जन्मदिन पर विशेष
समाजवादी विचार वाहक महान दार्शनिक संन्यासी स्वामी विवेकानंद
मुनेश त्यागी
आज (12 जनवरी 1863) को महान संत स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन है। उन्होंने अपने जीवन में बहुत सारी बातें कही हैं, बहुत सारे भाषण दिए हैं। उन्होंने भारतीय समाज को सजग बनाने की बातें कही हैं।
स्वामी विवेकानंद ने पश्चगामी विचारों को लेकर कहा था कि हमें मौजूदा दौर में उन पर हमला करने की जरूरत है। उन्होंने पलायनवादी और रहस्यवादी विचारों की जमकर खिल्ली उड़ाई है। ये विचार हमें असलियत से दूर रखते हैं। धर्म के बारे में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि “अब हम एक ऐसा धर्म चाहते हैं जो आदमी का नवनिर्माण करने वाला हो और उसे सफल बनाने वाला हो। कोई भी चीज जो आदमी को कमजोर बनाती है उसे विष समझकर अस्वीकार कर दीजिए। केवल सत्य ही बल और शांति प्रदान करता है। नि:शक्त करने वाले रहस्यवादों को छोड़ दीजिए।”
वे भारतीय समाज के पिछड़ों, शोषितों, अभावग्रस्तों, जुल्मों सितम और अन्याय के शिकार के लोगों के वकील थे। वे भारत से शोषण, जुल्म, दास्तां, गरीबी, अन्याय और छुआछूत का अंत चाहते थे। उनके विचार कट्टरता, पोंगापंत, धर्मांधता और सांप्रदायिकता के विरुद्ध एक धधकती मशाल हैं। उन्होंने अंधविश्वासियों पर चोट करते हुए कहा था कि “मैं अंधविश्वासियों की जगह अनीश्श्वरवादियों को देखना ज्यादा पसंद करूंगा क्योंकि वे तर्क, विवेक और बुद्धि में विश्वास करते हैं। वे जीवित तो हैं।”
रूस में समाजवाद आने से पहले ही स्वामी विवेकानंद अपने को समाजवादी कहते थे। स्वामी विवेकानंद रूस के क्रांतिकारी अराजकतावादी प्रिंस क्रॉपोटकिन से मिलने के बाद समाजवादी विचारों से काफी प्रभावित हुए थे और अपने को समाजवादी कहने लगे थे। वे कहते थे कि “इसलिए नहीं कि यह व्यवस्था पूर्णतया परिपूर्ण है, बल्कि इसलिए कि एक भी रोटी न होने से, आधी रोटी ही भली है।”
स्वामी विवेकानंद ने भारत की जनता की कमजोरी और दुर्बलताओं की तीखी आलोचना की है। छुआछूत, जातिश्रेष्ठता, धार्मिक आतंकवाद और पंडित पुरोहितों की तीखी आलोचना की है। उन्होंने जनता के लिए लिखा है कि “मैं लोगों को अंधविश्वासी मूर्खों की बजाय, पक्के अनीश्वरवादियों के रूप में देखना ज्यादा पसंद करूंगा। अनीश्वरवादी जिंदा तो होता है। ईश्वरवादी किसी काम तो आ सकता है, किंतु जब उसे अंधविश्वास जकड लेता है तब तो उसका मस्तिष्क मृतप्राय हो जाता है, बुद्धि जम जाती है और मनुष्य पतन के दलदल में अधिकाधिक गहरे डूबता चला जाता है।” वे आगे कहते हैं कि “यह कहीं ज्यादा अच्छा है कि तर्क और युक्ति का अनुसरण करते हुए लोग अनीश्वरवादी बन जाएं, बजाय इसके की किसी के कह देने मात्र से अंधों की तरह 20 करोड़ देवी देवताओं को पूजने लगें।”
स्वामी विवेकानंद का मानना था कि आर्थिक और राजनीतिक उत्थान करने से ही जनता का आध्यात्मिक उत्थान और विकास किया जा सकता है। उन्होंने लिखा था कि “वे हमसे रोटी मांगते हैं, हम उन्हें पत्थर देते हैं। भूख से पीड़ित जनों के गले में धर्म उड़ेलना उनका अपमान करना है। भूख से अधमरे लोगों को धार्मिक सिद्धांतों की घुट्टी पिलाना, उनके मान सम्मान पर आघात करना है।”
उन्होंने धार्मिक संगठनों की आलोचना करते हुए लिखा था कि “आप उनके शरीरों की भुखमरी से रक्षा क्यों नहीं करते? उन्होंने यह भी कहा था कि मानव जाति को मुक्त करने के लिए अंततः शूद्रों यानी मेहनतकशों का राज होगा। उन्होंने कहा था कि दुखियों, पीड़ितों, मजदूरों और निर्धनों की सेवा करने से ही असली सुख मिलता है।
ईश्वर में अविश्वास प्रकट करते हुए वे कहते थे कि “मैं यह स्वीकार नहीं करता कि जो ईश्वर मुझे यहां रोटी नहीं दे सकता, वह स्वर्ग में मुझे अनंत सुख देगा।”
उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि “यदि गरीबों को उनका हक न दिया गया तो एक दिन वे जाग्रत और संगठित होकर, इस देश के स्वामी बन जाएंगे।” तमाम सांप्रदायिक, जातिवादी, भ्रष्टाचारी और जनता का शोषण करने वाली ताकतें, आज स्वामी विवेकानंद के विचारों पर गंभीर कुठाराघात कर रही हैं। उनके विचारों सिद्धांतों और सपनों को रौंद रही हैं। ये ताकतें जनता को स्वामी विवेकानंद के असली विचारों से अवगत नहीं कर रही हैं, बल्कि उनके बारे में तरह-तरह की मनगढ़ंत बातें पेश कर रहे हैं और जनता को स्वामी विवेकानंद के विचारों से गुमराह कर रहे हैं।
