आधी आबादी के नाम, जो होगा देखा जाएगा – फ़हमीदा रियाज
जसवंत मोहाली
“तुम बिल्कुल हम जैसे निकले” — यह कविता मैंने कहाँ और कब पढ़ी थी, मुझे याद नहीं। यह वह समय था जब मोदी की अगुवाई में बनी पहली भाजपा सरकार को चार वर्ष हो चुके थे। भाजपा नेताओं द्वारा हिंदू भाइयों के लिए बिना कोई नेक काम किए, केवल उनकी भावनाओं से खेलने के बयान आने शुरू हो गए थे। पाकिस्तानी फ़िल्मों, चैनलों को रोक दिया गया। यही सब हमीं से अलग हुआ पाकिस्तान पहले ही कर रहा था। पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को तबाह करते हुए, भारत से डराते हुए, मुसलमानों के लिए एक भी नेक काम किए बिना, सिर्फ़ इस्लाम की घुट्टी पिलाकर अपनी सत्ता सलामत रख रहा था/है। सत्ता से सवाल पूछने वाला तुरंत हिंदुस्तान का एजेंट घोषित कर दिया जाता है।
कविता पढ़कर इसके लेखक के बारे में जानने की उत्सुकता हुई। इंटरनेट ने तुरंत बता दिया कि इसके रचयिता कौन हैं। यह फ़हमीदा रियाज़ नाम की पाकिस्तानी कवयित्री थीं जो 2018 में 72 वर्ष की उम्र में फौत हो गईं।
आप पहले यह कविता पढ़िए—
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले, अब तक कहाँ छुपे थे भाई
वो मूर्खता, वो घामड़पन, जिसमें हमने सदी गंवाई।
आख़िर पहुँची द्वार तुम्हारे, अरे बधाई बहुत बधाई।
प्रेत-धर्म का नाच रहा है, क़ायम हिंदू राज करोगे
सारे उल्टे काज करोगे, अपना चमन तराज़ करोगे।
तुम भी बैठे करोगे सोचा, पूरी है वैसी तैय्यारी
कौन है हिंदू कौन नहीं है, तुम भी करोगे फ़तवे जारी।
होगा कठिन यहाँ भी जीना, दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसे-तैसे कटा करेगी, यहाँ भी सबकी सांस घुटेगी।
क्या हमने दुर्दशा बनाई, कुछ भी तुमको नज़र न आई?
कल दुख से सोचा करती थी, सोचके बहुत हँसी आज आई।
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले, हम दो क़ौम नहीं थे भाई।
भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा, अब जाहिलपन के गुण गाना
आगे गड्ढा है ये मत देखो, वापस लाओ गया ज़माना।
मशक करो तुम आ जाएगा, उल्टे पाँव चलते जाना
ध्यान न दूसरा मन में आए, बस पीछे ही नज़र जमाना।
एक जाप-सा करते जाओ, बारम्बार यही दोहराओ
कैसा वीर महान था भारत, कितना आलीशान था भारत!
