लेखकों का मान

 

अभी छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ कहानीकार मनोज रूपड़ा के साथ विश्वविद्यालय के कुलपति ने जो अमर्यादित व्यवहार करते हुए उन्हें बाहर निकाल दिया वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। उससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक बात सभागार में बैठे  साहित्यकारों के आचरण की है जिन्होंने कुलपति के कृत्य का विरोध नहीं किया न ही कार्यक्रम का बहिष्कार। विश्वविद्यालय के साथ मिलकर कार्यक्रम आयोजित करने वाली संस्था साहित्य अकादमी से किसी तरह की उम्मीद करना तो वैसे भी फिजूल है जिसका कोई पदाधिकारी कार्यक्रम में मौजूद नहीं था। उसके पीछे की कारगुजारियां भी उम्मीद नहीं जगातीं। देशभर के साहित्यकार और बुद्धिजीवी अपने अपने स्तर पर इस वाकये की आलोचना और निंदा कर रहे हैं, हम कोशिश करेंगे कि एक समग्र रिपोर्ट प्रकाशित करें, या कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियों को अपने पाठकों से साझा करें।  सबसे पहले कहानीकार और लेखक प्रेम कुमार मणि की टिप्पणी दे रहे हैं। इसे उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है। अगली टिप्पणी (निंदा प्रस्ताव) जनवादी लेखक संघ के केंद्रीय कार्यालय द्वारा जारी किया गया है। संपादक

लेखकों का मान

प्रेमकुमार मणि

मनोज रूपड़ा के साथ गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति ने जो व्यवहार किया उसे यूट्यूब पर देखा और बेहद क्षुब्ध हूँ. इस पर अनेक मित्रों ने अपना आक्रोश व्यक्त किया है जिसे समझ सकता हूँ. मैंने किसी द्वारा लगाई गई अखबारी कतरन भी देखी, जिस में कुलपति का कहानी पर दिया गया भाषण तो है, लेकिन मनोज के साथ दुर्व्यवहार की कोई चर्चा नहीं है. यह पत्रकारिता के पतन का नमूना है.

अब मनोज मामले पर आया जाय. कुलपति ने भाषण के क्रम में कहा मैं आपलोगों को बोर तो नहीं कर रहा ? आगे की पंक्ति में बैठे अतिथि लेखक मनोज रूपड़ा ने इतना भर कहा कि विषय पर बोला जाय. कुलपति कुपित हो गए. नाम पूछा. फिर कहा आपमें वीसी से कैसे बात की जाय इसका विवेक नहीं है. वीसी ने उपस्थित आयोजकों से यह भी पूछा कि किसने इन्हें बुलाया. फिर कहा आप बाहर जाइए. इन को कभी नहीं बुलाना है. आदि आदि. वीसी का अंदाज एक गुंडे की तरह का था.

मैंने वीसी के भाषण पर गौर किया. वह अशुद्ध भाषा में अनर्गल बातें बोल रहे थे. लेकिन वह कुलपति थे. कुछ भी बोल सकते थे. इससे यह पता चलता है कि पूरे देश में कैसे लोग विश्वविद्यालयों में भरे हुए हैं. यह तो रही कुलपति की बात. मुझे क्रोध वहां उपस्थित साहित्यसेवियों पर आ रहा था. वे चुपचाप बैठे रहे. किस लोभ या भय से बैठे रहे? उनका सार्वजानिक वहिष्कार क्यों नहीं हो ?

लेखकों की प्रतिष्ठा के मामलों का एक पुख्ता इतिहास है. कहते हैं मध्यकाल में कवि जायसी की धज पर तत्कालीन सुलतान ने हँसी लगाई थी क्योंकि कवि कुरूप थे. जायसी चुप रहने वाले नहीं थे. सुलतान से पूछा- ‘ मुझ पर हँस रहे हो या मुझे बनाने वाले पर? ‘ सुलतान को वाजिब जवाब मिल गया था. कहते हैं उसने मुआफी मांगी.

अष्टछाप के कवि कुम्भन दास की फकीराना उक्ति ‘ मोंसो कहाँ सीकरी सो काम .. ” तो प्रसिद्ध ही है.

