पुस्तक समीक्षा
व्यवस्था के अमानवीय चेहरे को बेनकाब करती हैं ‘राजेश भारती’ की कविताएं
जयपाल
हरियाणा के कैथल जिले के गाँव काकौत में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे कवि ‘राजेश भारती’ कविता और किसानी दोनों के प्रति एक समर्पित युवा प्रतिभा हैं । छोटी-मोटी अनेक नौकरियों के अनुभव के बाद उनका मन खेती और कविता में रम गया है। घर-परिवार चलाने के लिए खेतीबाड़ी और समाज के लिए कविता शायद यही उनका जीवन दर्शन है। इस दौर की कविता में उनकी कविता एक अलग पहचान बनाने में कामयाब हुई है।
उनकी कविता खेती-किसानी,गांव-गरीबी, दलित समाज का दर्द, वर्तमान दौर की क्रूर राजनीति और संवेदनाविहीन सत्ता, क्रांति, युद्ध,हिंसा,सामंती मानसिकता,पितृसत्ता, साम्प्रदायिकता , हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद बंधुआ मजदूरी, शोषण,ईश्वर का अस्तित्व,बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे केंद्रीय सामाजिक मुद्दों को मानवीय दृष्टि से उठाती है और एक बेहतर समाज की कल्पना करती है।
अपनी पहली ही कविता में राजेश भारती वर्तमान राजनीति की क्रूरता पर तीखा प्रहार करते हैं’–
राजनीति के
बूचड़खाने में
सत्य ही पशु है
जिसे काटा जा रहा है
…..
राजनीति के बूचड़खाने में
करुणा सबसे पहले मरती है
बिम्ब, प्रतीक,उपमाएं,वक्रोक्तियां या भाषा की भंगिमाएं आदि शिल्पगत प्रयोग कविता को तब ही समृद्ध करते हैं अगर अगर कवि के पास मुक्तिबोध के शब्दों में ‘ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान’ हो। देश-दुनिया को समझने की व्यापक वैश्विक दृष्टि हो। यह दृष्टि ही रचनाकार को एक बेहतर रचनाकार बनाती है । इन कविताओं को पढ़कर ऐसा एहसास होता है कि कवि स्वयं को इस दृष्टि से समृद्ध करने में ईमानदारी से प्रयासरत है।
कवि ‘मन’ कविता में स्वीकार करता है—
मैं खुद को
अपडेट करने की
कोशिश कर रहा हूं
लेकिन
फ़ाइलें बहुत बड़ी हैं
और कनेक्शन बहुत धीमा
—-
कभी-कभी
मुझे लगता है कि
जैसे कोई वायरस
धीरे-धीरे
मेरे दिमाग में फैल रहा है
कवि अपने शिल्पगत विधान में किसी विशेष परिपाटी का अनुसरण नहीं करता बल्कि उनकी कविता के अधिकांश बिम्ब/प्रतीक उसके आसपास के ग्रामीण माहौल से ही स्वाभाविक रूप में कविता में ढल जाते हैं। उन्हें कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता । जैसे—रेत पर रेखाएं,बूचड़खाना,नीम का पेड़, चमारों की गली,कबाड़खाना,सुबह की चाय, भिनभिनाती मक्खियाँ,भूखा-बच्चा, तमाशबीन, पर कटी चिड़िया, पशु-बाड़ा, बूढ़ा-बैल, पत्थरों का टोकरा,झूठी-पत्तलें,चूल्हा-चौका,चौबारा,कच्चे मकान की छत,सडांध भरी बस्ती आदि इन कविताओं के परिवेश और सरोकारों का परिचय एक साथ दे देते हैं। इन बिम्बों/प्रतीकों से कवि की सौंदर्य-दृष्टि का संकेत भी मिल जाता है कि चीजों को देखने की उसकी दृष्टि किस तरह से अलग है।
‘रेत पर रेखाएं’ की कविताएं किसी मनोरंजन या आनंद की प्राप्ति के लिए नहीं लिखी गई बल्कि समाज के हाशिये पर पड़े हुए वंचित तबकों के दर्द को अभिव्यक्ति देना कवि का विशेष प्रयोजन नजर आता है। इसलिए इन कविताओं में सीधी वैचारिक टकराहट है। एक अभिजन वर्ग की कुलीन विचारधारा और दूसरी तरफ आमजन के अधिकारों के लिए व्यवस्था से संघर्ष की विचारधारा। आम आदमी के दर्द की अभिव्यक्ति के लिये कवि क्रूर-सत्ता, कुटिल- राजनीति, वर्ण-व्यवस्था, साम्प्रदायिक शक्तियां, धार्मिक पाखंड, ईश्वर का अस्तित्व, मंदिर-मस्जिद और हिंदू-मुस्लिम -विवाद आदि से सीधे-सीधे टकराता है। राजेश भारती की कविताओं का यह मुख्य द्वंद्व है।पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश की तरह व्यवस्था के प्रति आक्रोश और आमजन के प्रति करुणा और प्रेम, किसान-मजदूर-महिला और हाशिया-गत समाज के शोषण के खिलाफ बगावती तेवर इन कविताओं की एक विशेषता मानी जा सकती है।
