एस.पी.सिंह की कविता- सभा में उतरा अंधकार

 कविता-

सभा में उतरा अंधकार

एस.पी.सिंह

एक कहानीकार

मंच पर नहीं,

अपने शब्दों के साथ

चुपचाप बैठा था—

जैसे कोई

दीपक

हवा से डरकर भी

जलता रहता है।

 

पर तभी

कुलपति की कुर्सी से

एक वाक्य गिरा—

ज्ञान नहीं,

जैसे

सत्ता का पत्थर।

 

सभा में बैठे

प्रबुद्ध जन

अचानक

पुस्तक बन गए—

खुले,

पर पढ़े नहीं जा सके।

 

उस कहानीकार के पास

कोई ढाल नहीं थी,

सिवाय

उसकी भाषा के—

जिसे

कुलपति की आवाज़ ने

भीड़ के बीच

नंगा कर दिया।

 

यह केवल

एक व्यक्ति का अपमान नहीं था,

यह

शब्दों के मंदिर में

जूते पहनकर

घुस आने जैसा था।

 

जिस आसन से

विवेक बहना चाहिए था,

वहीं से

अहंकार टपका,

और

कहानी का गला

सत्ता की उँगलियों में

कस गया।

 

कुलपति महोदय,

आपने उसे

सभा से बाहर किया,

पर याद रखिए—

कहानियाँ

दरवाज़ों से नहीं,

दिलों से निकलती हैं।

 

आज आपने

एक कहानीकार को

खामोश किया,

कल

यह विश्वविद्यालय

अपनी ही कथा में

खलनायक बन जाएगा।

 

और हम?

हम लिखते रहेंगे—

क्योंकि

जब सत्ता

चीखने लगती है,

तब

साहित्य

सच बोलने लगता है।

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