ग़ालिब के बारे में कहा जाता है कि वह दिल्ली कॉलेज में बुलावे पर शिक्षक के तौर पर गए, लेकिन वहाँ का प्रिंसिपल उनके स्वागत केलिए बाहर नहीं आया. वह गेट से ही लौट गए.

बहुतों किस्से होंगे. लेकिन एक किस्सा इसी ज़माने का है. 1967 का. और यह करारा जवाब देने का है. तब मोरारजी देसाई उपप्रधानमंत्री थे. उन्होंने दिल्ली के कुछ लेखकों को चाय पर बुलाया था. लेखकों में मोहन राकेश भी थे. परिचय कराये जाने के बाद मोरारजी देसाई प्रवचन की मुद्रा में लेखकों को उपदेश देने लगे. अगली पंक्ति में बैठे मोहन राकेश ने जेब से सिगरेट निकाली और सुलगा कर कश लगाईं. कट्टर गांधीवादी देसाई ने नाराजगी जताते हुए कहा – ‘राकेशजी, मैं बदतमीजी बर्दास्त नहीं करता. ‘ मोहन राकेश ने छूटते ही जवाब दिया, – ‘बदतमीजी कौन कर रहा है? मैं या आप ? चाय पर बुला कर भाषण पिला रहे हो. मैं वहिष्कार करता हूँ. ” और इतना कह कर वह बाहर निकल गए. यह होता है लेखक का साहस. इस घटना का जिक्र उनके निधन पर रघुवीर सहाय ने अपने लेख में ( दिनमान ) किया था.

एक दूसरी घटना 1977 या 78 की है. किशोरीदास वाजपेयी को कोई पुरस्कार दिया जाना था प्रधानमंत्री के हाथों. प्रधानमंत्री वही मोरारजी देसाई थे. वाजपेयी जी सभागार में अगली पंक्ति में बिठाये गए थे. पुरस्कार ग्रहण करने केलिए उन्हें मंच पर बुलाया गया. वह नहीं गए. उनका मानना था कि जिसे पुरस्कार देना है वहाँ प्रदान करने वाले को जाना चाहिए. संस्कृति का व्याकरण तो यही कहता है. प्रधानमंत्री ने बात ताड़ ली. वह मंच से नीचे उतरे. वाजपेयी जी के पास आये. वाजपेयी जी ने उठ कर पुरस्कार ग्रहण किया. इस घटना पर रघुवीर सहाय ने दिनमान में सम्पादकीय अग्रलेख लिखा था.

लेकिन मैं अपने जमाने के लेखकों को देख रहा हूँ. जाने किस लोभ में पिलपिले हुए जा रहे हैं. सेठों के पैसों से होने वाले लिट-फेस्ट में शामिल हो कर दो घूंट दारू पिएंगे और आत्मसम्मान की बात करेंगे. मुझे स्मरण होता है 1982 में जयपुर में होने वाले प्रगतिशील लेखक सम्मेलन का. कोई माथुर साहब तब मुख्यमंत्री थे. उद्घाटन उन्हें करना था. लेखकों को यह अटपटा लगा. कोई लेखक उद्घाटन सत्र में शामिल नहीं हुआ. यह लेखकों का आत्मसम्मान होता है.

जयपुर की चर्चा हुई तब महादेवी जी के अपमान का भी स्मरण हुआ. संभवतः 1980 की बात है. जयपुर में मंच पर राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री पहाड़िया जी थे. महादेवी वर्मा जी भी थीं. मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में महादेवी जी पर कुछ अनाप- शनाप कह दिया. बात अखबारों में आई. इंदिरा गाँधी तक पहुँची. इंदिरा जी कुछ ही समय पहले प्रधानमंत्री हुई थीं. मुख्यमंत्री को तुरंत हटा दिया गया. यह समय भी इस देश में ही था. इंदिरा गाँधी ने अपनी राजनीति में संस्कृति का कोई शाइन बोर्ड नहीं लगाया हुआ था. आज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बैनर लगाए हुए लोग क्या एक बद्तमीज वीसी को हटाने की हिम्मत रखते हैं ? है कोई पूछने वाला ?

 

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