ये ताकतें आज भी जनविरोधी नीतियों का पालन कर रही हैं। इनकी नीतियों के कारण समाज में शोषण, जुल्म, अन्याय, अत्याचार बढ़ रहे हैं। जनता गरीब से गरीब होती जा रही है, असमानता अपने चरम पर है और आर्थिक संपन्नता चंद लोगों तक सिकुड़ कर रह गई है।
भारत की जनता इन सब चीजों को समझ रही है और वह अपना उजला भविष्य बनाने को संघर्षरत है। आज हमारा देश उसी तरफ बढ़ रहा है। स्वामी जी की भविष्यवाणियां सही साबित हो रही हैं। हम आज देख रहे हैं कि स्वामी विवेकानंद के विचारों और सिद्धांतों पर चलकर ही भारत को एक उन्नत, समतावादी, समानतावादी, विकासशील और जनवादी ताकत वाला देश बनाया जा सकता है।
स्वामी विवेकानंद जनजागृति और जन संघर्ष करने में विश्वास करते थे तभी तो वह कहते थे,,,
“उठो जागो और तब तक नहीं रुको
जब तक लक्ष्य प्राप्त ना हो जाए।”
उनका कहना था कि “आदमी जैसा चाल चलन चलेगा, जैसा व्यवहार करेगा और जैसी सोच बनाएगा वह ऐसा ही हो जाएगा। अगर आदमी की सोच निर्बल होगी तो वह निर्बल हो जाएगा और अगर उसकी सोच सबल होगी तो वह शक्तिशाली हो जाएगा।” वे कहते हैं,,,,”तुम जैसा सोचोगे वैसा ही बन जाओगे। खुद को निर्बल मानोगे तो निर्बल और सबल मानोगे तो सबल हो जाओगे।”
स्वामी विवेकानंद आदमी में विश्वास करते थे। वे आदमी को ही भगवान समझते थे। उनका कहना था कि,,,,” मैं उस प्रभु का सेवक हूं, जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं।”
स्वामी विवेकानंद अपनी पूरी जिंदगी सीखने की प्रक्रिया में लगे रहे और वे अनुभव को ही श्रेष्ठ शिक्षक मानते थे। उनका कहना था कि,,,, “जब तक जीवन है, सीखते रहो, क्योंकि अनुभव ही सबसे श्रेष्ठ शिक्षक ह।
स्वामी विवेकानंद भूख और अज्ञानता से नफरत करते थे। उनका कहना था कि,,,,”जब तक करोड़ों लोग भूख और अज्ञानता से ग्रस्त हैं, मैं हर उस व्यक्ति को विश्वासघातक मानता हूं जो उन लोगों की तनिक भी परवाह नहीं करता, जिनकी कीमत पर वह शिक्षित हुआ है।”
स्वामी विवेकानंद हर इंसान की शिक्षा में विश्वास करते थे। वे हमेशा एक शिक्षित समाज के लिए संघर्ष करते रहे। उनका कहना था कि,,, यदि गरीब शिक्षा के लिए आ सकते हैं तो शिक्षा को उनके खेत तक, उनके कारखाने तक, हर जगह पहुंचना चाहिए।”
उनके कुछ महत्वपूर्ण, उपयोगी व शानदार उद्धरण निम्न प्रकार हैं,,,,
“उठो, जागो और तब तक मत रुको,
जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए,,
“विनम्र बनो,
साहसी बनो और
शक्तिशाली बनो।,,
“हम हिंदू भी नहीं हैं,
वेदांतिक भी नहीं हैं,
असल में हम छुआछातपंथी हैं।,, स्वामी विवेकानंद का मानना था कि आर्थिक और राजनीतिक उत्थान करने से ही जनता का आध्यात्मिक उत्थान किया जा सकता है। उन्होंने लिखा था कि “वे हमसे रोटी मांगते हैं, हम उन्हें पत्थर देते हैं। भूख से उत्पीड़ित जनों के गले में धर्म उड़ेलना उनका अपमान करना है। भूख से अधमरे लोगों को धार्मिक सिद्धांतों की घुट्टी पिलाना, उनके मान सम्मान पर हमला करना है।” उन्होंने धार्मिक संगठनों की आलोचना करते हुए लिखा था कि “आप उनके शरीरों की भुखमरी से रक्षा क्यों नहीं करते?”
स्वामी विवेकानंद विचारों के धनी थे। वे सभी अनपढ़, गरीब, अछूत, शोषित और पीड़ित, सबका उद्धार चाहते थे, सबका कल्याण करना चाहते थे। वे सारी जिंदगी इसके लिए प्रयासरत रहे। उनकी याद में हम तो यही कहेंगे,,,,
शब्दों से सबको राह दिखाते थे
विचारों के धनी थे विवेकानंद,
ऐसे युग प्रवर्तक थे विवेकानंद
सबका भला चाहते थे विवेकानंद।
स्वामी विवेकानंद ने बहुत सारे आधुनिक विचारों की सृष्टि की है। आज पूरे देश को उनसे काफी कुछ सीखने जानने की जरूरत है और उनके विचारों को अपने जीवन में उतारने, उन्हें अपनाने की सबसे ज्यादा जरूरत है। तमाम देशवासियों द्वारा उनके विचारों को अपने जीवन में उतारने के बाद ही, स्वामी विवेकानंद के विचारों के भारत बनाया जा सकता है।

लेखक – मुनेश त्यागी
