कुम्हार : हरियाणवी लोकजीवन में कुंभ-शिल्प परम्परा का अध्ययन

कुम्हार : हरियाणवी लोकजीवन में कुंभ-शिल्प परम्परा का अध्ययन

मनजीत सिंह, सहायक प्रोफेसर पार्ट टाइम, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र

 

प्रस्तावना 

मानव सभ्यता केविकासक्रम में जिन शिल्पों ने जीवन को स्थायित्व, सुविधा और सांस्कृतिक पहचान प्रदान की, उनमें कुंभ-शिल्प (Pottery) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मिट्टी, जल, वायु और अग्नि—इन चारों प्राकृतिक तत्वों के संतुलित समन्वय से उत्पन्न यह शिल्प आदिम मानव से लेकर आधुनिक समाज तक निरंतर प्रचलित रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप में हड़प्पा सभ्यता से लेकर ग्रामीण लोकसंस्कृति तक, मृद्पात्रों का उपयोग दैनिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग रहा है।
हरियाणवी लोकजीवन में इस परम्परा को जीवित रखने वाला प्रमुख समुदाय कुम्हार रहा है। कुम्हार केवल बर्तन बनाने वाला कारीगर नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, लोकविश्वासों, अनुष्ठानों और सांस्कृतिक निरंतरता का संवाहक है। यह आलेख हरियाणा के लोकजीवन में कुम्हार समुदाय और कुंभ-शिल्प परम्परा की ऐतिहासिक, सामाजिक, तकनीकी और सांस्कृतिक भूमिका का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करता है।

2. अध्ययन के उद्देश्य एवं शोध-विधि

इस अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
हरियाणवी लोकजीवन में कुम्हार समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका का विश्लेषण।
कुंभ-शिल्प की पारम्परिक तकनीकों, उपकरणों और कार्य-प्रक्रिया का अकादमिक अध्ययन।
कुम्हार शिल्प के धार्मिक, आर्थिक और प्रतीकात्मक आयामों को रेखांकित करना।
समकालीन परिवर्तनों के संदर्भ में इस परम्परा के समक्ष उपस्थित चुनौतियों और संरक्षण की संभावनाओं का मूल्यांकन।
शोध-विधि के रूप में लोकसाहित्य, नृवंशशास्त्रीय अध्ययनों, क्षेत्रीय विवरणों तथा सांस्कृतिक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण का प्रयोग किया गया है।

3. कुम्हार शब्द की व्युत्पत्ति एवं सामाजिक पहचान

‘कुम्हार’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के कुंभकार शब्द से मानी जाती है, जिसका शाब्दिक अर्थ है—कुंभ या घड़ा बनाने वाला। प्राकृत और अपभ्रंश के माध्यम से यह शब्द कुम्हार के रूप में प्रचलित हुआ। हरियाणा क्षेत्र में कुम्हार को कहीं-कहीं प्रजापति, माटीकार अथवा कुलाल भी कहा जाता है।
परम्परागत ग्रामीण समाज में कुम्हार की पहचान एक सेवा-आधारित शिल्पकार के रूप में रही है। वह पूरे गाँव की आवश्यकताओं के लिए जलपात्र, रसोई-पात्र, अनाज-भंडारण पात्र तथा अनुष्ठानिक वस्तुएँ तैयार करता था। इस प्रकार कुम्हार की भूमिका ग्राम्य जीवन की संरचना में अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

4. कुंभ-शिल्प का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

कुंभ-शिल्प का इतिहास मानव सभ्यता जितना ही प्राचीन है। सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त मृद्पात्र इस शिल्प की उन्नत अवस्था के प्रमाण हैं। वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में भी घड़ा, कलश और हांडी जैसे पात्रों का उल्लेख मिलता है।
हरियाणा क्षेत्र, जो प्राचीन सभ्यताओं का केंद्र रहा है, वहाँ कुंभ-शिल्प का निरंतर विकास हुआ। ग्रामीण समाज में यह शिल्प पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप ढलता गया।

5. कुंभ-शिल्प की पारम्परिक तकनीक

कुंभ-शिल्प पूर्णतः प्रकृति-आधारित और अनुभवजन्य ज्ञान पर आधारित है। सर्वप्रथम उपयुक्त मिट्टी का चयन किया जाता है। यह मिट्टी प्रायः तालाबों, नदियों या खेतों की ऊपरी परत से प्राप्त की जाती है। मिट्टी को पानी में भिगोकर गूंथा जाता है, जिससे वह चिकनी और लचीली हो जाए।
इसके पश्चात् चाक की सहायता से पात्रों को आकार दिया जाता है। चाक पर घूमती मिट्टी को उँगलियों, हथेलियों और दबाव के संतुलन से रूप देना कुम्हार की कुशलता और वर्षों के अभ्यास का परिणाम होता है। आकार देने के बाद पात्रों को छाया में सुखाया जाता है और अंततः भट्टी में पकाया जाता है। भट्टी की आग पात्रों को स्थायित्व और मजबूती प्रदान करती है।

