महात्मा गांधी पुण्यतिथि – एक स्मरण, एक चेतावनी,एक वैचारिक प्रतिरोध
कृष्ण कायत
30 जनवरी भारतीय इतिहास का वह दिन है जब एक व्यक्ति की हत्या हुई, लेकिन उससे भी अधिक गंभीर बात यह थी कि उस दिन अहिंसा, सत्य और विवेक को चुप कराने की कोशिश की गई। महात्मा गांधी को गोली मारने वाला भले ही एक नाथूराम गोडसे था, परंतु उसकी सोच अकेली नहीं थी। वह एक ऐसी विचारधारा का प्रतिनिधि था जो बहुलता, संवाद और करुणा से भयभीत रहती है। आज, गांधी की पुण्यतिथि पर खड़े होकर यह कहना आवश्यक हो गया है कि गोडसे इतिहास में केवल एक नहीं रहा—आज की पूंजीवादी-फासीवादी व्यवस्था ने अनेक गोडसे तैयार कर दिए हैं, जो अलग-अलग रूपों में गांधीवादी विचारधारा को कुचलने में लगे हैं।
कक्षा 12 की अंग्रेज़ी पाठ्यपुस्तक का अध्याय “Indigo” हमें गांधी जी के जीवन का वह महत्वपूर्ण अध्याय याद दिलाता है, जहाँ उन्होंने चंपारण के नील किसानों के पक्ष में खड़े होकर अन्याय के विरुद्ध सत्याग्रह का प्रयोग किया। चंपारण में अंग्रेज़ी शासन के संरक्षण में चल रही ‘तीनकठिया प्रथा’ के तहत किसानों को अपनी ज़मीन का एक हिस्सा जबरन नील की खेती के लिए देना पड़ता था। इससे न केवल उनकी खाद्य सुरक्षा छिन रही थी, बल्कि वे कर्ज़, भूख और अपमान के चक्र में फँसते जा रहे थे। किसान अपनी आवाज़ खो चुके थे—और सत्ता को यही चाहिए था।
ऐसे समय में राजकुमार शुक्ला के आग्रह पर गांधी चंपारण पहुँचे। उन्होंने न तो हथियार उठाए, न ही भीड़ को उकसाया। उन्होंने किसानों की बातें सुनीं, उनके बीच रहे, प्रशासन के आदेशों की अवहेलना करते हुए अदालत में खड़े हुए और सत्याग्रह की वह मिसाल पेश की जिसने सत्ता की नैतिक नींव हिला दी। किसानों की माँग थी कि उनसे वसूले गए लगान का पचास प्रतिशत वापस किया जाए। अंततः समझौता पच्चीस प्रतिशत पर हुआ। देखने में यह आधी जीत लग सकती है, लेकिन गांधी जी के लिए यह धन का प्रश्न नहीं था। जैसा कि लुई फिशर लिखते हैं, गांधीजी जानते थे कि असली विजय यह थी कि किसानों के साथ हुआ अन्याय आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया और भय का वातावरण टूटा। भूमि पतियों को झुकना पड़ा और किसानों ने साहस के साथ-साथ यह भी सीखा कि अन्याय व शोषण के खिलाफ लड़कर जीता जा सकता है। यह चंपारण सत्याग्रह केवल एक आर्थिक संघर्ष नहीं था; यह मानवीय गरिमा की पुनर्प्रतिष्ठा थी।
आज, एक सदी बाद, जब हम पीछे मुड़कर चंपारण को देखते हैं, तो वह हमें वर्तमान का आईना दिखाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब अत्याचार औपनिवेशिक सत्ता करती थी और आज वही काम घरेलू पूंजीवादी-फासीवादी गठजोड़ कर रहा है। आज नील की खेती की जगह नफ़रत की खेती करवाई जा रही है; आज लगान की जगह चुप्पी वसूली जा रही है; और जो बोलते हैं, सवाल उठाते हैं, लिखते हैं—उन्हें राष्ट्रविरोधी, शहरी नक्सल या देशद्रोही ठहराया जाता है।
पिछले वर्षों में बुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों पर हुए हमले इसी दमनकारी प्रवृत्ति के संकेत हैं। गौरी लंकेश, एम.एम. कलबुर्गी, नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे जैसे नाम केवल व्यक्ति नहीं हैं; वे उस विवेकशील भारत के प्रतीक हैं जो प्रश्न करता है, अंधविश्वास और कट्टरता को चुनौती देता है। इन आवाज़ों को खामोश करने की कोशिशें यह बताती हैं कि आज की सत्ता आलोचना से कितनी असहज है। जहाँ तर्क कमजोर पड़ता है, वहाँ डर पैदा किया जाता है; और जहाँ डर काम न करे, वहाँ दमन।
गांधी को मारने वाला एक गोडसे था, लेकिन आज संस्थागत रूप से गोडसे पैदा किए जा रहे हैं—भीड़ में, सोशल मीडिया में, नफ़रत के अभियानों में और सत्ता के मौन समर्थन में। यह वही फासीवादी प्रवृत्ति है जो असहमति को अपराध और करुणा को कमजोरी मानती है। पूंजीवादी हितों के साथ गठजोड़ कर यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित कर देना चाहती है, जबकि गांधी का लोकतंत्र मनुष्य की गरिमा से शुरू होता था।
ऐसे समय में गांधीवादी विचारधारा का महत्व और बढ़ जाता है। अहिंसा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि वह कायरता नहीं बल्कि नैतिक साहस की माँग करती है। सत्याग्रह आज भी ज़रूरी है, क्योंकि वह सत्ता के झूठ को उजागर करने का शांत लेकिन प्रभावी तरीका है। गांधी हमें सिखाते हैं कि साधन और साध्य अलग नहीं होते—यदि रास्ता हिंसक और अमानवीय है, तो मंज़िल भी अमानवीय ही होगी।
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने का अर्थ है—उनके विचारों को आज के संदर्भ में जीना। नफ़रत के शोर में विवेक की आवाज़ बनना, डर के माहौल में सच बोलना और विभाजन की राजनीति के बीच मनुष्यता को चुनना। गांधी आज किसी मूर्ति में नहीं, बल्कि हर उस नागरिक में जीवित हैं जो अन्याय के सामने झुकने से इन्कार करता है।
गांधी को गोली मारकर चुप कराया जा सकता था, लेकिन गांधीवाद को मारना इतना आसान नहीं—बशर्ते हम उसे केवल इतिहास नहीं, वर्तमान की ज़रूरत मानें। यही उनकी पुण्यतिथि की सच्ची श्रद्धांजलि है।
