कमज़ोरों की शक्ति की शुरुआत ईमानदारी से होती है

कमज़ोरों की शक्ति की शुरुआत ईमानदारी से होती है

-कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे नेताओं की पारंपरिक पहचान के साँचे में पूरी तरह फिट नहीं बैठते हैं । वे अपेक्षाकृत कहीं ज्यादा सीधी और तकनीकी भाषा में अपनी बात रखते हैं । उन्होंने दो दिन पहले डावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम पर जो भाषण दिया उसका प्रत्येक शब्द सुनने लायक़ है । जो व्यक्ति पारंपरिक राजनीतिक ढाँचे में सोचने का अभ्यस्त नहीं है, उसकी आज की विश्व-परिस्थिति पर राय इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि उससे यह समझ में आती है कि अभी दुनिया में जो भी घटित हो रहा है, उसका एक सामान्य तौर पर समझदार व्यक्ति पर क्या असर पड़ रहा है । यह भावी विश्व जनमत के बड़े संकेत का वाहक होता है ।

कार्नी ने भाषण के शुरू में ही आज के समय को एक निर्णायक क्षण कहा जब कनाडा और दुनिया दोनों एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। हम यहां उस भाषण का हिंदी अनुवाद साझा कर रहे हैं ।

उन्होंने अपनी बात शुरू की विश्व-व्यवस्था में विच्छेद (rupture) से । एक ऐसा विच्छेद “जो किसी सुखद कल्पना के अंत और एक कठोर वास्तविकता की शुरुआत को दिखाता है; एक ऐसी दुनिया की शुरुआत को जिसमें भू-राजनीति, यानी बड़ी शक्तियों की राजनीति, किसी सीमा, किसी संयम, किसी बंधन को नहीं मानती है ।”

फिर भी उन्होंने कहा कि “इन हालात में भी हम, कनाडा जैसे बीच वाले देश, (intermediate powers) निरुपाय नहीं हैं। हमारे पास भी यह क्षमता है कि वे एक नई व्यवस्था का निर्माण करें, जो मानवाधिकारों का सम्मान, सतत विकास, एकजुटता, संप्रभुता, और विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता जैसे हमारे मूल्यों के अनुरूप हो । “

उन्होंने बहुत मार्के की बात कही कि “कमज़ोरों की शक्ति की शुरुआत ईमानदारी से होती है।”

वे आगे कहते हैं, “ऐसा लगता है कि हर दिन हमें यह याद दिलाया जा रहा है कि हम महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के युग में जी रहे हैं; कानून-आधारित व्यवस्था (rules-based order) फीकी पड़ रही है; ताक़तवर वही कर सकते हैं जो वे कर सकते हैं, और कमज़ोर का सहते जाना उसकी नियति है ।

उन्होंने याद दिलाया कि थ्यूसीडाइड्स (Thucydides) की इस उक्ति को अब जैसे किसी ध्रुव सत्य की तरह पेश किया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों का “प्राकृतिक ” नियम फिर से अपने को स्थापित कर रहा हो। सबको समझाया जा रहा है कि वे इससे समझौता कर लें, टकराव से बचें, मुसीबत से बचने के लिए झुक जाएँ, और यह उम्मीद करें कि आज्ञाकारिता से उन्हें सुरक्षा मिलेगी।

कार्नी ने कहा कि पर ऐसा नहीं होगा। इसका तो विकल्प क्या हैं? 1978 में चेक असंतुष्ट वाक्लाव हावेल (Václav Havel)। जो बाद में राष्ट्रपति बने, ने एक निबंध लिखा था: “The Power of the Powerless” (कमज़ोरों की शक्ति)। उसमें उन्होंने एक बहुत सरल प्रश्न पूछा था कि कम्युनिस्ट व्यवस्था अपने को टिकाए कैसे रखती है? और उनका उत्तर मिला एक सब्ज़ी बेचने वाले से।

हर सुबह यह दुकानदार अपनी दुकान की खिड़की में एक बोर्ड लगाता है: “दुनिया के मजदूरों, एक हो!”वह खुद इस पर विश्वास नहीं करता था, कोई भी नहीं करता, लेकिन वह फिर भी यह बोर्ड लगाता है, ताकि उस पर मुसीबत न आए। वह पालतू दिखे, ताकि वह “सबके साथ चल सके”। चूंकि हर गली में हर दुकानदार यही करता है, इसलिए यह व्यवस्था बनी रहती है। सिर्फ हिंसा से नहीं, बल्कि साधारण लोगों की उस भागीदारी से, जिसमें वे रोज़मर्रा के ऐसे काम करते हैं जिन्हें वे खुद झूठ मानते हैं।

हावेल ने इसे “झूठ के भीतर जीना” (living within a lie) कहा ।

इस व्यवस्था की शक्ति उसके “सत्य” में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि सब लोग ऐसे अभिनय करते हैं मानो वह सत्य हो। और उसकी कमज़ोरी भी यहीं से पैदा होती है। पर जब कोई एक व्यक्ति भी अभिनय करना बंद कर देता है, जब वह दुकानदार अपना बोर्ड हटा देता है, तो इस भ्रम में दरार पड़ने लगती है।

“मित्रों, अब समय आ गया है कि कंपनियाँ और देश अपनी खिड़कियों से ये बोर्ड उतार दें।

कई दशकों तक कनाडा जैसे देश उस व्यवस्था के भीतर फलते-फूलते रहे जिसे हम क़ानून -आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कहते थे। हमने उसके संस्थानों में भाग लिया, उसके सिद्धांतों की प्रशंसा की, और उसकी पूर्वानुमेयता (predictability) से लाभ उठाया। और इसी कारण हम उसके संरक्षण में कथित मूल्य-आधारित विदेश नीति भी अपना सके।