6. उपकरण एवं शिल्प-सामग्री

कुम्हार द्वारा प्रयुक्त उपकरण अपेक्षाकृत सरल होते हैं, किंतु उनकी उपयोगिता अत्यंत प्रभावी होती है। प्रमुख उपकरणों आथरा,आथरी,कंडेरा ,कंडेरी ,चाक, चकलेटी , सलाई, तार, खुरपी, थापा, कपड़ा और भट्टी शामिल हैं।
इन उपकरणों की सादगी यह दर्शाती है कि लोकशिल्प तकनीकी जटिलता की अपेक्षा अनुभव, संवेदना और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर अधिक निर्भर करता है।

7. निर्मित पात्र एवं उनकी उपयोगिता

हरियाणवी लोकजीवन में कुम्हार द्वारा निर्मित पात्रों का व्यापक उपयोग रहा है। इनमें घड़ा, मटका, सुराही, गगरी, हांडी, कुल्हड़, दीया, चिलम, खिलौने, अनाज-भंडारण पात्र आदि प्रमुख हैं।
घड़ा और मटका जल को शीतल बनाए रखने के लिए उपयोग किए जाते हैं, जबकि हांडी और कुल्हड़ भोजन पकाने और परोसने में सहायक होते हैं। ये मृद्पात्र पर्यावरण-अनुकूल होने के साथ-साथ स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी माने जाते हैं।

8. धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयाम

कुंभ-शिल्प का धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन से गहरा संबंध है। भारतीय परम्परा में कलश को मंगल और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। विवाह, जन्म, गृह-प्रवेश, यज्ञ और पूजा-पाठ में मिट्टी के पात्रों का अनिवार्य प्रयोग होता है।
दीपावली पर दीयों का निर्माण, होली और गणगौर जैसे पर्वों में मिट्टी की मूर्तियाँ तथा लोकदेवताओं की पूजा में मृद्पात्र कुम्हार की सांस्कृतिक उपस्थिति को सुदृढ़ करते हैं।

9. कुम्हार और हरियाणवी लोकजीवन

ग्रामीण समाज में कुम्हार की भूमिका केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी रही है। गाँवों में उसका चाक और भट्टी सामूहिक जीवन का केंद्र माने जाते थे। लोकभाषा में “कुम्हार का चाक” जैसे मुहावरे जीवन की नश्वरता और सृजनशीलता के प्रतीक हैं।
कुम्हार का शिल्प लोकज्ञान, सामूहिक अनुभव और परम्परा का परिणाम है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहा है।

10. समकालीन चुनौतियाँ

आधुनिक औद्योगिक उत्पादन, प्लास्टिक और धातु-पात्रों के बढ़ते प्रयोग ने कुंभ-शिल्प को संकटग्रस्त कर दिया है। बाजार की प्रतिस्पर्धा, आर्थिक असुरक्षा और बदलती जीवन-शैली के कारण अनेक कुम्हार इस परम्परागत पेशे से विमुख हो रहे हैं।
हालाँकि, पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली और स्वदेशी उत्पादों के प्रति बढ़ती जागरूकता ने इस शिल्प के पुनरुत्थान की संभावनाएँ भी उत्पन्न की हैं।

11. संरक्षण एवं पुनरुत्थान की संभावनाएँ

कुंभ-शिल्प के संरक्षण के लिए अकादमिक अध्ययन, सरकारी एवं गैर-सरकारी योजनाएँ, संग्रहालयों में प्रदर्शन और बाज़ार-समर्थन आवश्यक है। यदि इस शिल्प को आधुनिक डिज़ाइन और विपणन से जोड़ा जाए, तो यह पुनः आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो सकता है।

12. निष्कर्ष

कुम्हार और कुंभ-शिल्प परम्परा हरियाणवी लोकजीवन की प्राचीन, बहुआयामी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध धरोहर है। यह शिल्प मानव और प्रकृति के सामंजस्य का प्रतीक है। इसके संरक्षण और संवर्धन के बिना लोकसंस्कृति की निरंतरता अधूरी रह जाएगी। अतः यह आवश्यक है कि कुम्हार शिल्प को केवल अतीत की परम्परा न मानकर वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक पूँजी के रूप में देखा जाए।

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