फिर तुम लोग पहुँच जाओगे, बस ‘परलोक’ पहुँच जाओगे
हम तो हैं पहले से वहाँ पर, तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ वहाँ से, चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना।
कोई कवयित्री पाकिस्तान में बैठकर भारत की स्थिति को इतनी शिद्दत से महसूस कर ले कि उसके भीतर से निकले व्यंग्यात्मक काव्य बोल भारतीय जनमानस को सावधान कर रहे हों— ऐसा तभी हो सकता है जब वह पाकिस्तान की परिस्थितियों से भी दो-चार हो रही हो।
कहानी और कविता की 15 से अधिक पुस्तकों की लेखिका फ़हमीदा सदा विवादों के केंद्र में रहीं। “पत्थर की ज़ुबान” उनका पहला काव्य संग्रह 1967 में प्रकाशित हुआ।
उनका जन्म 28 जुलाई 1946 को अंग्रेज़ी राज के समय भारत के सूबे उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में हुआ। वह धरती जहाँ सदियों से विभिन्न संस्कृतियों के लोग सह-अस्तित्व के धागे में पिरोए एक साथ रहते आए थे— वहाँ अंग्रेज़ों की औपनिवेशिक नीति ने उकसाकर फ़िरकापरस्ती को हवा दी और धीरे-धीरे आम जनमानस भी दो देशों की मिथ्या को सत्य मान बैठा और उपमहाद्वीप विभाजित हो गया।
उनके पिता रियाज़ुद्दीन अहमद एक शिक्षा-विशेषज्ञ थे, जिनकी बदली सिंध में हो गई। फ़हमीदा केवल चार वर्ष की थीं जब उनके पिता का निधन हो गया। उर्दू और हिंदी साहित्य से उन्हें बचपन से ही लगाव था। उन्हें जल्दी ही अहसास हो गया कि दोनों कौमों की “इज़्ज़त की रखवाली” का काम मर्दों ने केवल हथियारों से ही नहीं किया बल्कि स्त्री के शरीर को रौंदकर भी किया है। दोनों ओर अगवा की गई स्त्री की कीमत, दूसरे पक्ष के कब्ज़े में लिए गए सामान से अधिक नहीं थी।
शिक्षा पूरी कर वे रेडियो एनाउंसर बन गईं। विवाह के बाद कुछ वर्ष इंग्लैंड में रहीं, लेकिन पति से अनबन हो गई। 1969 से 1974 का समय निजी दुखांत का समय था, जिसके दौरान उन्होंने “बदन दरीदा” जैसी कृति लिखी।
लंदन में ही वे अमृता प्रीतम से मिलीं, जब वे बीबीसी उर्दू सेवा में काम करती थीं। कविता, राजनीति और धर्मनिरपेक्ष विचारों की समानता ने उन्हें पास ला दिया। तलाक के बाद वे पाकिस्तान लौटीं पर वहाँ का समाज “बदन दरीदा” को स्वीकारने को तैयार नहीं था। स्त्री-देह, यौनिकता, मासिक धर्म, अस्मिता जैसे विषयों को लेकर साहित्यिक हलकों में भी उन पर उँगली उठी। उनकी कविताओं में स्त्री-स्वर, आत्मविश्वास और विद्रोह कई लोगों को “बाग़ीपन” लगा।
फिर पाकिस्तान को मिला जनरल ज़िया-उल-हक़, जिसका मानना था कि इस्लामी क़ौम की इज़्ज़त स्त्री के शरीर से होकर गुजरती है। टकराव अवश्यंभावी था। जब स्त्री के लिए काला हिजाब अनिवार्य कर दिया गया तो फ़हमीदा ने उसके उत्तर में “चादर और चारदीवारी” लिखी, जो आंदोलनों की आवाज़ बन गई।
फिर उन्होंने दूसरी शादी कर ली। उनके पति ज़फ़र अली सिंधी वामपंथी कार्यकर्ता थे। दोनों ने “आवाज़” नाम की पत्रिका निकाली, लेकिन ज़िया के शासन में उनकी उदार राजनीति अस्वीकार्य थी। उन पर 10 मुकदमे दर्ज हुए, जिनमें देशद्रोह भी शामिल था। पत्रिका बंद करनी पड़ी। उन्हें भारत का एजेंट कहा गया।
