बात बेबात
हाई-रिस्क कैटेगरी में डाला गया भारत
विजय शंकर पांडेय
विदेश पढ़ने का सपना अब कुछ ऐसा हो गया है, जैसे रेलवे की वेटिंग लिस्ट—नाम तो है, भरोसा नहीं। इस बार ऑस्ट्रेलिया ने भारतीय छात्रों को ऐसा झटका दिया है कि कोआला (एक शाकाहारी, वृक्षों पर रहने वाला धानी प्राणी मारसूपियल) भी सिर पकड़कर बैठ गया। वीज़ा आवेदन अब “हाई रिस्क” में हैं। मतलब, छात्र नहीं—शेयर बाज़ार का IPO समझ लिए गए हैं।
ऑस्ट्रेलिया ने भारत को उसी कतार में खड़ा कर दिया है, जहां पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल पहले से चाय पी रहे थे। तर्क बड़ा शानदार है—“विश्वसनीयता में गिरावट।” यानी अब डिग्री से ज़्यादा ज़रूरी हो गया है, चरित्र प्रमाणपत्र, वो भी अंतरराष्ट्रीय।
असल गुनाह? कुछ फर्जी डिग्रियों का। और सज़ा? करोड़ों ईमानदार छात्रों को। ये वही बात हुई कि मोहल्ले में एक चोर निकला, तो पूरी कॉलोनी पर CCTV लगा दिया जाए।
कनाडा पहले ही दरवाज़े पर ताला लगा चुका है, ब्रिटेन ने खिड़की आधी बंद कर दी, और अब ऑस्ट्रेलिया ने कहा—पहले भरोसा लाओ, फिर वीज़ा पाओ। बेचारे छात्र सोच रहे हैं, IELTS दें या ईमानदारी का एग्ज़ाम?
भारत में एजेंट अब नए कोर्स बेच रहे हैं—“विदेश कैसे मन में जाएं।” फीस कम है, रिजल्ट गारंटीड। क्योंकि लगता है, अब विदेश जाना आसान नहीं, बल्कि शक के साथ पढ़ाई करना नया ग्लोबल सिलेबस बन गया है।
