ओमप्रकाश सैनी – बिना पद और प्रचार की लालसा के अग्रिम मोर्चे के सेनानी

(ओमप्रकाश सैनी,  साथ में मास्टर दिवान सिंह जाखड़ जी की धर्मपत्नी हैं। यह फोटो दिवान सिंह के घर पर लिया गया था।)

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग -71

ओमप्रकाश सैनी – बिना पद और प्रचार की लालसा के अग्रिम मोर्चे के सेनानी

सत्यपाल सिवाच

हिसार जिले के बड़े गांव बास निवासी ओमप्रकाश सैनी उन कार्यकर्ताओं में सम्मिलित हैं जिन्हें अपने बारे में कोई प्रचार और शोरशराबा नहीं चाहिए; जिन्हें पदों का आकर्षण नहीं रहा, लेकिन अपने हिस्से के काम को मुस्तैदी और सलीके से किया। उनका जन्म 07 अप्रैल 1954 को श्री छाजूराम और भूलांदेवी के घर हुआ। वे आठवीं कक्षा तक गांव में पढ़े और 1971 में राजकीय उच्च विद्यालय पुठी से दसवीं कक्षा पास की। वे भाइयों के बड़े परिवार में पले बढ़े।

एक जनवरी 1972 को वह वर्कचार्ज आधार पर पब्लिक हेल्थ में हेल्पर नियुक्त हो गए। पूरे आठ साल बाद जब वर्कचार्ज वालों को अनुभव के आधार पर नियमित किया गया तो वे एक जनवरी 1980 से स्थायी कर्मचारी बन गए।  30 अप्रैल 2012 को वह फोरमैन पद सेवानिवृत्त हुए।

यूनियन में आने की प्ररेणा का कारण पदोन्नति के लिए आन्दोलन रहा। वे तोशाम में नौकरी करते थे। वहाँ सरदार हरदयाल सिंह भी थे जो यूनियन के नेता थे। उनकी प्रेरणा और सहयोग से संघर्ष शुरू किया गया और सफलता मिली तो यूनियन की जरूरत समझ में आ गई।

ओमप्रकाश जी को पदों का लालच नहीं था, लेकिन अन्य साथियों को आगे करके स्वयं लड़ाई में मोर्चे के सिपाही की तरह अगली कतार में मिलते। वे मैकेनिकल वर्करज यूनियन-41 में ब्रांच के कैशियर और बाद के दौर में जिलाध्यक्ष भी रहे। किसी न किसी पद पर रहते या न रहते, लेकिन काम के लिए कहीं भी जाने को तैयार हो जाते। वे बाद के दौर में राज्य स्तर पर भी चुने गए। सर्वकर्मचारी संघ में उन्होंने खण्ड  प्रधान की जिम्मेदारी वर्षों तक संभाली। सेवानिवृत्ति के बाद वे किसान आन्दोलन में सक्रिय रहे और अखिल भारतीय किसान सभा के जिला प्रधान के रूप में खूब काम किया। वे 2020-21 के ऐतिहासिक किसान आन्दोलन में काफी गतिशीलता से जुटे रहे।

ओमप्रकाश सैनी मैकेनिकल वर्करज यूनियन के संघर्षों में तो प्रारंभ में ही भाग लेने लगे थे। जब सर्वकर्मचारी संघ बना तो उस समय मैकेनिकल में कुछ लोगों ने अलग होने की चेष्टा की लेकिन वे संघर्ष की मुख्यधारा से जुड़े रहे। उन्होंने हड़ताल और गिरफ्तारी समेत सभी संघर्षों में भाग लिया। वे कई बार पुलिस लाठीचार्ज में घायल भी हुए। 7 मार्च 1991 के चण्डीगढ़ के प्रदर्शन में उन्हें चोट लगी। सन् 1996-97 के पालिका आन्दोलन में वे गिरफ्तार हुए और 26 दिन हिसार जेल में बंद रहे। उनके परिवार में पत्नी, दो बेटे और एक बेटी है। सभी बच्चे विवाहित हैं। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

 

लेखक : सत्यपाल सिवाच

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