महादलित परिवार को श्मशान तक जाने का नहीं मिला रास्ता, चौराहे पर किया अंतिम संस्कार

बिहार के वैशाली में मानवता शर्मसार

महादलित परिवार को श्मशान तक जाने का नहीं मिला रास्ता, चौराहे पर किया अंतिम संस्कार

बिहार के वैशाली जिले में 91 वर्षीय झपकी देवी का निधन… और उनके महादलित परिवार को श्मशान तक जाने का रास्ता तक नहीं मिला। मजबूरी में परिजनों ने सड़क के चौराहे पर ही अंतिम संस्कार कर दिया। यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि हमारे समाज की सड़ी-गली जातिवादी सोच की एक और क्रूर मिसाल है। मौत के बाद भी इंसानियत कहाँ है? क्या दलित होना इतना बड़ा अपराध है कि मृतक को सम्मानजनक विदाई तक न मिले?

यह घटना अकेली नहीं है। याद कीजिए, 2020 में उत्तर प्रदेश के आगरा में एक दलित महिला का शव अंतिम संस्कार की चिता से ही उतार लिया गया, क्योंकि ऊपरी जाति के लोगों ने कम्यूनल लैंड पर मना कर दिया।परिवार को 4 किलोमीटर दूर जाकर संस्कार करना पड़ा। या फिर तमिलनाडु में 80 वर्षीय महिला को दफनाने से रोका गया, सिर्फ इसलिए कि उनके पोते ने दलित से शादी की थी ।2025 में एक दलित व्यक्ति को मुख्य क्रेमेशन ग्राउंड से अलग, गंदगी भरे इलाके में जलाने को मजबूर किया गया।

कोयंबटूर में दलित परिवारों को दशकों से ब्यूरियल ग्राउंड से वंचित रखा गया, मजबूरी में पानी की धारा के पास छोटी सी जगह पर दफनाना पड़ता है।संविधान ने भेदभाव को गैरकानूनी घोषित कर दिया, लेकिन हमारे समाज की जड़ों में जातिवाद की जहर अभी भी बह रहा है। मौत में भी विभाजन? क्या हम इतने गिर चुके हैं कि इंसान की लाश पर भी अपनी “श्रेष्ठता” थोपें? यह सड़ांध कब खत्म होगी? दलितों की पीड़ा को आवाज दो, बदलाव की मांग करो। क्योंकि अगर मौत के बाद भी न्याय नहीं, तो जीते जी क्या उम्मीद?

 

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