आलोचक वीरेन्द्र यादव को जलेस की विनम्र श्रद्धांजलि
जनवादी लेखक संघ के केंद्रीय कार्यालय ने आलोचक वीरेंद्र यादव के निधन पर गहरा दुख जताते हुए विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है। संघ द्वारा जारी विज्ञप्ति इस प्रकार है-
5 मार्च 1950 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद में जन्मे वीरेंद्र यादव ने उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। उन्होंने एलआईसी में नौकरी करते हुए भी प्रगतिशील लेखक संघ मंख अपनी सक्रियता बनाए रखी थी और आजीवन प्रलेस से जुड़े रहे। उन्हें ‘तद्भव’ पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान प्राप्त हुआ था। ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ उनकी पहली चर्चित पुस्तक है। उन्होंने कुछ समय तक ‘प्रयोजन’ पत्रिका का संपादन भी किया था।
वीरेंद्र यादव अपनी जनपक्षधरता के लिए जाने जाते थे। आलोचना की दुनिया में वे उपन्यास विधा के श्रेष्ठ आलोचक के रूप में चिन्हित किए जाते थे। अपने समकालीन आलोचकों में वे उपन्यास को जिस दृष्टि से देखते थे, वह विरल थी। ‘उपन्यास और देस’ पुस्तक से हिंदी और अंग्रेजी के कई उपन्यासों पर उनकी आलोचकीय दृष्टि का पता चलता है। वे कई कथा आलोचकों पर भी अपनी कलम चलाते हैं और प्रवृत्ति और प्रकृति के भीतर भी उपन्यास को देखते हैं। पुस्तक के शीर्षक में ही देश को ‘देस’ लिखकर वे अपना दृष्टिकोण जता देते हैं। उनके यहाँ आमजन की जो केंद्रीयता दिखती है, वह इस शीर्षक से स्वयं ध्वनित हो जाती है।
‘विवाद नहीं हस्तक्षेप’ पुस्तक में भी उनके तमाम हस्तक्षेपकारी लेखों को पढ़ा जा सकता है। वे अपने समय के चर्चित मुद्दों पर बेबाक राय रखते थे। ‘विमर्श और व्यक्तित्व’ पुस्तक में भी उन्होंने अपनी आलोचना दृष्टि का स्पष्ट परिचय दिया है।
दरअसल वीरेंद्र यादव एक जन बुद्धिजीवी थे। प्रेमचंद की रचनाओं पर उनकी मजबूत पकड़ थी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर भी उन्होंने विमर्शकारी हस्तक्षेप किया था। वे समय की चुनौतियों से जूझने वाले लेखक थे और अपनी निर्भीकता के लिए जाने जाते थे। उनमें गलत को गलत और सही को सही कहने का साहस था। वे तमाम सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते थे। स्तरीकृत समाज के विभिन्न स्तरों के गुह्य अर्थस्तरों को उद्घाटित करना उनका प्रिय विषय था। वे परंपरागत रूढ़ियों को तोड़ने वाले लेखक थे। उन्होंने मार्क्सवाद से कभी समझौता नहीं किया। जहाँ जरूरी हुआ वहाँ उन्होंने अपने अग्रज लेखकों और समकालीन लेखकों से भी टकराने में देर नहीं की। वे सवाल करने वाले और व्यवस्था की विषमताओं को प्रश्ननांकित करने वाले लेखक थे। उनका यूँ अचानक चले जाना स्तब्धकारी और दुखद है। जनवादी लेखक संघ उनके निधन पर अपनी शोक संवेदना व्यक्त करते हुए उनकी स्मृति को सादर नमन करता है।
