एक जन बुद्धिजीवी का न होना..!

स्मृति शेष

एक जन बुद्धिजीवी का न होना..!

 

दयाशंकर राय

 

अभी थोड़ी देर पहले ही वीरेंद्र यादव जी को आखिरी विदाई देकर लौटा हूँ। लग नहीं रहा कि वे हमारे बीच नहीं हैं। उधर इलाहाबाद में राजेंद्र कुमार जी एक सन्नाटा छोड़ गए और उनके थोड़ी देर बाद ही वीरेंद्र जी के न रहने से लखनऊ के बौद्धिक समाज में एक सूनापन सा छा गया। राजेन्द्र कुमार जी तो पिछले डेढ़ साल से बीमारी से जूझ रहे थे इसलिए उनके चाहने वाले एक तरह से मानसिक रूप से तैयार थे किसी भी स्थिति के लिए। लेकिन वीरेंद्र जी के जाने ने तो बहुत कुछ ठिठका सा दिया। उनकी सक्रियता अभी बहुतों को चौंकाती भी थी और रास्ता भी दिखाती थी।

जब उन्होंने सेहत की गड़बड़ी की वजह से दिल्ली पुस्तक मेले में न जाने की बात लिखी तो मैंने हालचाल लेने के लिए ही 13 जनवरी को फोन किया तो उन्होंने बताया कि यार दया शंकर सुगर लेबल बहुत बढ़ गया है। 600 पर पहुंच गया था। मुझे भी थोड़ी चिंता हुई क्योंकि उस दिन कमजोरी के चलते उनकी आवाज थोडी मद्धिम सी थी। सेहत को लेकर एहतियात बरतने की हिदायत के साथ मैंने जल्द ही मिंलने आने को कहा। लेकिन यह सब इतनी जल्द हो गया कि किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा क्योंकि उनकी बौद्धिक और भौतिक सक्रियता देखते हुए उन्हें अभी 10 साल तो सक्रिय रहना ही था। और यह आज के कठिन और बेहद चुनौतीपूर्ण दौर की बहुत जरूरी मांग भी थी..!

दरअसल वीरेंद्र यादव जी का जाना एक प्रख्यात आलोचक का जाना भर नहीं है बल्कि एक ऐसे जन बुद्धिजीवी आलोचक का जाना है जो साहित्य को उसकी जड़ अकादमिक दुनिया से बाहर निकाल सामाजिक सन्दर्भों और देश को मथ रहे ज्वलंत सवालों से जोड़ता था। साहित्यिक विषयों पर लिखते हुए भी धर्मांधता, गैर बराबरी, आधुनिकता बोध और लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्य उनकी चिंता के केंद्र में लगातार बने रहे। साहित्य की दुनिया में अकादमिक आलोचक तो आज भी हैं और आगे भी रहेंगे ही, पर निकट भविष्य में वीरेंद्र जी की कमी शायद नहीं पूरी होने वाली क्योंकि वे कथा साहित्य के प्रखर आलोचक तो थे ही हर महत्वपूर्ण घटना पर उनका वैचारिक हस्तक्षेप उन्हें अपने समकालीन बहुत से आलोचकों से अलग खड़ा करता था। आज के फासीवादी निज़ाम के असंवैधानिक, साम्प्रदायिक और विभाजनकारी मंसूबों पर जिस पैनी नज़र से वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते थे वह आज के वक्त की एक अनिवार्य मांग थी। हर तरह के वैचारिक विचलन पर , चाहे वह व्यक्तियों का रहा हो या संगठन का, उनकी राय बिना लागलपेट के साफगोई लिए हुए होती थी। हालांकि संगठनों के वैचारिक और अवसरवादी विचलन पर चिंतित होते हुए भी वे सार्वजनिक तौर पर सीधे तीखा बोलने से थोड़ा परहेज करते थे। शायद इसलिए कि इससे संगठनों को नुकसान पहुंचेगा और इसका फायदा प्रतिगामी ताकतें उठाएंगी। मैंने तीन चार साल पहले एक बार यह बात उंनसे कही भी थी कि वीरेंद्र भाई आज के दौर में क्या अब तीनों लेखक संगठनों के अलग-अलग होने का कोई औचित्य रह गया है तो उन्होंने इस पर सहमति ही जताई थी यह कहते हुए कि दयाशंकर जी बात तो आपकी ठीक है पर यह मुमकिन इसलिए नहीं होगा क्योंकि ये तीनों संगठन अपनी पार्टियो से नाभिनालबद्ध हैं..!

आज की विभाजनकारी सत्ता के मंचों पर लेखकों की भागीदारी को लेकर भी उनका रुख बिलकुल साफ रहा करता था और लेखकों के विचलन को लेकर वे लगातार साफगोई से अपनी बात रखते रहे। इधर प्रेमचंद का कई तरह से कुछ लोगों ने बहुत छिछले स्तर पर उतर कर उनका चरित्र हनन तक शुरू कर दिया था। और दलित लेखकों की एक जमात भी प्रेमचंद की कुछ कहानियों को लेकर उन्हें दलित विरोधी सिद्ध करने का अभियान छेड़े हुए थी। वीरेंद्र जी ने प्रेमचंद के पुनर्पाठ पर जोर देते इस अभियान का बहुत ही तीखा आलोचनात्मक जवाब दिया और यह साफ तौर पर स्थापित किया कि जो लोग आज प्रेमचंद को दलित विरोधी साबित करने पर तुले हुए हैं वे दरअसल वे जाने-अनजाने प्रतिगामी ताकतों के वैचारिक अभियान का हिस्सा बन जा रहे हैं..! उनका आलोचनात्मक लेखन बताता है कि वे आज प्रतिरोध की लेखकीय चेतना की एक मुखर आलोचनात्मक आवाज थे। लखनऊ में तो सड़क से लेकर हर महत्वपूर्ण सार्वजनिक मंच तक पर। पत्र पत्रिकाओं के लेखक तो अब भी हैं ही और रहेंगे ही, पर वीरेंद्र जी जिस तरह सोशल मीडिया पर हर महत्वपूर्ण सवाल पर मुखरित थे उस जगह पर फिलहाल सन्नाटा पसर गया है जबकि सोशल मीडिया के आज के महत्व को देखते हुए तात्कालिक हस्तक्षेप की दृष्टि से यह मंच आज बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। राजनीतिक विषयों और संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों की याद दिलाते रहने के लिए जिस कौशल और चतुराई से वे महत्वपूर्ण हिंदी ही नहीं, हिंदी के इतर के भारतीय और दुनिया के अनेक लेखकों के उद्धरणों को उद्धरित करते थे वह बेमिसाल था। यह स्थापित करने के लिए कि प्रेमचंद ने यूँ ही नहीं कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है..! प्रेमचंद की इस उक्ति के मर्म को वीरेंद्र यादव ने बहुत गहराई से समझा था और और फेसबुक की अपनी छोटी-छोटी टिप्पणियों में वे इसकी बार-बार याद दिलाते रहते थे।

अपनी इस अडिग प्रतिबद्धता के लिए ही वे हिंदी आलोचना के एक अनिवार्य जन बुद्धिजीवी थे। अरुंधति रॉय उनकी प्रिय लेखक यूँ ही नहीं थीं..! इस लिहाज से वीरेंद्र जी का जाना वाकई एक अपूरणीय बौद्धिक क्षति है। प्रतिरोध की बौद्धिक सक्रियता और निरंतरता को जारी रखने के लिए हिंदी क्षेत्र को इस कमी को पूरा करने के लिए खुद को तैयार करना ही होगा।

क्या कहूँ अभी और..!

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