पाकिस्तान में औरत होना और फिर प्रगतिशील औरत होना एक मुश्किल रास्ता है। औरत परस्त होना, कवित्री होना, मानव अधिकारों की बात करना तो रास्ते में कांटे बिछाने जैसी बात है। इसकी कीमत उन्हें 7 वर्ष के निर्वासन से चुकानी पड़ी। फहमीदा रियाज और उसके पति को गिरफ्तार कर लिया गया। फहमीदा की जमानत हो गई। उन दिनों ही भारत से मुशायरे के लिए न्योता मिला तो वह भारत आ गई। उसे समय अमृता प्रीतम अभी जिंदा थी।
भारत में अमृता प्रीतम ने इंदिरा गांधी से बात कर उन्हें आश्रय दिलाया। वे जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ली से जुड़ीं, यहीं पर उसने संस्कृत और हिंदी सीखी, फिर जेएनयू की फेलोशिप मिल गई।
जनरल ज़िया की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद 1988 में वे कराची लौटीं। उन्होंने NGO बना कर बच्चों और महिलाओं के बारे में पुस्तकें प्रकाशित करना शुरू किया। जब बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थी तो उन्होंने शिक्षा विभाग में कार्य किया। भारत में निर्वासन के समय “अपना जुर्म तो साबित है” लिखी, जिसमें तानाशाही के कष्टों का वर्णन है। उनके दो नावल भी प्रकाशित हुए। अब फहमीदा एक खास आवाज बन चुकी थी। वह आमतौर पर ही यूरोप और अमेरिका की साहित्यिक गोष्ठियों में जाती। इस समय उसने आईएमएफ की नीतियों के खिलाफ कविता लिखी – आदमी की जिंदगी।
2011 में पेन अमेरिका एशियन सोसायटी के निमंत्रण पर अमेरिका गईं। परिचय में उन्हें “इस्लामिक दुनिया की महान महिला आवाज़” कहा गया, अपने परिचय में इस्लामिक शब्द उसको अच्छा नहीं लगा। इस पर उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि “ मैं यह कहने से अपने आप को रोक नहीं पा रही हूं कि मुझे एक ईसाई देश में आकर खुशी है जहाँ प्रोटेस्टैंट और कैथोलिक बिना लड़ाई के रह रहे हैं।” उसका अमेरिका को इसाई देश कहना और इसाई ग्रुपों में होती रही खूनी झड़पों की ओर किया छुपा इशारा समझ कर हाल में हंसी गूंज उठी। उसने आगे कहा – “तुम जानते हो कि हम अमेरिका को एक ईसाई देश के तौर पर नहीं देखते, लेकिन तुम हमें मुस्लिम के तौर पर देख रहे हो”। फहमीदा के व्यंग की चुभन को भांपकर आयोजकों ने फहमीदा से माफी मांगी।
वे अंग्रेज़ी, उर्दू, सिंधी और फ़ारसी जानती थीं। उन्होंने रूमी, अतिया दाऊद, फ़र्रुख़ज़ाद का अनुवाद किया। उन्होंने कहा—“सभ्यता स्थिर नहीं होती। यह बहती है, बदलती है, नई संस्कृतियों का निर्माण करती है। लोकतंत्र भी पश्चिम से आया है—क्या हमने उसे अस्वीकार किया है?”
Scroll.in से बातचीत में उन्होंने कहा—
“एक कवि लोगों के सोचने के ढंग में अथवा सरकार के कामकाज पर प्रभाव अवश्य डालता है परंतु आप उसका असर तुरंत नहीं देख सकते। आप क्या सोचते हैं और समाज कैसे बदलता है? मुझे शब्दों से प्रेम है। मैं डिक्शनरी को कविता की किताब की तरह पढ़ सकती हूँ। मैं कभी खुद को ‘बाग़ी’ नहीं मानती। कवि की मानसिक दशा ऐसी होती है कि वह वही लिखता है जो सोचता है।” औरत परस्ती के बारे में वे बड़ी स्पष्ट हैं – औरत मर्द ही की तरह बहुत सी संभावनाएं समोए हुए एक मनुष्य है। केवल उसने अभी सामाजिक समता हासिल करनी है। मैं कहती हूं कि औरत को बिना परेशानी से सड़क पर चलने का हक हो। खेलने का, तैरने का, कविता पसंद करने का, मर्द की ही तरह, बिना किसी अनैतिकता का दाग लगे।
हेराल्ड अखबार के लिए अमर सिंधु से बातचीत के कुछ अंश—
क्या साहित्य रचना के लिए विचारधारा ज़रूरी है?