हम जानते थे कि नियम-आधारित व्यवस्था की कहानी आंशिक रूप से झूठी थी। हम जानते थे कि सबसे ताक़तवर देश जब चाहें अपने लिए अपवाद बना लेते हैं; कि व्यापार के नियम असमान रूप से लागू होते हैं। और हम यह भी जानते थे कि अंतरराष्ट्रीय कानून की कठोरता, प्रताड़ित और पीड़ित की पहचान के अनुसार, बदलती रहती है।

फिर भी यह कल्पना उपयोगी थी। और खास तौर पर अमेरिकी वर्चस्व ने कुछ सार्वजनिक हितों (public goods) की भी आपूर्ति की ।खुले समुद्री मार्ग, स्थिर वित्तीय प्रणाली, सामूहिक सुरक्षा, और विवाद-निपटारे की व्यवस्थाएँ मिली ।

इसलिए हमने भी खिड़की में बोर्ड लगा दिया। हमने इन अनुष्ठानों में भाग लिया, और वाणी तथा वास्तविकता के बीच की खाइयों को अक्सर उजागर करने से बचते रहे।

लेकिन अब यह सौदा काम नहीं करता। मैं साफ कहूँगा: हम किसी संक्रमण (transition) में नहीं हैं । हम विच्छेद (rupture) के बीच हैं।

पिछले दो दशकों में वित्त, स्वास्थ्य, ऊर्जा और भू-राजनीति की अनेक संकट-श्रृंखलाओं ने अत्यधिक वैश्विक एकीकरण (extreme global integration) के जोखिमों को उजागर किया है। लेकिन हाल के वर्षों में महाशक्तियों ने आर्थिक एकीकरण को हथियार बनाना शुरू कर दिया है — टैरिफ़ को दबाव के साधन की तरह, वित्तीय ढाँचों को बाध्यकारी शक्ति की तरह, और सप्लाई-चेन को ऐसी कमज़ोरी की तरह, जिसका दोहन किया जा सके।

आप “एकीकरण के पारस्परिक लाभ” के झूठ के भीतर नहीं जी सकते, जब वही एकीकरण आपकी अधीनता (subordination) का स्रोत बन जाए।

जिन बहुस्तरीय संस्थानों पर बीच की शक्तियाँ निर्भर रही हैं—WTO, UN, COP—सामूहिक समस्या-समाधान का यह पूरा निर्माण ही खतरे में है। और इसके परिणामस्वरूप अनेक देश यह निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि उन्हें ऊर्जा, भोजन, महत्वपूर्ण खनिजों, वित्त और सप्लाई-चेन में अधिक रणनीतिक स्वायत्तता विकसित करनी होगी।

यह न तो कोई भोला अनेकतावाद है, और न ही इन संस्थानों के प्रति आँख बंद करके भरोसा। यह ऐसी गठबंधनों (coalitions) का निर्माण है जो वास्तव में काम करें—मुद्दे-दर-मुद्दे, उन साझेदारों के साथ जिनके बीच इतना साझा आधार हो कि वे मिलकर कार्रवाई कर सकें।

कई मामलों में यह दुनिया के अधिकांश देशों का साझा प्रयत्न भी हो सकता है।

इसका अर्थ है व्यापार, निवेश और संस्कृति में संबंधों का एक सघन जाल बनाना जिस पर हम भविष्य की चुनौतियों और अवसरों के लिए भरोसा कर सकें।

उनका कहना था कि मध्य-शक्तियों को मिलकर काम करना होगा, क्योंकि अगर हम मेज़ पर नहीं हैं, तो हम खाने के मेन्यू में होंगे । तो मध्य-शक्तियों के लिए “सत्य में जीने” का अर्थ क्या है?

पहला—इसका अर्थ है वास्तविकता की पहचान करना । नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को ऐसे पुराने नाम से न पुकारते रहें मानो वह आज भी उसी तरह काम कर रही हो जैसा उसका प्रचार किया जाता था। उसे वही कहें जो वह है—महाशक्तियों की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता की व्यवस्था, जहाँ सबसे ताक़तवर देश अपने हित साधते हैं और आर्थिक एकीकरण को दबाव के लिए इस्तेमाल करते हैं।

दूसरा—इसका अर्थ है संगति के साथ आचरण करना, मित्रों और प्रतिद्वंद्वियों, दोनों पर समान मानदंड लागू करना। जब बीच की शक्तियाँ एक दिशा से आर्थिक धमकी की आलोचना करती हैं, पर दूसरी दिशा के बारे में चुप रहती हैं, तब हम खिड़की पर वही बोर्ड लगाए रखते हैं।

अब हम वह बोर्ड उतार रहे हैं। हम जानते हैं कि पुरानी व्यवस्था वापस नहीं आने वाली। हमें उसका शोक नहीं मनाना चाहिए। नॉस्टैल्जिया कोई रणनीति नहीं है। लेकिन हम यह मानते हैं कि इस विच्छेद से हम कुछ बड़ा, बेहतर, मजबूत और अधिक न्यायपूर्ण बना सकते हैं।

यही उन मध्य-शक्तियों का कार्य है, जिन्हें “किलेबंद दुनिया” से सबसे अधिक नुकसान होगा, और वास्तविक सहयोग से सबसे अधिक लाभ। ताक़तवरों के पास उनकी ताक़त है। लेकिन हमारे पास भी कुछ है—ढोंग बंद करने की क्षमता, वास्तविकता का नाम लेने की क्षमता, घर के भीतर अपनी शक्ति बनाने की क्षमता, और मिलकर कार्रवाई करने की क्षमता।

प्रस्तुति – अरुण माहेश्वरी

अरुण माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से साभार

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