे हमें इंसानियत, बराबरी और आत्मसम्मान का रास्ता दिखाती हैं।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि संत रविदास की साखियाँ भारतीय भक्ति साहित्य की एक अमूल्य धरोहर हैं। वे भक्ति को इंसानियत से जोड़ती हैं और समाज को न्याय, समानता और करुणा का संदेश देती हैं।
उनकी साखियाँ समय की सीमाओं से ऊपर उठकर आज भी हमें यह सिखाती हैं कि सच्चा धर्म मनुष्य से प्रेम करना है और सच्ची भक्ति मन की शुद्धता में निहित है।
संत रविदास की यह वाणी आज भी समाज के लिए राहनुमा, इंसान के लिए सहारा और भविष्य के लिए उम्मीद बनी हुई है।

लेखक – मनजीत सिंह कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में उर्दू के सहायक प्रोफेसर है।