फ़हमीदा – “हाँ, जब साहित्य व्यक्ति की जगह समाज की बात करता है तो उसे पैर जमाने के लिए विचारों की जमीन चाहिए। रचनात्मकता विचार की मिट्टी में ही जड़ पकड़ती है। हमारे लोकगीत और लोक कथाएं विचारधारा से नहीं विचारों से निकलते हैं। यह जरूरी नहीं कि साहित्य की रचना वर्ग चेतना से ही हो। 20वीं शताब्दी के बड़े लेखक जैसे पाब्लो, नाजिम हिकमत, फ़ैज़ मार्क्सवादी थे। चित्रकला की दुनिया में क्रांति लाने वाला कलाकार पिकासो फ्रांस की कम्युनिस्ट पार्टी का मेंबर था। वहीं दूसरी और टॉलस्टॉय और दोस्तोवसकी जैसे कद्दावर लेखक व्यक्ति और समाज को ईसाईयत के संदर्भ में रखकर देखते थे। हालांकि देखा जाए तो यह भी एक विचारधारा से साहित्य की रचना करना ही है।
प्रश्न:आपको लगता है कि प्राचीन क्लासिक रचनाओं की तुलना में हमारी समकालीन रचनाएँ दुनिया भर के पाठकों में अपनी जगह नहीं बना सकी हैं?
फहमीदा: मैं ऐसा नहीं सोचती। हमारे समकालीन लेखकों में भी सार्वभौमिक अपील है, पर हमें इन उपन्यासों के क्लासिक बन जाने का इंतज़ार करना पड़ेगा, क्योंकि समकालीन युग किसी भी रचना को तुरंत क्लासिक घोषित नहीं कर सकता। मैं कुछ उपन्यासों का ज़िक्र करना चाहूँगी—जैसे राग दरबारी के लेखक श्री लाल शुक्ल का मैला आंचल। किरण देसाई का इनहेरिटेंस ऑफ़ लॉस—यह भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों पर आधारित है। इसका विषय मुझे अपने बहुत क़रीब लगता है—इस उपमहाद्वीप की भीतर की जद्दोजहद, उसकी विरोधाभासपूर्ण स्थितियाँ और उसकी विविधता। यह बहुत ही प्यारा उपन्यास है। किरण देसाई एक अद्भुत लेखिका हैं। इसी तरह ओरहान पामुक का उपन्यास स्नो, जो पश्चिम और मुस्लिम टकराव के बारे में बताता है। फिर अरुंधति रॉय का द गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स। पाकिस्तानी साहित्य में ऐसे उपन्यासों की अभी कमी है—या शायद मैंने अभी तक पढ़े नहीं।
प्रश्न: पाकिस्तानी अंग्रेज़ी उपन्यास सिर्फ़ पश्चिमी पाठकों के लिए लिखा जा रहा है। क्या आप सहमत हैं?
फहमीदा: मैं सहमत नहीं हूँ। यह गलत धारणा है। अगर युवा लेखक अंग्रेज़ी में अच्छा लिख सकते हैं तो इसमें बुराई क्या है? मोहसिन हमीद का उपन्यास “द रिलक्टेंट फ़ंडामेंटलिस्ट” मैंने पढ़ा है—एक अलग तरह के विषय पर लिखा गया बेहतरीन उपन्यास। इसी तरह मोहम्मद हनीफ़ का “ए केस ऑफ़ एक्सप्लोडिंग मैंगोज़” बताता है कि पाकिस्तान में सेना ने किस तरह क़ब्ज़ा जमाया। अगर हमारा अंग्रेज़ी साहित्य पश्चिम को आकर्षित करता है, तो इसमें गलत क्या है? मुझे बहुत खुशी होती है जब अली अकबर नातिक की कहानियाँ ब्रिटिश जर्नलों में छपती हैं।
प्रश्न: आपके लेखन की प्रेरणा का स्रोत क्या है? क्या यह सामाजिक बदलाव है या आपके भीतर का शोर–शराबा?