कवि भगत सिंह के सपनों का भारत चाहता है। कुछ कविताओं जैसे बूचड़खाना, तानाशाह, भगवान का खेल,पुल, मैं दलित हूँ, चमारों की गली, रूढ़ियाँ, लूटतंत्र, बेरोजगार, हे ईश्वर, आप तो, दुःखी दुनिया,गीत अभी बाकी है, सवाल,इसी समय ही, संवेदनाओं के सूत्र, कितना आसान है, गरीबी,मेरा औरत होना, युद्ध, गरीबों की शव यात्रा, मेहनतकश आदि में राजेश भारती में अपने इन प्रतिरोधी विचारों को खुलकर व्यक्त किया है। वे ‘सवाल’ कविता में वर्तमान नेताओं को भगत सिंह के सपनों का हत्यारा बताते हुए कहते हैं-
कुछ तो बोलो तुम
जाति धर्म के ठेकेदारो
भगत सिंह के सपनों के हत्यारो
प्रेम,शांति,स्वतंत्रता,समानता,अभिव्यक्ति की आजादी, गरिमापूर्ण जीवन और एक बेहतर आदर्श समाज की स्थापना के लिए कवि का आत्म-संघर्ष इन कविताओं में स्पष्ट दिखाई देता है।
विशेषकर–लिखी जाए ऐसी कविता ,हमारा प्यार, खिड़की, हाथ, कितनी बार, खिंचाव, रेत पर रेखाएं, मन के भूत, सुकरात, यदि, सवाल,मां, जिन्दगी, मेरे बच्चो, अब की बार,
बदल गई है हीर, नौकरी लगने पर आदि कविताओं में इन्हीं मानवीय मूल्यों को बचाने की जद्दोजहद है l
जिस तरह धर्म का पाखंड होता है,उसी तरह साहित्य का पाखंड भी होता है और यह दौर धार्मिक पाखंड का तो है ही,साहित्यिक पाखंड का भी है। वर्तमान दौर में इस साहित्यिक पाखंड से बच पाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है लेकिन इस खतरे से सतर्क रहकर ही गंभीर सृजन किया जा सकता है। इन कविताओं को पढ़कर लगता है कि कवि इस खतरे के प्रति सतर्क है।
कहीं-कहीं पर प्रूफ की त्रुटियां, स्पाट बयानी, गद्यात्मकता, कविता-पंक्ति का निर्वाह भावानुसार न होना आदि कुछ असावधानियां होते हुए भी अधिकांश कविताएं बेहद संवेदनशील, मार्मिक और पठनीय बन पड़ी हैं ।
कुछ कविताओं के विशेष काव्यांशों को आप भी देखिए–
मुझे डर है कहीं
मर न जाए घुटकर
क्रांति की आवाज…
धीरे-धीरे
विलुप्त हो रहे हैं
बेहतर भविष्य के सपने..
लिखी जाए ऐसी कविता
जो किसी
विवश औरत की देह पर
उभरे हुए नाखूनों के निशान
मिटा सके
मरहम बनकर…
यदि
तारे शब्द होते
तो मैं तुम्हारा नाम
आकाशीय लिपि में लिखता..
जिस गति से फैलाई जा रही है
साम्प्रदायिकता
यदि इसी गति से तुम
प्रेम के पुल बनाते…
तो कब का हो गया होता
इस दुनिया का कायाकल्प…
धीरे-धीरे
कुर्सी के कीड़े
खा रहे हैं देश को
और स्थापित किया जा रहा है
मुट्ठी भर लोगों का लूट तंत्र…
मेरी कविता निर्धन की बेटी है
जिसे पल पल घूरते हैं लोग..
तुम इतने
कायर भी मत हो जाना
कि किसी स्त्री पर
अत्याचार होता देख
तुम्हें तुम्हारी माँ का
खयाल न आए…
तुम ऐसे
बुद्धिजीवी न बनना
कि डालने लगो
हुकूमत की गलतियों पर पर्दा
गढ़ने लगो
उसके कसीदे…
चमारों की गली का
आखिरी छोर
वहां खत्म नहीं होता
जहां मकान खत्म होते हैं…
जिंदगी
मेरे पशु बाड़े में
बैठा बूढ़ा-बैल
जो निरंतर ताक रहा है…
जिंदगी
एक उदास गीत
जिसे एक प्रेयसी
गुनगुना रही है..
कुछ तो बोलो तुम
जाति धर्म के ठेकेदारो
भगत सिंह के सपनों के हत्यारो…
ख़बरें आती हैं
जैसे मक्खियाँ भिनभिनाती हैं..
एंकर की आवाज
जैसे बाजार में रेहड़ी वाला…
और हम
हम बस तमाशबीन
जो हर खबर के बाद
ताली बजाते हैं..
एक खूबसूरत कविता संग्रह के लिए संभावनाशील युवा कवि राजेश को बहुत- बहुत बधाई !!