फहमीदा: मैंने अपने से पहले लिखी गई कविता की परंपरा को आगे बढ़ाया है। मेरे पहले भी खूबसूरत कविता लिखी गई—फ़ैज़, शेख़ आयाज़, गुल ख़ान नसिर—इन लोगों ने भी राजनीतिक चेतना वाली कविता लिखी। फर्क सिर्फ़ इतना है कि मैं एक औरत भी हूँ। मैं साहित्य को ज़िंदगी से अलग करके नहीं देखती। अफ़सोस की बात है कि हम उन लोगों को याद नहीं रखते जिन्होंने हमारे देश और लोगों के लिए साहित्य रचा। पाकिस्तान लगातार एक के बाद एक समस्या से घिरा रहा है और लेखक इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
प्रश्न: आपको क्या लगता है कि आपके आलोचक आपसे किस बात पर नाराज़ रहते हैं?
फहमीदा: अमर, तुम ख़ुद एक औरत भी हो और कवयित्री भी। तुम्हें पता है कि पुरुष-प्रधान समाज में—खासकर हमारे जैसे समाज में—एक औरत के विचारों और उसकी रचनात्मकता को गंभीरता से लेना ही नहीं चाहते। ज़्यादातर पुरुषों के लिए आपका होना सिर्फ़ एक औरत होना है, जिसकी पहचान उसके बिस्तर तक सीमित है। अगर किसी औरत के राजनीतिक विचार भी हैं, तो यह मान लिया जाता है कि वह किसी पुरुष से तोते की तरह रटकर बोल रही है—कि कोई पुरुष उसके दिमाग़ और शब्दों को नियंत्रित कर रहा है। आम धारणा यह है कि औरत मूल रूप से सोचने-समझने के काबिल नहीं होती। लेकिन किया ही क्या जा सकता है—औरत को लगे रहना पड़ता है, और यही कोशिश मैं भी कर रही हूँ।
प्रश्न: अब जब लेखकों के बीच रचनात्मक बहस खत्म हो चुकी है और लेखक–समाज के बीच संवाद को कट्टरपंथियों ने दबा दिया है, तो क्या ऐसे समय में भी लेखक को लिखते रहना चाहिए?
फहमीदा: “साहित्य की मृत्यु हो चुकी है”—यह बात कई बार कही जा चुकी है। इतिहास में ऐसा समय कभी नहीं आया जब लिखे हुए शब्दों की इतनी ज़रूरत हो, जितनी आज है। पाकिस्तानियों ने बहुत समय तक ‘भेड़िए–भेड़िए’ चिल्लाया, पर अब भेड़िया वास्तव में हमारे सामने है—उसके दाँत हमारी गर्दन पर हैं। देश को किसी भी समय पागल कट्टरपंथी खा सकते हैं या उसे टुकड़ों में बाँट सकते हैं। ऐसे में लिखना और बोलना ही कलाकारों और साहित्यकारों का अंतिम बचा हुआ उद्देश्य है। अच्छा है कि तालिबान कविता और साहित्य नहीं पढ़ते! (अगर वे पढ़ते होते तो शायद वे वह सब न करते जो वे कर रहे हैं।) जैसा फ़ैज़ ने कहा है—
“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल कि जो कहना है कह ले।”
इसीलिए हमें लिखना जारी रखना पड़ेगा।
और अंतिम समय तक वे लिखती रहीं—
तुम जिस लम्हे में ज़िंदा हो, यह लम्हा तुमसे ज़िंदा है
वह वक़्त नहीं फिर आएगा
तुम अपनी करनी कर गुज़रो, जो होगा देखा जाएगा।
आज़ादी से सोचने की फ़िज़ा बनाने के लिए फ़हमीदा रियाज़ ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा न्योछावर कर दिया।

फहमीदा को प्रगतिशील लेखक संघ के 50 साल पूरे होने के जलसे में 1986 में लखनऊ में सुना था । उनका अपना जलवा और फैन फॉलोइंग रही है ।
एक अच्छे संस्मरण के लिए बधाई ।